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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    आद्या शक्ति, दस महाविद्या के विभिन्न रूपों मैं। १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुनी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरुप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रम्हांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारन 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

श्री सम्पन्नता तथा अमृत प्राप्ति हेतु, सागर-मंथन।

देवताओं तथा दानवो द्वारा समुद्र मंथन

देवताओं तथा दानवो द्वारा समुद्र मंथन

दुर्वासा के शाप से इंद्र तथा देवताओं का "श्री या लक्ष्मी" हीन हो जाना।

एक समय की बात हैं, स्वर्गाधिपति इंद्र मधु पान से मत्त तथा कामासक्त हो, अप्सरा रम्भा के साथ एकांत में विहार कर रहे थे। उसी समय देवराज इंद्र ने, महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों सहित वैकुण्ठ से कैलाश पर्वत की ओर जाते हुए देखा, उन्हें देख इंद्र ने सर झुका कर मुनिराज तथा उनके शिष्यों को प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की। तदनंतर शिष्यों सहित मुनिराज दुर्वासा ने, इंद्र को शुभ आशीर्वाद दिया तथा भगवान् विष्णु द्वारा प्रदत्त परम मनोहर पारिजात पुष्प दी। मदोन्मत्त इंद्र ने दुर्वासा द्वारा आशीर्वाद स्वरूप प्रदान किये गए पारिजात पुष्प को अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर फेंक दिया। पारिजात पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत, भगवान् विष्णु के समान तेज, गुण तथा रूप के समान हो गया तथा इंद्र को छोड़ कर घोर वन में चला गया। देवराज इंद्र ऐरावत को रोक पाने में असमर्थ रहें। मुनिराज दुर्वासा इसे भगवान् विष्णु के पुष्प का तिरस्कार मान कर बड़े ही क्रुद्ध हुए।

मुनिराज ने इंद्र कहा : राज्य तथा श्री के अभिमान से प्रमत्त होकर तुमनें मेरा अपमान किया हैं। श्री विष्णु को समर्पित किये हुए वस्तुओं को सहर्ष ग्रहण कर लेना चाहिये, अन्यथा वो ब्रह्म हत्या का भागी होता हैं। जो मनुष्य सौभाग्य से प्राप्त हुए, भगवान् विष्णु के नवैद्ध का त्याग करता हैं, वह श्री, बुद्धि तथा राज्य से वंचित हो जाता हैं।

महर्षि दुर्वासा द्वारा भगवान् विष्णु के सम्बन्ध में बताना।

जो मनुष्य भगवान् श्री हरि विष्णु के नवैद्ध को प्रतिदिन ग्रहण करता हैं, भक्ति युक्त हो उनका स्तवन, पूजन करता हैं, वह स्वयं श्री हरि के सामान हो जाता हैं।
भगवान श्री हरि को भोग न लगा कर, स्वयं खाने वाला अन्न मांस भक्षण के सामान तथा देवल, कन्या विक्रयी, वेश्या-वृत्ति से आश्रित रहने वाले पुरुष द्वारा दिया गया अन्न, उच्छिष्ट, बासी, मित्र द्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न, झूठी गवाही देने वाले, तीर्थ प्रतिग्राही ब्राह्मणों का अन्न करने वाला; भगवान् विष्णु के नवैद्ध भक्षण से शुद्ध हो जाता हैं।
यदि चंडाल भी भगवान् विष्णु की उपासना करता हैं, तो वो अपनी करोड़ों पीढ़ियों का उद्धार कर देता हैं। श्री हरि की भक्ति न करने वाला मनुष्य स्वयं अपनी भी रक्षा करने में समर्थ नहीं होता हैं।
यदि कोई मनुष्य अनजाने में भी श्री हरि विष्णु के नवैद्ध को ग्रहण कर लेता हैं तो अपने सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता हैं।

हे इंद्र तुमने अहंकार से मद हो, इस पारिजात पुष्प को हाथी के मस्तक पर फेंक दिया हैं, यहाँ पारिजात पुष्प जिस के सर पर रहता हैं, उस की पूजा भी श्रेष्ठ मानी जाती हैं, इस अपराध के कारण लक्ष्मी जी तुम्हारा त्याग कर भगवान् श्री हरि के पास चली जाये।

