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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    दस महाविद्या स्वरूप में १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुरभैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुनी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरूप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारण 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

५१ सती शक्ति पीठ

कामाख्या शक्तिपीठ, नील पर्वत पर अवस्थित योनि पीठ, श्रेष्ठ शक्ति पीठ रूपी मान्यता प्राप्त

कामाख्या शक्तिपीठ, योनि पीठ

भगवान शिव की पहली पत्नी सती! के मृत देह से निर्मित ५१ शक्ति पीठों के प्रादुर्भाव की कथा।

सती! जो ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष तथा पसूति कि सोलहवीं कन्या थी तथा जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। प्रजापति दक्ष द्वारा आद्या शक्ति माता को कन्या के रूप में प्राप्ति हेतु, कठिन साधना की फलस्वरूप, उन्होंने देवी सती स्वरूप में दक्ष के गृह में जन्म धारण किया। ब्रह्मा जी के कहने पर, दक्ष ने अपनी बेटी देवी सती का विवाह शिव जी से किया, परन्तु वे इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। एक बार किसी उत्सव पर दक्ष के पधारने पर, वहां पहले से ही बैठे भगवान शिव ने उनका अभिवादन नहीं किया, परन्तु वह उपस्थित समस्त लोगो ने उनका हाथ जोड़ वंदन किया। इस पर दक्ष क्रुद्ध हो गए, वे ससुर (पिता) थे।
साथ ही, शिव जी का सम्बन्ध विध्वंसक वस्तुओं से होना भी उनके घृणा-उपेक्षा का एक कारण था; उनका श्मशान में निवास करना, चिता भस्म शरीर में लगाना, खोपड़ियों तथा हड्डी की माला धारण करना, सर्पो को अपना आभूषण बनाना, गांजा तथा चिल्लम पान इत्यादि अमंगलकारी वस्तुओं से सम्बन्ध रखना। शिव जी दरिद्र थे, मारे हुए पशुओं के खाल-चर्म पहनते थे, चिमटा, खप्पर, कमंडल, सांड, त्रिशूल, हड्डियां ही उनकी संपत्ति थी तथा उनके समस्त साथी डरावने भूत-प्रेत इत्यादि अशुभ शक्तियां थीं।
एक बार शिव जी के द्वारा ब्रह्मा जी का एक सर कट गया था; दक्ष के पिता ब्रह्मा जी पांच मस्तकों से युक्त थे, अतः वे शिव जी को ब्रह्म हत्या का दोषी मानते थे। एक बार प्रजापति दक्ष ने 'बृहस्पति श्रवा' नाम के यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने तीनों लोकों से समस्त प्राणी, ऋषि, देवी-देवता, मनुष्य, गन्धर्व इत्यादि सभी को निमंत्रित किया। दक्ष! भगवान शिव से घृणा करते थे परिणामस्वरूप, उन्होंने उनसे सम्बंधित किसी को भी अपने यज्ञ आयोजन में आमंत्रित नहीं किया। देवी देवी सती ने जब देखा की तीनों लोकों से समस्त प्राणी उनके पिता जी के यज्ञ आयोजन में जा रहे हैं, उन्होंने अपने पति भगवान शिव ने अपने पिता के घर, यज्ञ आयोजन में जाने कि अनुमति मांगी। भगवान शिव! दक्ष के व्यवहार से परिचित थे, उन्होंने देवी सती को अपने पिता के घर जाने की अनुमति नहीं दी तथा नाना प्रकार से उन्हें समझाने की चेष्टा की। परन्तु देवी देवी सती नहीं मानी, अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपने गणो के साथ जाने की अनुमति दे ही दी। देवी सती अपने पिता दक्ष से उनके यज्ञानुष्ठान स्थल में घोर अपमानित हुई। दक्ष ने अपनी पुत्री देवी सती को स्वामी सहित, खूब उलटा सीधा कहा। परिणामस्वरूप, देवी अपने तथा स्वामी के अपमान से तिरस्कृत हो, यज्ञ में आये सम्पूर्ण यजमानों के सामने देखते ही देखते अपनी आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी, उन्होंने अपने आप को योग-अग्नि में भस्म कर दिया।

