सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा

समस्त जीवों के पितामह, अपने ज्ञान से ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थूल तथा परा जीव तथा वस्तुओं का निर्माण करने वाले 'पितामह ब्रह्मा जी'। संसार या ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता, तमो गुण सम्पन्न, सृजन कर्ता।

पालन-कर्ता विष्णु

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालन-हार, पालन-पोषण के कर्त्तव्य या दाइत्व का निर्वाह करने वाले, सत्व गुण सम्पन्न 'श्री हरि विष्णु'। सृजन के पश्चात् तीनों लोकों के प्रत्येक तत्व तथा जीव का पालन-पोषण करने वाले।

संहार-कर्ता शिव

तीनों लोकों में विघटन या विध्वंस के प्राकृतिक लय के अधिष्ठाता, तमो गुण सम्पन्न 'शिव'। वह शक्ति जो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीवित तथा निर्जीव तत्व के विघटन के कार्यभार का निर्वाह करती हैं।

देवताओं को पुनः स्वर्ग सिंहासन प्राप्त कराने हेतु 'वामन अवतार'।

माता अदिति के तपस्या से संतुष्ट हो, स्वर्ग के सिंहासन सहित तीनों लोकों को राजा बलि से प्राप्त कर, देवराज इंद्र को प्रदान कर देवताओं की सहायता कर, बलि को पाताल भेजना।

विरोचन पुत्र राजा बलि, दान दाताओं में सर्वश्रेष्ठ।

विरोचन पुत्र बलि का जन्म, हिरण्य-कश्यप के वंश में में हुआ था तथा प्रह्लाद, बलि के दादा थे। प्रजा के कल्याण को बलि राज अपना परम कर्त्तव्य समझते थे। राजा बलि बाल्य अवस्था से ही बहुत उदार बुद्धि युक्त तथा सब में सम भाव रखने वाले थे तथा दान प्रदान करने वालों में सर्वश्रेष्ठ थे। मर्यादा तथा सभी के प्रति सम भाव उनके राज की विशेषता थीं, याचक जिन जिन कामनाओं को प्राप्त करने की इच्छा करते हैं, बलि सम्पूर्ण याचकों को वहीं वास्तु प्रदान करते थे। एक समय स्वर्ग के आसन पर बलि प्रतिष्ठित हुए तथा महेंद्र से भी अधिक शोभायमान हुए, ऋषि, अप्सरा, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा असुर समुदाय, इंद्र की ही भाति उनकी सेवा करते थे। राजा बलि के पिता विरोचन भी महा दानी थे, वे दान देना ही राजा का परम धर्म समझते थे। अपने पुत्र बलि के दानव गुरु शुक्राचार्य के विद्या प्राप्ति के पश्चात्, नगर आगमन से हर्षित होकर उन्होंने दान यज्ञ किया। उस दान यज्ञ में देवराज इंद्र, ब्राह्मण के भेष में आ कर, विरोचन से उनका कटा हुआ मस्तक दान स्वरूप मांग लिया और दान धर्म के अनुसार दानव पति विरोचन ने अपना मस्तक काट कर इंद्र को दे दिया।

दानव और दैत्य दोनों ही कश्यप जी के संतान हैं, दानवों को पाताल का राज्य दिया गया तथा देवताओं को स्वर्ग का राज, परन्तु स्वर्ग पर जिस का अधिकार हो तीनों लोक उसी के अधीन होता हैं। दैत्य हिंसक प्रवृति, वीर, पराक्रमी थे और देवता शांत स्वभाव सम्पन्न तथा भोग विलासी थे, यज्ञ भाग केवल देवताओं को प्राप्त होता था, दानवों पर यज्ञ भाग का कोई अधिकार नहीं था। इस से रुष्ट हुए, दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने इंद्र को इन्द्रासन से हटा, दैत्यों को स्वर्ग तथा इन्द्रासन का अधिपति बनाने का प्रण किया तथा स्वर्ग में अपने स्थान का त्याग किया। १०० अश्वमेघ यज्ञ करने वाला इन्द्रासन का अधिकारी होता हैं, सर्वप्रथम इंद्र ने ही १०० अश्वमेघ यज्ञ अनुष्ठान पूर्ण किया तथा अमरावती पूरी के राज्य को प्राप्त किया। जब जब किसी ओर ने १०० अश्वमेघ यज्ञ करने का प्रयत्न किया तो इंद्र ने छल, कपट, युद्ध इत्यादि प्रपंचों से १०० यज्ञ पूर्ण नहीं होने दिया। दैत्य गुरु शुक्राचार्य, महाराज बलि से १०० अश्वमेघ यज्ञ करवा कर, इन्द्रासन पर दैत्यों का अधिकार चाहते थे, इसी उद्देश से बलि को बाल्य काल से ही अपने आश्रम पर शिक्षा, प्रशिक्षण प्रदान करते थे।