इंद्र का अपने गुरु बृहस्पति की शरण में जाना, बृहस्पति सहित इंद्र का पितामह ब्रह्मा जी के पास जा, समस्या के निवारण हेतु निवेदन करना।

तत्पश्चात्, अमरावती पुरी पहुँच कर इंद्र ने देखा कि स्वर्ग दैत्यों तथा असुरों से भरा पड़ा हैं, महान उपद्रव की स्थिति हैं, सर्वत्र भय व्याप्त हैं तथा स्वर्ग के समस्त रत्न तथा वैभव लुप्त हो गया हैं। इस प्रकार दयनीय स्थिति को देख, देवराज इंद्र गुरु बृहस्पति के पास गए, उन्हें प्रणाम कर वे अपने गुरु देव के चरणों पर पड़ कर, उच्च स्वर से विलाप कर लगे तथा उन्हें समस्त परिस्थिति से अवगत करवाया। गुरु बृहस्पति ने इंद्र को सांत्वना दी तथा उपदेश दिया की कर्म का फल भोगना ही पड़ता हैं, फल स्वरूप उन्हें पुनः अपने पद तथा राज्य की प्राप्ति हेतु जनार्दन श्री विष्णु की आराधना करनी चाहिये। जो मनुष्य इस संसार में घोर विपत्ति के समय, भगवान् श्री हरि का स्मरण करता हैं, उसके लिये विपत्ति में भी संपत्ति उत्पन्न हो जाती हैं, ऐसा भगवान् शिव ने कहा हैं। श्री विष्णु का ध्यान कर, देवराज इंद्र समस्त देवताओं के साथ गुरु बृहस्पति को आगे कर ब्रह्मा जी के पास गए तथा ब्रह्मा जी को प्रणाम किया। गुरु बृहस्पति ने ब्रह्मा जी से समस्त वृत्तांत सुनाया, जिसे सुन ब्रह्मा जी हंस कर इंद्र से कहा !
तुम मेरे वंश में उत्पन्न हुए हो, परम प्रतापी दक्ष प्रजापति तुम्हारे नाना हैं, बृहस्पति जी के गुरु हो, जिसके तीन कुल पवित्र हो, वह पुरुष अहंकारी कैसे हो सकता हैं? भगवान् विष्णु समस्त प्राणियों में आत्मा रूप से विराजमान हैं, उनके शरीर का त्याग करने पर जीवित प्राणी शव हो जाता हैं, मैं, शरीर में इन्द्रियों का स्वामी मन हूँ, शंकर ज्ञान रूप रूप धारण कर देह में रहते हैं, भगवान् विष्णु की प्राण स्वरूपा श्री राधा मूल प्रकृति के रूप में तथा भगवती दुर्गा बुद्धि रूप में स्थित रहती हैं। मैं, शिव, विष्णु, शेष-नाग, धर्म इत्यादि जिनके अंश से उत्पन्न हुए हो, उन्हीं भगवान् श्री हरि के पवित्र पुष्प का तुमने अपमान किया हैं। भगवान शिव ने जिस पुष्प से, श्री हरि की पूजा की थीं उसी पुष्प को दुर्वासा द्वारा तुम्हें दिया गया था, परन्तु तुमने उसका तिरस्कार किया। भगवान् कृष्ण के चरणकमल से च्युत, वह पुष्प जिस के भी पास रहता हैं, उसकी पूजा सभी देवता भी करते हैं। भगवान् श्री हरि के पुष्प का त्याग करने के कारण ही, श्री देवी ने रुष्ट हो तुम्हारा त्याग कर दिया। अतः तुम इसी समय मेरे और गुरु बृहस्पति के साथ वैकुण्ठ चलो।

समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के साथ समस्या निवारण हेतु भगवान् श्री हरि के पास जाना तथा श्री हरि के द्वारा स्थिर लक्ष्मी रहने के उपायों के साथ, लक्ष्मी जी को पुनः जन्म के लिये आदेश देना।