भगवान शिव को जब इस घटना का ज्ञात हुआ, वे अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने जटा के एक टुकड़े से वीरभद्र को प्रकट किया, जो स्वयं महाकाल के ही स्वरूप थे तथा उस जटा के एक भाग से महाकाली देवी का भी प्राकट्य हुआ। उन्होंने वीरभद्र तथा महाकाली को अपने गणो के साथ, दक्ष यज्ञ स्थल में सर्वनाश करने की आज्ञा दी। भगवान शिव के आदेशानुसार दोनों ने यज्ञ का सर्वनाश कर दिया, दक्ष का गाला काट उस के सर की आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी। तदनंतर भगवान शिव यज्ञ स्थल में आये तथा अपनी प्रिय पत्नी देवी सती के शव को कंधे पर उठा, तांडव नृत्य करने लगे। (शिव का नटराज स्वरूप, तांडव नित्य का ही प्रतीक हैं।) भगवान शिव के क्रुद्ध हो तांडव नृत्य करने के परिणामस्वरूप, तीनों लोकों में हाहाकार मच गया तथा विध्वंस होने लगा। तीनों लोकों को भय मुक्त करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से, देवी सती के मृत देह के टुकड़े कर दिए तथा वो भारत वर्ष के विभिन्न स्थानों में पतित हुए। जो देवी देवी सती के पवित्र ५१ शक्ति पीठों के नाम से विख्यात हैं; देवी नाना रूपों में इन पवित्र स्थानों की शक्ति हैं तथा इनके भैरव के रूप में भगवान शिव भी प्रत्येक स्थान पर अवस्थित हैं।

विभिन्न शास्त्रों में उल्लेख पीठों की संख्या एक-दूसरे से भिन्न हैं, परन्तु मुख्यतः ५१ पीठों के नाम प्रसिद्ध तथा सर्व प्रचालन में हैं।

शिव चरित्र के अनुसार, सती शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं।

कालिका पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या २६ हैं।

श्री देवी भागवत, पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या १०८ हैं।

तंत्र चूड़ामणि तथा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या ५२ हैं।

हिंगलाज शक्तिपीठ, ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर), बलूचिस्तान, पाकिस्तान।

हिंगलाज या हिंगुला नमक स्थान में ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर का भाग या कपाल), हिंगलाज पर्वत श्रंखला के पहाड़ी गुफा में, हिंगोल नदी के तट पर, लास बेला, बलूचिस्तान प्रांत, ल्यारी तहसील, पाकिस्तान में गिरी। जो कराची से १२५ कि. मी. उत्तर-पूर्व, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित हैं। यहाँ देवी! कोट्टरी शक्ति के रूप में तथा भीमलोचन, भैरव के रूप में अवस्थित हैं। मंदिर में सिंदूर के साथ लिप्त गोल शिलाओं के रूप में देवी पूजिता हैं, जो यहाँ के प्राकृतिक गुफा में स्थित हैं।

शिवहारकराय या करविपुर शक्तिपीठ, (आंखें), कराची, पाकिस्तान।

शिवहारकराय या करविपुर शक्ति पीठ, यह पाकिस्तान, कराची में परकै रेलवे स्टेशन के पास स्थित हैं; देवी सती की आँखें यहाँ गिरी गया। देवी महिषमर्दिनी और भैरव, क्रोधीश के रूप में पूजित तथा विद्यमान हैं।

सुंगधा शक्तिपीठ, (नाक), बरिसाल, बांग्लादेश।

सुगंधा शक्तिपीठ, बांग्लादेश के बरिसाल जिले से २० कि. मी. उत्तर शिकारपुर नमक स्थान में स्थित एकजटा के रूप में विद्यमान हैं। शिकारपुर गांव स्थित सुगंधा नदी के तट पर, देवी सती की नाक गिरी थी और यहां देवी! सुगंधा या तारा एकजटा स्वरूप के रूप में विद्यमान हैं तथा यहाँ के भैरव, त्र्यंबक हैं। यह मंदिर शिव शिवरात्रि या शिव चतुर्दशी के उत्सव हेतु प्रसिद्ध हैं।

