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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    आद्या शक्ति, दस महाविद्या के विभिन्न रूपों मैं। १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुनी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरुप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रम्हांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारन 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

शिव तथा शक्ति से सम्बंधित नाना तथ्यों का समायोजन

देवी उग्र तारा

देवी उग्र तारा

मेरे बारे में अधिक

अध्यात्म, मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग हैं, बचपन से ही मेरी हिन्दू धर्म के प्रति विशेष आस्था हैं। इसी आस्था के अनुसार, हिन्दू धर्म को और अधिक जानने कि कामना स्वरूप, विभिन्न ग्रंथो जैसे पुराण, वेद, आगम या तंत्र ग्रन्थ इत्यादि, का अवलोकन मेरे द्वारा हुआ हैं। बचपन से ही मेरी इस ओर विशेष रुचि थी तथा आगे जाके ये रुचि और अधिक बड़ी। इस वेब साइट द्वारा में हिन्दू धर्म के शैव तथा शक्ति संप्रदाय के विचारों, मान्यताओ को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहन हूँ। हिन्दू धर्म को अन्वेषण करने से, जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ हैं, उसे इस माध्यम द्वारा प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।

मेरे अनुसार कर्म की व्याख्या ही धर्म हैं अर्थात मनुष्य जो कर्म करता है उस का स्वरूप ही धर्म हैं। हिन्दू धर्म कई संप्रदाय तथा वर्णो में बटा हैं। संप्रदाय अनुसार, सांसारिक तथा संन्यासी ये दो संप्रदाय, मूल संप्रदाय हैं तथा चार वर्ण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सूद्र। संन्यासी, सांसारिक बंधनों के मुक्त हो, समस्त कामनाओ का त्याग कर, आद्यात्मिक उन्नति तथा धर्म का प्रचार करता हैं। सांसारिक समुदाय, अपने अपने स्वाभाविक कर्मों का पालन करते हुए, वंश वृद्धि चक्र को बढ़ता हैं। इस चराचर जगत का परिचालन, भिन्न भिन्न शक्तिओ द्वारा होता हैं तथा कर्म के स्वरूप के अनुसार ये तीन भागों में बटा हैं। १. सत्व गुण (पालन करना) २. रजो गुण तथा (श्रृष्टि करना) ३. तामसी गुण (विध्वंस करना), इन्हीं तीनो गुणों के अनुसार ही सम्पूर्ण जगत परिचालित होते हैं। मनुष्य तथा अन्य जीव जन्तुओं का स्वाभाव भी, इन्हीं तीनो गुणों से निर्मित होता हैं।

हिन्दू धर्म के अनुसार, त्रि-देव विष्णु, ब्रह्मा तथा शिव तथा उन की पत्नियां क्रमशः लक्ष्मी, सरस्वती तथा पार्वती, इन तीनो गुणों क्रमशः सत्व, रजो तथा तमो गुण के प्रतिक तथा आदि देव हैं। स्वाभाविक रूप से, सत्व गुण, देवताओं तथा पालन से, रजो गुण, यक्ष, गन्धर्वो तथा नूतन श्रृष्टि या निर्माण से तथा रजो गुण, भूत-प्रेत तथा विध्वंस से सम्बंधित हैं। यहाँ समस्त चराचर जगत इन्हीं का ही स्वरूप ही तथा जगत की प्रत्येक वस्तु में विद्यमान हैं। यहाँ, मैंने आदि या आद्या शक्ति काली से सम्बंधित विभिन्न तथ्यों को संग्रहित कर, प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैं अपना इष्ट देवी भगवती तारा देवी को मानता हूँ।

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  • सोमवार से शनिवार : सुबह ८ तो ११ रात ( भारतीय मानक समय )

चित्रों द्वारा देवी तारा का स्वरूप

देवी उग्र तारा
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