सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा

समस्त जीवों के पितामह, अपने ज्ञान से ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थूल तथा परा जीव तथा वस्तुओं का निर्माण करने वाले 'पितामह ब्रह्मा जी'। संसार या ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता, तमो गुण सम्पन्न, सृजन कर्ता।

पालन-कर्ता विष्णु

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालन-हार, पालन-पोषण के कर्त्तव्य या दाइत्व का निर्वाह करने वाले, सत्व गुण सम्पन्न 'श्री हरि विष्णु'। सृजन के पश्चात् तीनों लोकों के प्रत्येक तत्व तथा जीव का पालन-पोषण करने वाले।

संहार-कर्ता शिव

तीनों लोकों में विघटन या विध्वंस के प्राकृतिक लय के अधिष्ठाता, तमो गुण सम्पन्न 'शिव'। वह शक्ति जो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीवित तथा निर्जीव तत्व के विघटन के कार्यभार का निर्वाह करती हैं।

सृष्टि के आदि में जल में शयन करने वाले भगवान नारायण ने लोकों के सृजन की इच्छा हुई, इस इच्छा ने उन्होंने महत्तत्त्व आदि से निष्पन्न पुरुष रूप ग्रहण किया। जिसमें दस इन्द्रियां, एक मन और पाँच तत्व या भूत, कुल १६ कलाएं थीं। उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए, योग निद्रा का विस्तार किया तथा उनके नाभि रूपी सरोवर से एक पद्म (कमल) अंकुरित हुआ और उस कमल से पितामह ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए थे, भगवान नारायण के २४ लीला अवतार।

श्री सनकादि मुनि अवतार

श्री सनकादि मुनि अवतार (प्रथम अवतार)

सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार; ब्रह्मा जी के घोर तप से प्रसन्न हो उनके प्रथम चार मानस पुत्रों के रूप में अवतार धारण किया तथा प्रलय काल में लुप्त हुए ज्ञान, वेद-शास्त्रों को पुनः प्राप्त कर ऋषियों को प्रदान किया।


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वराह अवतार

वराह अवतार (द्वितीय अवतार)

जल प्रलय पश्चात रसातल में गई हुई पृथ्वी को अपने दाढ़ों से बहार निकाल कर प्रजा के निवास हेतु प्रदान करना तथा आदि दैत्य हिरण्याक्ष का संहार करना।


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नारद अवतार

नारद अवतार (तृतीय अवतार)

ऋषियों को उत्पन्न करने के श्रेणी में, नारायण भगवान ने देवर्षि (देवताओं के ऋषि) नारद रूप में अवतार ग्रहण किया तथा सात्वत तंत्र या नारद पंचरात्र का उपदेश दिया, कर्मों के द्वारा कर्म बंधन से उपाय पञ्च-रात्र का प्रमुख उद्देश्य हैं।


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नर-नारायण अवतार

नर-नारायण अवतार (चतुर्थ अवतार)

धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से नार तथा नारायण के रूप में प्रकट हो, ऋषियों के रूप में मन तथा इन्द्रियों का सर्वथा संयम कर घोर तपस्या की और भगवत धर्म की रक्षा।


कपिल अवतार

कपिल अवतार (पंचम अवतार)

कदर्म प्रजापति के घर देवहूति के गर्भ से नौ बहनों के संग कपिल रूप में अवतार धारण कर, समय के फेर से लुप्त हुई तत्वों का निर्णय करने वाले सांख्य-शास्त्र का आसुरी नामक ब्राह्मण को उपदेश दिया।


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दत्तात्रेय अवतार

दत्तात्रेय अवतार (षष्टम अवतार)

महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया के इच्छानुसार उनके पुत्र स्वरूप में अवतरण, इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदि को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया।


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सुयज्ञ अवतार

सु-यज्ञ अवतार (सप्तम अवतार)

रुची प्रजपति के गर्भ से आकूति नामक पत्नी से सु-यज्ञ रूप में अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के संग स्वायम्भु मन्वंतर की रक्षा की।


ऋषभदेव अवतार

ऋषभदेव अवतार (अष्टम अवतार)