महामाया शक्तिपीठ, (गाला), अमरनाथ, पहलगाम, जम्मू और कश्मीर, भारत।

महामाया शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर, भारत के पहलगाम जिले में स्थित हैं। देवी सती की गले का भाग यहाँ पतित हुई थीं; यहां देवी महामाया के रूप में और त्रिसन्ध्येश्वर, भैरव के रूप में स्थित हैं। भगवान शिव के इस पवित्र गुफा में हिम-लिंग प्राकृतिक रूप से निर्मित होती हैं, इस स्थान में शिव जी ने अपनी पत्नी पार्वती को जीवन और मरण चक्र से सम्बंधित महान रहस्य समझाया था। अन्य दो हिम-संरचनायें माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमरनाथ के दर्शन के साथ श्रावण पूर्णिमा पर इस शक्ति पीठ भी दर्शन किया जाता हैं।

ज्वाला शक्तिपीठ, (जीभ), ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, भारत।

ज्वालामुखी जो कांगड़ा घाटी के दक्षिण से ३० कि. मी. दूर स्थित हैं; यह भारत के एक बहुत प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में विख्यात हैं; पांडवों इस पवित्र पीठ की खोज की थीं। यहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी; यहाँ देवी! अंबिका या सिद्धिदा और उन्मत्त, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। देवी के मंदिर में दर्शन प्राकृतिक ज्वाला या लौ के रूप में होती हैं एवं लौ चट्टानों की परत के नीचे से सर्वदा प्रज्वलित होती रहती हैं। यह मंदिर मुहम्मद गजनी द्वारा १००९ ई. में नष्ट कर दिया गया था। काँगड़ा के राजा भूमि चंद कटोच देवी दुर्गा के बड़े भक्त थे, उन्हें देवी माँ ने रात को सपने में दर्शन दिया तथा इस पवित्र स्थान के बारे में बताया। राजा ने उस स्थान को खोजा तथा उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया, वहां चमत्कारिक ढंग से अग्नि का एक स्रोत या ज्वाला मिली जो आज भी विद्यमान हैं एवं प्रज्वलित हो रहीं हैं। सम्राट अकबर ने इस पवित्र अग्नि को बुझाने के निमित्त कई बार प्रयास किए, लेकिन हर बार उन्हें असफलता ही मिली। अंत में उन्होंने भी यहाँ के अलौकिक शक्ति को स्वीकार कर लिया था।

त्रिपुरा मालिनी शक्तिपीठ, (बायाँ सीना), जालंधर, पंजाब, भारत।

त्रिपुरा मालिनी, यह पीठ भारत में पंजाब राज्य के जालंधर रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर जालंधर शहर में स्थित हैं। देवी सती की बाई छाती यहाँ गिरी थीं, यहाँ देवी! त्रिपुरा-मालिनी के रूप में और भीषण, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। वशिष्ठ, व्यास, मनु, जमदग्नि, परशुराम जैसे विभिन्न महर्षियों ने त्रिपुरा मालिनी रूप में यहाँ आदि शक्ति की पूजा-आराधना की थीं। जालंधर नमक दैत्य भगवान शिव द्वारा मारा गया था, दैत्य के नाम से ही शहर का नाम जालंधर पड़ा। यहाँ स्वच्छ पानी के तालाब के साथ देवी मंदिर बहुत मनमोहक एवं सुन्दर हैं।

अंबा शक्तिपीठ, (ह्रदय), बनासकांठा, गुजरात, भारत।

अंबाजी शक्तिपीठ, अंबाजी मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ हैं, यह पालनपुर से लगभग ६५ कि. मी., माउंट आबू से ४५ किलोमीटर दूर, गुजरात-राजस्थान सीमा पर, श्री अमीरगढ़ से 42 कि. मी. और बनासकांठा जिले में कडियादृ गांव से ५० कि. मी. दुरी पर स्थित हैं। यहाँ, देवी सती का हृदय गिरी था; यहाँ देवी! अंबा नाम से और बटुक, भैरव रूप में विद्यमान हैं। यहाँ देवी! श्री यंत्र के रूप में अवस्थित हैं और केवल इसी रूप में पूजिता हैं; यहाँ किसी भी प्रकार की कोई प्रतिमा नहीं हैं, अंबा जी मंदिर गब्बर पर्वत के शिखर पर स्थित हैं। सुंदर पर्यटन स्थलों से युक्त यह एक उत्कृष्ट भ्रमण स्थानों में गिना जाता हैं, सूर्यास्त, गुफाएँ और रोपवे यहाँ के मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं। यह मंदिर सूर्यवंशी सम्राट अरुण सेन द्वारा, ४ शताब्दी में वल्लभी के शासक द्वारा निर्मित किया गया था।