ऐसा कह कर ब्रह्मा जी समस्त देवताओं को साथ ले, वैकुंठ लोक गए, वहाँ उन्होंने शांतभाव से विराजित भगवान् श्री विष्णु को देखा तथा सभी ने उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम करने के पश्चात्, ब्रह्मा जी ने उन्हें वर्तमान परिस्थिति से परिचित करवाया, श्री हरि ने देखा की समस्त देवता रो रहे हैं तथा भय ग्रस्त, रत्न तथा आभूषण से रहित, शोभा शून्य, श्री हीन, निस्तेज देखा। तदनंतर भगवान् हरि ने समस्त देवताओं को आश्वासन दिया की उनके रहते वो न डरे, वे उन्हें परम एश्वर्य की वृद्धि करने वाली स्थिर लक्ष्मी प्रदान करेंगे। उस समय उन्होंने समस्त देवताओं से ध्यानपूर्वक कुछ समयोचित बातें, जो परम हितकारी थीं, सुनने के लिये कहा। मेरे प्रति समर्पित मेरा निरंकुश भक्त, जिसके ऊपर रुष्ट हो जाता हैं, उसके घर में, मैं कभी लक्ष्मी सहित नहीं रहता हूँ। महर्षि दुर्वासा, भगवान् शंकर के अंश से उत्पन्न परम वैष्णव हैं, उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया हैं, परिणामस्वरूप मैंने लक्ष्मी सहित तुम्हारे घर का त्याग किया हैं।

इसके साथ भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी जी की अचल स्थिरता हेतु निम्न उपाय बताये :

जहाँ, शंख ध्वनि, भगवान् शिव की पूजा, ब्राह्मण भोजन तथा तुलसी नहीं होती, वहाँ लक्ष्मी जी का वास नहीं होता हैं।
जहाँ मेरी तथा मेरे भक्त की निंदा होती हैं, वहाँ से लक्ष्मी रुष्ट हो कर चली जाती हैं।
जो मनुष्य मेरे भक्ति से रहित हैं तथा एकादशी तथा मेरे जन्मदिन को भोजन करता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो व्यक्ति मेरे नाम का तथा अपनी कन्या का विक्रय करता हैं, अतिथि भोजन नहीं करते हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
अगर कोई ब्राह्मण वैश्या से विवाह करता हैं तथा जो विप्र ऐसे पापियों के घर जाते हैं, उनके घर से भी कमलासना लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो ब्राह्मण बैल हाकने का कम करता हैं, उनके घर का भी लक्ष्मी त्याग कर देती हैं।
जो ब्राह्मण अशुद्ध ह्रदय वाला, क्रूर, हिंसक, दूसरों की निंदा करने वाला, व्रत-उपवास तथा संध्या वंदन न करने वाला, होता हैं उसके घर से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो नखों से निष्प्रयोजन अंग तोड़ता हैं या नखों को खुरेद्ता रहता हैं, जिसके यहाँ से ब्राह्मण निराश हो कर चला जाये, उस का भी लक्ष्मी जी त्याग कर देती हैं।
जो ब्राह्मण दिन में मैथुन करता हैं, सूर्योदय के समय भोजन करता हैं तथा दिन में शयन करता हैं उस के यहाँ से लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो ब्राह्मण आचार विहीन, दीक्षा हीन हैं उस के घर से भी लक्ष्मी जी चली जाती हैं।
जो नग्न हो कर अथवा भीगे पैर सोता हैं तथा वाचाल कि भाति निरंतर बोलता ही रहता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी चली जाती हैं।
जो व्यक्ति अपने किसी अंग को बजे की तरह बजता हैं तथा अपने सर में तेल लगा कर शारीर के दूसरे अंग का स्पर्श करता हैं, उस के घर से भी लक्ष्मी जी चली जाती हैं।
जो व्यक्ति ब्राह्मण की निंदा करते हैं तथा द्वेष भाव रखते हैं, अन्य प्राणियों के प्रति दया भाव नहीं रखता, जीवों की हिंसा करता हैं, उसके घर का भी लक्ष्मी जी त्याग कर देती हैं।
जिस जिस स्थान पर भगवान् विष्णु की पूजा अर्चना होती हैं, संकीर्तन आदि होता हैं, भगवती लक्ष्मी उस स्थल का कभी त्याग नहीं करती हैं।
जहाँ श्री कृष्ण तथा उनके भक्तों का यशोगान होता हैं, वहाँ से लक्ष्मी जी कभी अंतर्धान नहीं होती हैं।
जिस स्थल पर शालग्राम, तुलसीदल तथा शंख रहते हैं, वहाँ पर लक्ष्मी जी सर्वदा निवास करती हैं।
जहाँ शिव-लिंग की पूजा तथा भगवती दुर्गा का नाम कीर्त्तन होता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी कही नहीं जाती।
जहाँ ब्राह्मणों की सेवा होती हैं, उन्हें भोजन कराया जाता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी कही नहीं जाती हैं।