ऋषभ अवतार धारण कर, समस्त आसक्तियों का त्याग, मन तथा इन्द्रियों को शांत कर, भगवान के स्वरूप में ध्यान लगाना, परमहंस या अवधूत चर्या पड़ को प्राप्त करना।


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पृथु अवतार

पृथु अवतार (नवम अवतार)

ऋषियों के प्रार्थना से भगवान नारायण राजा पृथु के रूप में अवतार धारण किया, पृथ्वी से समस्त औषधियों का दोहन कर पृथ्वी को आश्रय प्रदान किया।


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मत्स्य अवतार

मत्स्य अवतार (दसवा अवतार)

चाक्षुष मन्वंतर के अंत में तीनों लोकों के जल मग्न होने पर, वैवस्वत मनु सहित अन्य जीवों की नौका की रक्षा हेतु मत्स्य अवतार धारण कर, अपनी सिंग से नौका को पकड़ कर रखा।


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कूर्म अवतार

कूर्म अवतार (एकादश अवतार)

समुद्र मंथन के समान, कूर्म या कच्छप अवतार धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी कठोर पीठ पर धारण किया।


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धन्वन्तरि अवतार

धन्वन्तरि अवतार (द्वादश अवतार)

समुद्र मंथन में अमृत कलश के साथ प्रकट हुए तथा समस्त औषधियों के स्वामी।


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आद्या शक्ति काली


माता दुर्गा

दुर्गमासुर मर्दिनी, दुर्गम संकटों से मुक्त करने वाली 'माता दुर्गा'

माता सती

साक्षात् आद्या शक्ति, शिव जी की अर्धांगनी सती या पार्वती, शक्ति की अधिष्ठात्री देवी

माता सरस्वती

ज्ञान तथा श्रृजन की अधिष्ठात्री देवी, ब्रह्मा जी की अर्धांगनी 'माता सरस्वती'


माता लक्ष्मी

धन, सुख, वैभव की अधिष्ठात्री देवी, विष्णु जी की अर्धांगिनी 'माता लक्ष्मी'

महाकाली

काल का भी भक्षण करने में समर्थ, 'माता महा-काली'

माता तारा

मोक्ष तथा सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करने वाली, 'माता तारा'

ब्रह्मा, विष्णु, महेश


सावित्री, ब्रह्मा जी
ब्रह्मा जी तथा देवी सावित्री

रचना या सृजन के अधिष्ठात्री देव ब्रह्मा जी, रचना से सम्बद्ध राजसिक गुण तथा ज्ञान तथा बुद्धि से युक्त, सावित्री तथा सरस्वती देवी के पति रूप में विख्यात। ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव, भगवान विष्णु के नाभि से निकले कमल पुष्प पर हुआ, तदनंतर ब्रह्मा से सर्वांग सुंदरी तरुणी स्त्री, 'सावित्री' उत्पन्न हुई, तथा इन्हीं दोनों से वेद उत्पन्न हुए। वेदों द्वारा ही सर्व प्रकार के ज्ञान का उद्भव हुआ, सम्पूर्ण ब्रह्मांड या तीनो लोक (स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी) के समस्त जीवित तथा निर्जीव तत्वों या पंच-भौतिक श्रृष्टि का निर्माण या सृजन ब्रह्मा जी तथा उनकी की शक्ति सावित्री द्वारा हुआ। इनके द्वारा दो प्रकार की श्रृष्टि उत्पन्न हुई, एक चैतन्य और दूसरी जड़, चैतन्य में समस्त जीव-जंतु, जिनमें इच्छा, अनुभूति, अहंभावना का समावेश हैं तथा प्राण रूप चैतन्य तत्व हैं तथा जड़ में ठोस, द्रव्य तथा वायु आते हैं जो विचारहीन तथा प्राणहीन हैं। ब्रह्मा जी पाँच मस्तको से युक्त थे, इनका एक मस्तक भगवान शिव द्वारा कट गया था। इसी घटना के कारण दक्ष जो प्रजापति तथा ब्रह्मा जी के पुत्र थे, शिव से घृणा करते थे। इस चराचर जगत में सभी इन्हीं ब्रह्मा जी के संतान हैं, देवी रति तथा काम देव इनके आखिरी मानस संतान हैं, काम देव तथा रति देवी के जन्म के पश्चात्, संतान उत्पत्ति या वृद्धि का दाईत्व इन्हें दे दिया गया। सर्वप्रथम, ब्रह्मा जी ने मानस श्रृष्टि की रचना की तथा अपने मन से पुत्रों तथा एक पुत्री, अपने शरीर के विभिन्न अंगो से प्रकट किया। अधिक जाने