गुह्येश्वरी शक्तिपीठ, (दोनों घुटनों), काठमांडू, नेपाल।

गुह्येश्वरी मंदिर, काठमांडू, नेपाल में पशुपति नाथ मंदिर के पास स्थित हैं। यहाँ, देवी सती के दोनों घुटने गिरे थे, यहाँ देवी! महाशिरा रूप में और कपाली, भैरव रूप में विद्यमान हैं। यहाँ मंदिर पशुपतिनाथ मंदिर के निकट, बागमती नदी के तट पर स्थित हैं। गुह्येश्वर मंदिर, धर्मशाला (तीर्थयात्रियों विश्राम गृह) से घिरे हुए एक पक्का आँगन में हैं, 17 वीं सदी में राजा प्रताप मल्ल द्वारा गुहेश्वरी मंदिर बनाया गया था।

दाक्षायनी शक्तिपीठ, (दांया हाथ), कैलाश पर्वत, तिब्बत, चीन।

दाक्षायनी शक्तिपीठ, यह तिब्बत में कैलाश पर्वत, मानसरोवर (चीन) के पास एक शिला के रूप में विद्यमान हैं। यहाँ, देवी सती की दाहिना हाथ यहाँ पतित हुई थीं, देवी! यहाँ दाक्षायनी (दक्ष-यज्ञ विध्वंस करने वाली) रूप में और अमर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

बिराज शक्तिपीठ, (नाभि), जाजपुर, भवनेश्वर, ओडिशा, भारत।

बिराज शक्तिपीठ, लगभग १२५ कि. मी. भुवनेश्वर से उत्तर दिशा में, भारत के ओडिशा राज्य में स्थित हैं, यहाँ देवी! विरजा या गिरीजा के नाम से पूजित हैं। यहाँ, देवी सती की नाभि गिरी थी, वह देवी! विमला के रूप में और जगन्नाथ, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

गंडकी चंडी शक्तिपीठ, (माथा), मुक्तिनाथ, नेपाल।

गंडकी चंडी शक्तिपीठ, गंडकी नदी के किनारे तथा नेपाल में मुक्तिनाथ, धवलगिरीि में स्थित हैं। यहाँ, देवी सती का माथा गिरी था तथा यहाँ देवी! गंडकी-चंडी के रूप में और चक्रपाणी, भैरव के रूप में विद्यमान। इस पवित्र स्थान के महत्व का विष्णु पुराण में वर्णन किया गया हैं, यह स्थान मुक्तिनाथ, हिंदूओं और बौद्धों के लिए मुक्ति या मोक्ष प्रदान करने वाला हैं। यह स्थान चक्र निर्मित शालग्राम शिलाओं हेतु विख्यात हैं।

बहुला शक्तिपीठ, (बांया हाथ), बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।

बहुला शक्तिपीठ, यह पीठ केतुग्राम, कटवा, वर्धमान जिला, पश्चिम बंगाल, भारत में अजय नदी के तट पर स्थित हैं। यहाँ, देवी सती का बाँया हाथ गिरी था तथा यहाँ देवी! बहुला के रूप में तथा भीरुक या सर्व-सिद्धिदायक, भैरव के रूप में अवस्थित हैं। यहाँ देवी अपने दोनों पुत्रों कार्तिक और गणेश के साथ विद्यमान हैं। यह मंदिर १८ वीं सदी में बनाया गया था।

मंगल चंडिका शक्तिपीठ, (दायी कलाई), बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।

मंगल चंडिका शक्तिपीठ, यह पीठ बर्द्धमान जिले के गुस्कारा के उजनी ग्राम, भारत, पश्चिम बंगाल में स्थित हैं। इस पवित्र स्थान पर देवी सती की दाहिनी कलाई गिरी थी, यहाँ देवी! मंगल-चंडिका या मंगल चंडी के रूप में और कपिलाम्बर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। यह गुस्कारा रेलवे स्टेशन से १६ किलोमीटर दूर हैं।

त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, (दाहिना पैर), उदयपुर, त्रिपुरा, भारत।

त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, यह महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा १५०१ ईसवी में बनाया हुआ, बहुत ही शक्तिशाली तंत्र शक्ति पीठ हैं। अगरतला, भारत में त्रिपुरा राज्य की राजधानी से ५५ कि. मी. दूर, उदयपुर नमक स्थान पर, राधा किशोरपुर गांव में स्थित हैं तथा माता-बाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हैं। यहाँ देवी सती की दाहिनी पद (दाहिना पैर) पतित हुई थीं, यहाँ देवी! त्रिपुरेश्वरी या त्रिपुरसुंदरी और त्रिपुरेश, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, (दाहिनी भुजा), चिटगांव, बांग्लादेश।

भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, सीताकुंड चन्द्रनाथ मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं, यह पीठ बांग्लादेश के चंद्र-नाथ पर्वत के पास सीताकुंड स्टेशन, चटगांव, पर स्थित हैं। यहाँ, देवी सती की दाहिनी हस्त (दाहिना हाथ) गिरी था, यहाँ देवी! भवानी के रूप में और चंद्रशेखर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। यहाँ गरम पानी के प्राकृतिक स्रोत हैं।

भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, (बाया पैर), वोड़ागंज, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल, भारत।

भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में जलपागुड़ी जिले के वोड़ागंज ग्राम, तीस्ता नदी के तट पर स्थित हैं। यहाँ, देवी सती का बायाँ पैर गिरा था, यहाँ देवी भ्रामरी या त्रिश्रोता और अंबर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

कामाख्या शक्तिपीठ, (योनि या प्रजनन अंग), कामाख्या, आसाम, भारत।

कामाख्या शक्ति पीठ, सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण तंत्र पीठ, गुवाहाटी, आसाम, भारत के नील-पर्वत या नीलांचल क्षेत्र में स्थित हैं। देवी सती की योनि (प्रजनन अंग) यहाँ पतित हुई थीं। यहाँ देवी! कामाख्या और उमानंद, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। यह तीर्थ देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया था, यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं हैं। जिस स्थान पर देवी का प्रजनन अंग गिरा था, वहाँ सर्वदा ही प्राकृतिक जल श्रोत का प्रवाह होता रहता हैं एवं वही पर देवी की पूजा की जाती हैं।

जुगाड़्या शक्तिपीठ, (दाहिने पैर का अंगूठा), खीरग्राम, बर्द्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।

जुगाड़्या शक्तिपीठ, देवी सती के दाहिने पैर का अँगूठा, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बर्द्धमान जिले के खीरग्राम गांव, मंगलकोट में गरी थीं। यहाँ देवी! जुगाड़्या शक्ति और क्षीर खंडक, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

कालिका शक्तिपीठ, दाहिने पैर की चार उँगलियाँ, कोलकाता (कलकत्ता), पश्चिम बंगाल, भारत।

कालिका शक्तिपीठ, देवी सती के दाहिने पैर की चार उँगलियाँ, आदि गंगा नदी के तट पर गिरी थी, यह जगह कोलकाता में काली-घाट के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह देवी सती के पीठों के मध्य बहुत प्रसिद्ध पीठ हैं। यहाँ देवी! महा-काली और नकुलेश्वर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। देवी काली की प्रतिमा ब्रह्मा बेदी पर प्रतिष्ठित हैं, जिस बेदी पर बैठकर ब्रह्मा जी ने आदि शक्ति के निमित्त तपस्या की थी।

ललिता या अलोपी शक्तिपीठ, (दोनों हाथों की उंगलियां), इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत।

ललिता या अलोपी, प्रयाग शक्तिपीठ के नाम से भी जानी जाता हैं। देवी सती के दोनों हाथों की उंगलियां, उत्तर प्रदेश, भारत, के अक्षय वट, इलाहाबाद में गिरी हुई थीं। यहाँ देवी! ललिता शक्ति और वभ, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। यह मंदिर तीन नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम, इलाहाबाद किले के निकट स्थित हैं।

जयंती शक्तिपीठ, (बाईं जांघ), कलजोरे बौरभग गांव, सिलेट जिला, बांग्लादेश।

जयंती शक्तिपीठ, देवी सती की बाई जाँघ, बांग्लादेश के कलजोरे बौरभग गाँव के पास जयंतियापुर, सिलेट जिले में गिरी थीं। यहाँ देवी! जयंती शक्ति और क्रमदीश्वर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

विमला शक्तिपीठ, (मुकुट), मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल, भारत।

विमला शक्तिपीठ, यह पीठ भारत में पश्चिम बंगाल, मुर्शिदाबाद जिले के लालबाग कोर्ट रोड के पास स्थित हैं। यहाँ, देवी सती की मस्तक मुकुट पतित हुई थीं, यहाँ देवी! विमला शक्ति और संवर्त, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