ऐसा कह कर, श्री हरि विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा की सागर के यहाँ तुम अपनी एक कला से जन्म धारण करो। लक्ष्मी जी को ऐसा कह कर, श्री हरि विष्णु ने कमलोद्भव ब्रह्मा जी से समुद्र का मंथन करने के लिये कहा तथा समुद्र मंथन से प्राप्त होने वाली लक्ष्मी देवताओं को सौंप दीजिए। परन्तु अकेले देवताओं में वो बल नहीं था जिस से वो समुद्र का मंथन कर सकें, परिणामस्वरूप श्री हरि ने देवताओं को दानवों से मिल कर, समुद्र मंथन करने की सलाह दी।
भगवान विष्णु, देव-गणो से बोलें ‘‘समस्त देव गण ! मेरी बात ध्यान पूर्वक सुनें, क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय हैं। दैत्यों पर इस समय महा-काल की विशेष कृपा हैं, इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तुम दैत्यों से संधि कर लो। क्षीर-सागर के गर्भ में अनेक दिव्य रत्नों के साथ-साथ अमृत भी छिपा हैं तथा उस अमृत का पान करने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती हैं, अमरत्व प्राप्त होता हैंं। इन सभी रत्नों के साथ उस अमृत को प्राप्त करने के लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा। यह कार्य अत्यंत दुष्कर हैंं, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो। कूट-नीति भी यही कहती हैं, कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए। तत्पश्चात् जब अमृत पीकर, सभी अमर हो जाओगे, तब दुष्ट दैत्य भी तुम्हारा अहित नहीं कर सकेंगे। देवगण ! इस कार्य के लिए दैत्य जो शर्त रखें, उसे स्वीकार कर लें। यह बात याद रखें कि शांति से सभी कार्य बन जाते हैंं, क्रोध करने से कुछ नहीं होता।’’ भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण, दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया। परिस्थिति के अनुसार शत्रु को भी मित्र बना लेना चाहिए, दैत्यों की सहायता से यहा कार्य बड़ी ही सुगमता से हो जायेगा तथा समुद्र मंथन से सर्वाधिक महत्वपूर्ण अमृत प्राप्त होगा, जिसके पान से सभी देवता अमर हो जायेंगे। उस समय दानवो के राजा प्रतापी बलि थे, तीनों लोकों पर उनका अधिकार था, वे परम शिव भक्त तथा विष्णु भक्त थे। इंद्र द्वारा समझाने पर वे देवताओं के साथ मिल कर, समुद्र मंथन करने के लिये तैयार हो गए तथा मंथन से प्राप्त होने वाले रत्नों को आपस में बाँट लेने का निश्चय किया।