लक्ष्मी नारायण
लक्ष्मी नारायण

चराचर जगत के पालनकर्ता 'श्री विष्णु, श्री हरि, श्री नारायण' इत्यादि नामों से विख्यात हैं तथा कमला या लक्ष्मी देवी के पति हैं। आद्या शक्ति काली, सात्विक स्वरूप में साक्षात् श्री हरि में विद्यमान योगमाया या महामाया हैं, सर्वदा क्षीर सागर के मध्य, शेष नाग की शय्या पर शयन करने वाले श्री विष्णु, से जो तामसी तथा संहारक शक्ति उत्पन्न होती हैं, वे योगमाया या महामाया ही हैं तथा भगवान विष्णु की शक्ति हैं। विष्णु शब्द का अर्थ उपस्थित होने से हैं, जो सर्वदा सभी तत्वों तथा स्थानों में व्याप्त हैं वही विष्णु हैं, परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म के अंतर्गत, ब्रह्माण्ड के प्रत्येक तत्व या कण में परमेश्वर की अनुभूति की जाती हैं। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ पक्षी हैं तथा जगत पालन का कार्य-भार इन्हीं का हैं। देवताओं तथा चराचर श्रृष्टि की रक्षा हेतु, श्री विष्णु ने २३ अवतार धारण किये, शास्त्रों के अनुसार श्री विष्णु, २४ अवतार धारण करेंगे, जिनमें अंतिम २४वा कल युग के अंत में होगा। अधिक जाने

शिव परिवार
शिव परिवार

शंकर, हर्र, महादेव, महेश, कपाली, रुद्र, नीलकंठ, आदि अनेक नामों से भगवान शिव जन साधारण में जाने जाते हैं, संहारक शक्ति, तामसी गुण सम्पन्न तथा महान योगी हैं। इस चराचर जगत या ब्रह्माण्ड में विध्वंस या संहार से सम्बंधित कार्य का प्रतिपादन इन्हीं के द्वारा होता हैं, चराचर जगत द्वारा तज्य तत्व इन्हीं का हैं तथा उनका सही तरीके से विघटन भी। परिणामस्वरूप, शिव जी का सम्बन्ध समस्त विध्वंस होने वाली वस्तुओं या तत्वों से हैं, जैसे शव या मृत देह, श्मशान भूमि, गंजा, मदिरा, सर्प, विष इत्यादि। महाकाल के रूप में शिव ही मृत्यु के कारक हैं, मृत्यु के रूप हैं ये ही महाकाल बन प्राणी के सन्मुख उपस्थित होते हैं। स्वरूप से ये सर्वदा योगी के भेष में रहते हैं, शरीर में चिता भस्म लगते हैं, अपनी जटाओ में चन्द्र तथा आभूषण रूप में सर्प या नाग, रुद्राक्ष, हड्डियों माला धारण करते हैं। त्रिशूल, डमरू, कमंडल, मृत पशुओ के चर्म, चिमटा, खप्पर, चिलम ही इनके संपत्ति हैं तथा श्मशान भूमि में ही वास करते हैं, कैलाश जो शिव जी का निवास स्थल हैं, दिव्य श्मशान के ही श्रेणी में आता हैं। परन्तु शिव लय तथा प्रलय दोनों को अपने अधीन किये हुए हैं। इनकी पत्नी या शक्ति, स्वयं आद्या शक्ति काली के अवतार, पार्वती या सती हैं तथा दो पुत्र कार्तिक, गणेश और पुत्री अशोक सुंदरी तथा मनसा (मन से उत्पन्न होने के परिणामस्वरूप मनसा नाम वाली) हैं। अधिक जाने



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