श्रावणी शक्तिपीठ, (रीढ़ की हड्डी), कुमारी कुंदा, चटगांव, बांग्लादेश।

श्रावणी शक्तिपीठ, यह पीठ बांग्लादेश, चटगांव जिले के कुमारी कुंदा गाँव में हैं। यहाँ, देवी सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी, यहाँ देवी! श्रावणी शक्ति और भैरव, निमिष के रूप में विद्यमान हैं।

सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, (टखने की हड्डी), थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत।

सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, द्वैपायन सरोवर के पास थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत में स्थित हैं। देवी सती की टखने की हड्डी यहाँ गिरी थी, यहाँ देवी! सावित्री या भद्र काली शक्ति और स्थाणु, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

गायत्री शक्तिपीठ, (कंगन), पुष्कर, राजस्थान, भारत।

गायत्री शक्तिपीठ, भारत में राजस्थान राज्य स्थित अजमेर के पुष्कर पर्वत श्रृंखला पर, देवी सती की दो कंगन गिरे थे। यहाँ देवी! गायत्री शक्ति और सर्वानंद, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

महालक्ष्मी शक्तिपीठ, (गर्दन), जौनपुर, सिलेट, बांग्लादेश।

महालक्ष्मी शक्तिपीठ, बांग्लादेश के सिलेट शहर से 3 कि. मी. उत्तर-पूर्व, जौनपुर गांव के श्री-शैल पर, देवी सती की गर्दन गिरी थी। यहाँ देवी महा-लक्ष्मी (धन की देवी) और शम्बरानन्द, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ, (अस्थि), कनकली तला, बोलपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।

देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ, देवी सती की अस्थियां, भारत में पश्चिम बंगाल, बीरभूम जिले में, बोलपुर (शांतिनिकेतन) के उत्तर पूर्व में कोपाई नदी के तट पर गिरी थीं। यहां देवी! कनकलेश्वरी और रुरु, भैरव के रूप में अवस्थित हैं।

काली शक्तिपीठ, (बायां कूल्हा), अमरकंटक, शहडोल, मध्य प्रदेश, भारत।

काली शक्तिपीठ, देवी सती की वाम भाग का कूल्हा, भारत के मध्य प्रदेश राज्य, शहडोल जिले के अमरकंटक नमक स्थान पर सोन नदी के तट पर, एक गुफा में गिरी थीं। यहाँ देवी! काली शक्ति और असितांग, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

नर्मदा शक्तिपीठ, (दांया कूल्हा), सोनदेश, अमरकंटक, मध्य प्रदेश, भारत।

नर्मदा शक्तिपीठ, देवी सती का दाहिना कूल्हा, भारत में मध्य प्रदेश राज्य, के शहडोल जिले में सोनदेश, अमरकंटक नमक स्थान पर नर्मदा नदी के उद्गम स्थान पर गिरी था। यहाँ देवी! नर्मदा शक्ति और भद्रसेन, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

शिवानी शक्तिपीठ, (दांया स्तन), सीतापुर, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिवानी शक्तिपीठ, देवी सती का दाहिना स्तन, भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के चित्रकूट जिले, सीतापुर गांव के रामगिरी पर्वत श्रंखला में गिरी थीं। यहाँ देवी! शिवानी शक्ति और चांद, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

उमा शक्तिपीठ, (चूड़ामणि), वृन्दावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश, भारत।

उमा शक्तिपीठ, देवी सती की बालों की चूड़ामणि, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य, मथुरा जिले में, वृंदावन, भूतेश्वर मंदिर के पास गिरी थीं; मथुरा भगवान कृष्ण के जन्म स्थान हेतु भी प्रसिद्ध हैं। यहाँ देवी! उमा शक्ति और भूतेश, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

नारायणी शक्तिपीठ, (ऊपरी जबड़े के दांत), कन्याकुमारी, तमिलनाडु, भारत।

नारायणी शक्तिपीठ, यह पीठ भारत, तमिलनाडु राज्य, कन्याकुमारी नमक स्थान के पास शुचितीर्थम में विद्यमान हैं। यहाँ, देवी सती की ऊपरी जबड़े के दांत गिरी थीं तथा देवी! नारायणी शक्ति और संहार, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