समुद्र मंथन, मंथन से प्राप्त रत्न तथा मंथन पश्चात् की परिस्थिति।

"समुद्र मंथन हेतु, वासुकि नाग को नेति के रूप में प्रयोग किया गया, श्री हरि ने कच्छप अवतार धारण कर, मन्दराचल पर्वत जो एक लाख योजन चौड़ा था, अपनी पीठ पर घूमने हेतु धारण किया। दैत्य वासुकि नाग के मस्तक के भाग के ओर थे और देवता पूछ की ओर। देवता तथा दानव दोनो मिल कर सागर का मंथन करने लगे।
  1. १. समुद्र मंथन से सबसे प्रथम, हलाहल विष निकला, उस विष की ज्वाला तथा विषाग्नि से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर से प्रार्थना की, उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष का पान कर लिया, किन्तु शंकर जी ने विष को कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया, परिणामस्वरूप महादेव जी को नीलकण्ठ नाम से भी जाना जाता हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं तथा वनस्पतिओं ने ग्रहण कर लिया।
  2. २. समुद्र से द्वितीय रत्न कामधेनु गाय प्राप्त हुई, जिसे ऋषियों ने रख लिया।
  3. ३. तृतीय उच्चैःश्रवा घोड़ा प्राप्त हुआ, जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया।
  4. ४. चतुर्थ ऐरावत हाथी रत्न रूप में प्राप्त हुआ, जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया।
  5. ५. पंचम कौस्तुभमणि समुद्र से प्राप्त हुई, जो भगवान् विष्णु की शोभा बनीं।
  6. ६. षष्ठी, अप्सरायें (मेनका, रम्भा, उर्वशी, ऋतम्भरा, तिलोतम्मा आदि) निकलीं, जिन्हें इन्द्र आदि देवताओं ने स्वर्ग की शोभा बढ़ाने तथा सुख पहुंचाने के लिया ले लिया।
  7. ७. सातवाँ, चन्द्रमा जो शिव के मस्तक पर शोभायमान हुआ।
  8. ८. अष्टम, दक्षिणावर्ती शंख, जो कि भगवान विष्णु के ऊपरी बाएँ हाथ में शोभायमान हुआ।
  9. ९. नवम "ज्येष्ठा या अलक्ष्मी", जो की धन हीनता के साथ दुर्भाग्य का प्रतिक हैं, जिन्हें दुसह नमक ऋषि को दे दी गई।
  10. १०. दसवीं वारुणि नाम की मदिरा" निकली जिसका पान राक्षसों ने किया।
  11. ११. एकादश, कमला जी का अवतरण समुद्र से हुआ, सभी देव और असुर लक्ष्मी जी को लेने के लिये व्याकुल हो रहे थे। सभी ब्राह्मणों ने लक्ष्मी जी को आसन पर बैठा कर उनकी पूजा-अर्चना की। इसके बाद लक्ष्मी जी ने अपने हाथों में वर माला लेकर भगवान विष्णु का वरण किया। तत्पश्चात्, कमला जी की समस्त देवताओं, शिव तथा ब्रह्मा जी ने पूजा-स्तुति की, जिससे प्रसन्न हो कर देवी ने पुनः देवताओं के घर पर अपनी कृपा दृष्टि डाली।
  12. १२. द्वादश "धन्वंतरि जी अमृत कलश" हाथों में लेकर निकले। ये साक्षात् विष्णु भगवान के अंश अवतार थे।
समुद्र मंथन करने का मुख्य उद्देश्य, अमृत प्राप्त करने के साथ, माता लक्ष्मी को पुनः प्राप्त कर देवताओं को प्रदान करना था। इस प्रकार देवताओं तथा दानवों ने मिल कर समुद्र मंथन का कार्य सम्पूर्ण हुआ, परन्तु अंतिम रत्न अमृत को ले कर देवताओं तथा दैत्यों में विवाद हो गया। अमृत पी कर, दैत्य तथा देव दोनों ही अमरत्व प्राप्त करना चाहते थे, परन्तु देवता नहीं चाहते थे की दैत्य अमृत का पान कर अमरत्व प्राप्त करें। अतः दैत्यों तथा देवताओं में युद्ध हुआ, परन्तु देवता उस समय मुनि दुर्वासा के शाप के कारण निर्बल हो गए थे, परिणामस्वरूप दैत्यों ने अमृत कलश देवताओं से छीन कर भाग गए।
१२ वर्षों तक देवता, असुरों के पीछे अमृत प्राप्त करने हेतु, भागते रहें। अंतत भगवान् विष्णु के प्रत्यक्षतथा परोक्ष रूप से हस्तक्षेप से समस्त देवताओं ने छल से अमृत का पान किया तथा असुरों में, केवल राहु ही ऐसे थे, जिसने अमृत का पान किया। परन्तु, भगवान् विष्णु को इस तथ्य का ज्ञात होने पर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक काट दिया। अमृत पान करने के परिणामस्वरूप राहु ने अमरत्व प्राप्त की, मस्तक कट जाने पर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई, सर तथा धड़ के रूप में वे आज भी जीवित हैं। उनका मस्तक राहू तथा शरीर केतु नाम से जाना जाता हैं।

भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार तथा देवताओं को छल से अमृत पान करना।