अपर्णा शक्तिपीठ, (वाम पैर का नुपुर), शेरपुर, बागुरा, बांग्लादेश।

अपर्णा शक्तिपीठ, यह पीठ बांग्लादेश के बागरा जिले के भवानी पुर गाँव में स्थित हैं। यहाँ, देवी सती की वाम पैर की पायल या नूपुर गिरी थीं तथा यहाँ देवी! अपर्णा शक्ति हैं और वामन, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

सुंदरी या बाला-त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, (दाहिने पैर का पायल या नुपुर), त्रिपुरान्तकम्, श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश, भारत।

सुंदरी या बाला-त्रिपुरसुंदरी, देवी सती की दाहिने पैर का पायल या नूपुर, भारत के आंध्र प्रदेश राज्य, श्रीशैलम के पास त्रिपुरान्तकम् में गिरी थीं। यहां देवी! सुंदरी या बाला-त्रिपुरसुंदरी शक्ति और सुन्दरनन्द, भैरव के रूप में अधिष्ठित हैं।

कपालिनी शक्तिपीठ, (बाएं टखने), तामलुक, मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल, भारत।

कपालिनी शक्तिपीठ, देवी सती की बाएँ टखने, भारत में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में तामलुक में गिरी थीं। यहां देवी! कपालिनी शक्ति और सर्वानंद, भैरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

चंद्रभागा शक्तिपीठ, (पेट), जूनागढ़, गुजरात, भारत।

चंद्रभागा शक्तिपीठ, देवी सती का पेट या आमाशय, भारत के गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले में सोमनाथ, वेरावल, सौराष्ट्र या प्रभास क्षेत्र में गिरा था। यहाँ भगवान शिव का सोमनाथ नमक ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं। यहाँ देवी! चंद्रभागा शक्ति और वक्रतुंड, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

अवंती शक्तिपीठ, (ऊपरी होंठ), उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत।

अवंती शक्तिपीठ, देवी सती के ऊपरी होंठ, भारत, मध्य प्रदेश, उज्जैन में गिरी थीं। यहाँ महाकालेश्वर नाम से भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग हैं। यहाँ देवी! अवंती शक्ति और लम्बकर्ण, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

भ्रामरी शक्तिपीठ, (दोनों ठोड़ी), नासिक, महाराष्ट्र, भारत।

भ्रामरी शक्तिपीठ, देवी सती की ठोड़ी के दोनों हिस्से, भारत में महाराष्ट्र राज्य, नासिक जिले के गोदावरी नदी-घाटी में जनस्थान में गिरी थीं। यहाँ देवी! भ्रामरी शक्ति और वक्रकाटाक्ष, भैरव के रूप में अवस्थित हैं।

विश्वेश्वरी शक्तिपीठ, (गाल), राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश, भारत।

विश्वेश्वरि द्राक्षरमं शक्तिपीठ, भारत के आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी जिले के पास, देवी सती का गाल पतित हुआ था। यहाँ देवी! विश्वेश्वरि शक्ति और वत्साम्भा, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

अम्बिका शक्तिपीठ, (बाएँ पैर की उंगलियां), भरतपुर, राजस्थान, भारत।

अंबिका शक्तिपीठ, भारत में राजस्थान, भरतपुर जिले के बिरात में, देवी सती के बाएँ पैर की उंगलियां गिरी थी। यहाँ देवी! अंबिका शक्ति और अमृतेश्वर, भैरव के रूप में अधिष्ठित हैं।

कुमारी शक्तिपीठ, (दाएँ कंधे), कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल, भारत।

कुमारी शक्तिपीठ, खनकुल ग्राम के रत्नाकर नदी तट पर, पश्चिम बंगाल, भारत के हुगली जिले में स्थित कृष्णनगर नमक स्थान पर, देवी सती के दाहिने कंधे गिरे थे। यहाँ देवी! कुमारी शक्ति और शिव, भैरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

उमा शक्तिपीठ, (बाएं कंधे), मिथिला, बिहार, भारत।

उमा शक्तिपीठ, भारत, बिहार राज्य (इंडो नेपाल सीमा के पास), मिथिला में जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास, देवी सती का बायाँ कन्धा गिरा था। यहाँ देवी! उमा या नील-सरस्वती शक्ति और महोदर, भैरव के रूप में अवस्थित हैं।

नल्हाटेश्वरी या कालिका, (गले की नली), नलहाटी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।

नल्हाटेश्वरी या कालिका, यह पीठ भारत में पश्चिम बंगाल राज्य, बीरभूम जिले के नलहाटी में स्थित हैं। यहाँ देवी सती के गले की नाली गिरी थी; यहाँ देवी! नल्हाटेश्वरी शक्ति और योगेश, भैरव रूप में प्रकट हैं।

चामुंडेश्वरी या दुर्गा शक्तिपीठ, (दोनों कान), मैसूर, कर्नाटक, भारत।

चामुंडेश्वरी या दुर्गा, यह पीठ भारत, कर्नाटक राज्य के मैसूर में चामुंडी पर्वत पर हैं। यहाँ देवी सती के दोनों कान गिरे थे; देवी! यहाँ दुर्गा शक्ति और अभिरु, भैरव के रूप में अवस्थित हैं।

महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, (भौंहें), वक्रेश्वर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।

महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, यह पीठ भारत, पश्चिम बंगाल राज्य, बीरभूम जिले में वक्रेश्वर, पम्प्हारा नदी के तट पर अवस्थित हैं। यहाँ देवी सती, कि भौंहें गिरी थी; यहाँ देवी! महिषमर्दिनी शक्ति और वक्रनाथ, भैरव के रूप में अवस्थित हैं। यहाँ २०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक के गरम पानी के श्रोत हैं, जो अनेक प्रकार के अलौकिक शक्तिओ से सम्पन्न हैं।

योगेश्वरी शक्तिपीठ, (पैर और हाथ के तलवे), खुलना, बांग्लादेश।

योगेश्वर शक्तिपीठ, यह पीठ शक्ति काली को समर्पित हैं तथा ईस्वरीपुर गांव, जेसोर, खुलना जिला, बांग्लादेश में स्थित हैं तथा जसोरेश्वरी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा प्रतापादित्य ने इस शक्ति पीठ की खोज की तथा वे इस स्थान में काली पूजा करते हैं। यहाँ देवी सती, की हाथ तथा पैर के तलवे गिरी थीं; देवी! योगेश्वरी शक्ति और चंदा, भैरव के रूप में विद्यमान हैं।

फुल्लौरा शक्तिपीठ, (निचले होंठ), लाभपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।

फुल्लौरा शक्तिपीठ, यह पीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिला, लाभपुर नमक गांव में स्थित हैं। यहाँ देवी सती के निचले होंठ गिरे थे; यहाँ देवी! फुल्लौरा शक्ति और विश्वेश, भैरव के रूप में अवस्थित हैं। यह मंदिर इमली के पेड़ो से घिरा हुआ हैं।

नंदिनी शक्तिपीठ, (गर्दन अस्थि), नन्दीपुर ग्राम, साईथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।

नंदिनी या नदीकेश्वरी शक्तिपीठ, यह पीठ नन्दीपुर ग्राम, साईथिया रेलवे स्टेशन के पास, बीरभूम जिला, पश्चिम बंगाल, भारत में अवस्थित हैं। यहाँ देवी सती की गर्दन अस्थि गिरी थी। यहाँ! देवी नंदिनी या नन्दिकेश्वरी शक्ति और नंदिकेश्वर, भैरव के रूप में विद्यमान हैं। देवी विग्रह यहाँ सिंदूर से लिप्त हैं जो बड़ी चट्टान के आकार लिये, कछुवे के पीठ के समान हैं, देवी वह शक्ति हैं जिनकी आराधना नंदी ने की थीं।

इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, (पायल), जाफना, श्रीलंका।

इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, यह पीठ नैनातिवु (मणिपल्लवम्), श्रीलंका के जाफना के नल्लूर में स्थित हैं। देवराज इंद्र ने यहाँ पर आदि शक्ति काली की पूजा की थी। दानव-राज रावण (श्रीलंका के शासक या राजा) और भगवान राम ने भी यहाँ देवी शक्ति की पूजा की हैं। यहाँ देवी सती की पायल (आभूषण) गिरी थी तथा यहाँ देवी! इन्द्राक्षी शक्ति और राक्षसेश्वर,भैरव के रूप में अवस्थित हैं।

दक्ष यज्ञ विध्वंस

दक्ष यज्ञ विध्वंस
देवी सती द्वारा देह त्याग पश्चात, वीरभद्र तथा महा-काली द्वारा दक्ष यज्ञ विध्वंस।