१२ वर्षों तक देवता, दैत्यों के पीछे अमृत कलश को प्राप्त करने हेतु भागते रहें, अंतत दैत्य अमृत ले कर पाताल चेले गए। पीछे पीछे देवताओं के पाताल जाने पर, महाराज बलि ने देवताओं को वापस लौट जाने के लिये कहा, देवता रत्नमय सामग्रियों को प्राप्त कर चुके थे, अतः अमृत पर दैत्यों का ही अधिकार हैं। समस्त देवता भगवान विष्णु के पास गए तथा देवताओं की निराशा को देखकर श्री हरि ने योग-माया से प्रभावित मोहिनी अवतार धारण किया तथा दैत्यों के पास गए। उनके मनोहर विश्व मोहिनी रूप को देखकर दैत्य तथा देवता ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शिव भी मोहित हो, उनकी ओर बार-बार देखने लगे। दैत्यों ने जब भगवान विष्णु के अति सुन्दर मोहिनी अवतार को देखा, तब वे कामासक्त होकर सब कुछ भूल गए तथा मोहिनी देवी को ही एकटक देखने लगे।

राजा बलि ने मोहिनी देवी के मोह से प्रभावित हो कर, उन्हें विवाद की शांति हेतु अमृत का बटवारा करने के लिये कहा। पहले तो मोहिनी देवी ने एक मनोहर नारी पर अत्यधिक विश्वास न करने की सलाह दी, परन्तु समस्त दानव योग-माया के मोह से मोहित थे, उन्होंने मोहिनी देवी को ही अमृत के विभाजन तथा पान करने का कार्य सौंप दिया। मोहिनी देवी ने अगले दिन अमृत पान करने की सलाह दी, मोहिनी देवी के आदेशानुसार अगले दिन समस्त दैत्य स्नान कर अमृत पान करने हेतु पंक्ति में बैठे, देवता भी वहाँ आ कर बैठ गए। देवताओं के वहाँ अपने पर, मोहिनी देवी राजा बलि से बोलीं, "इन्हें आप लोग अपने अतिथि समझें, ये धर्म को ही सर्वस्व मान कर उस का साधन करने वाले हैं। इनके लिये यथा शक्ति दान देना चाहिये, जो लोग अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों का उपकार करते हैं, उन्हें ही धन्य मानना चाहिये, वे ही सम्पूर्ण जगत के रक्षक तथा परम पवित्र हैं, जो केवल अपना पेट भरने के लिये उद्योग करते हैं, वे क्लेश के भागी होते हैं।" मोहिनी देवी के इस प्रकार कहने पर, असुरों के देवताओं को भी अमृत पान करने हेतु आमंत्रित किया। तदनंतर मोहिनी देवी ने कहा की, वेद कहते हैं की सबसे पहले अतिथियों का सत्कार होना चाहिये, महाराज बलि अप स्वयं ही कहे की में पहले किस को अमृत पान कराया जाये? बलि ने उत्तर दिया, देवी आप की जैसे रुचि हो।

मोहिनी देवी ने शीघ्रता से देवताओं के समूह को अमृत का पान कराया, देवताओं के इस छल को राहु नाम का दैत्य समझ गया तथा चुपके से देवताओं की पंक्ति पर आ कर अमृत का पान कर लिया। राहु द्वारा छल से अमृत पान, सूर्य तथा चन्द्रमा द्वारा देख लिया गया तथा तुरंत इस की सूचना भगवान् विष्णु को दी। भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु के सर को धढ़ से अलग कर दिया, परन्तु अमृत का पान करने के परिणामस्वरूप उस की मृत्यु नहीं हुई। मोहिनी देवी भी उस स्थान का त्याग कर वहाँ से चली गई, दैत्यों पर से महा-माया का मोह चला गया,दैत्य समझ गए की उनके साथ छल हुआ हैं, फिर वहा दैत्यों तथा दानवों में युद्ध प्रारंभ हो गया। अंतत, देवराज इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त कर स्वर्ग को पुनः अपने अधिकार में ले लिया।

भगवान् विष्णु के मोहिनी अवतार पर शिव जी का मोहित होना, समुद्र मंथन

भगवान् विष्णु के मोहिनी अवतार पर शिव जी का मोहित होना
समुद्र मंथन