विरोचन पुत्र बलि के पूर्व जन्म का वृत्तांत।

निष्काम दान से ज्ञान प्राप्त होता हैं ओर ज्ञान से मोक्ष।

आदि काल में देवताओं तथा ब्राह्मणों की निंदा करने वाला, पराई स्त्रियों में आसक्त रहने वाला, एक जुवारी था। एक दिन उसने छल से जुये से बहुत धन जीत कर, नाना द्रव्यों का क्रय कर वेश्या के घर जाने की इच्छा से दौड़ा। रास्ते पर दुर्बलता वश वो पृथ्वी पर गिर गया तथा उसे क्षण मूर्च्छा आ गई, पुनः मूर्च्छा दूर होने पर उसके मन में सुबुद्धि उत्पन्न हुई और दुखी हो कर खेद ओर वैराग्य को प्राप्त हुआ। उसने पृथ्वी पर पड़ी हुए श्रेष्ठ सामग्रीयों जैसे गंध, पुष्प इत्यादि जो वो वेश्या के निमित्त ले जा रहन था, भगवान् शिव को अर्पित कर दिया। मृत्यु-पश्चात् जब वो यम राज के सन्मुख प्रस्तुत हुआ, उसके पाप कर्मों के अनुसार उसे नाना प्रकार के नरकों में यातना भोगने का निर्देश दिया गया। परन्तु उसके कहने पर उसके द्वारा किये गए पुण्य का भी विचार किया गया, केवल मात्र मृत्यु से पूर्व भगवान् शिव को गंध, पुष्प इत्यादि समर्पित करने का एक ही पुण्य, चित्रगुप्त जी उसके जीवन काल प्राप्त हुआ। इस पुण्य के प्रभाव से उसे ३ घड़ी के लिए, इंद्र का प्रसिद्ध आसन प्राप्त होगा, चित्रगुप्त के ऐसा कहने पर जुवारी ने सब से पहले अपने शुभ कर्म का फल भोगने का निश्चय किया।
तदनंतर ऐरावत हाथी पर बैठा कर, स्वयं देव गुरु बृहस्पति जुवारी को ले अमरावती पुरी पहुँचें तथा उसे इन्द्रासन पर बैठाया। जुवारी ने वहाँ जा कर दान करना प्रारंभ किया, ऐरावत हाथी अगस्त मुनि को दी, उच्चैश्रवा नाम का घोड़ा विश्वामित्र को दे दिया, कामधेनु गाय वसिष्ठ को, चिंता-मणि रत्न गालव मुनि को, कल्प-वृक्ष कौंडिन्य मुनि को दान कर दिया, स्वर्ग लोक के नाना रत्न उस जुवारी ने भगवान् शिव की प्रसन्नता हेतु अन्य ऋषि-मुनियों को दान कर दिया। जब तक ३ घड़ी पूरी नहीं हुई, जुवारी दान देता ही गया, ३ घड़ी पश्चात् वो स्वर्ग से चला गया। इंद्र ने वापस लौट कर देखा की स्वर्ग रत्न रहित हैं, उन्होंने बृहस्पति जी से रत्नों के लोप कोने का कारण पूछा। देव गुरु, बोलें जुवारी ने यहाँ आ कर महान कर्म किया हैं, जब तक उस की सत्ता रही हैं उसने समस्त रत्न ऋषियों को दान कर दिया। अपनी समृद्धि पुनः प्राप्त करने के निमित्त, इंद्र देव गुरु बृहस्पति के साथ यम राज के पास गए तथा इंद्र धर्म राज से कहा; तुम ने मेरा पद एक दुरात्मा जुवारी को दे दिया ओर उस ने वहाँ पहुँच कर बहुत बुरा काम किया, उसने समस्त रत्न ऋषियों को दान कर दिये, अपने एक जुवारी को मेरा पद कैसे दे दिया? धर्म राज ने इंद्र से कहा; तुम बड़े बड़े देवेश्वरों के राजा हो, बुढे हो गए हो किन्तु अभी तक तुम्हारी राज्य विषयक आसक्ति पूरी नहीं हुई, केवल १०० यज्ञ का अनुष्ठान कर तुमने एक ही जन्म के उपार्जित पुण्य का फल तुमने यहाँ प्राप्त किया हैं, परन्तु जुवारी ने तुम्हारी उपेक्षा महान पुण्य प्राप्त किया हैं। अब, धन दे कर या मस्तक झुका बिनती कर तुम ऋषियों से अपने रत्न वापस प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये। इंद्र ने स्वर्ग जा कर बहुत धन दे कर ऋषियों से पुनः अपनी सारी वस्तुयें प्राप्त की।

ये जुवारी ही अपने अगले जन्म में विरोचन पुत्र बलि हुए। पूर्व जन्म में जुवारी के रूप में मृत्यु काल आने पर, भगवान् शिव को गंध, पुष्प समर्पित करने के पुण्य से वे इस जन्म जो बलि के रूप में था, शिव पूजा करते थे तथा श्रेष्ठ दानी हुए।

समुद्र मंथन में, दैत्यों द्वारा देवताओं की सहायता तथा योग-माया से मोहित भगवान् विष्णु का मोहिनी अवतार धारण कर देवताओं को अमृत पान कराना।

इंद्र द्वारा मद के अहंकार में, एक बार महर्षि दुर्वासा द्वारा दिये हुए पारिजात पुष्प की अवहेलना करने पर, रुष्ट ऋषि ने देवताओं को श्री हीन होने का शाप दे दिया। परिणामस्वरूप देवता सुख, वैभव, रत्न, बल हीन हो गए, इसे देख दैत्यराज बलि ने स्वर्ग को अपने अधिकार में ले लिया लिया। पुनः श्री सम्पन्नता तथा रत्नों की प्राप्ति हेतु, वे सभी देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान् विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र मंथन कर रत्नों को पुनः प्राप्त करने की सलाह दी, जिसमें अमृत प्राप्त करने का भी उद्देश्य था, जिसे पी कर समस्त देवता अमर हो जाना चाहते थे। परन्तु अकेले देवताओं में वो बल नहीं था जिस से वो समुद्र का मंथन कर सकें, परिणामस्वरूप श्री हरि ने देवताओं को दानवों से मिल कर, समुद्र मंथन करने की सलाह दी।
भगवान विष्णु, देव-गणो से बोलें ‘‘समस्त देव गण ! मेरी बात ध्यान पूर्वक सुनें, क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय हैं। दैत्यों पर इस समय महा-काल की विशेष कृपा हैं, इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तुम दैत्यों से संधि कर लो। क्षीर-सागर के गर्भ में अनेक दिव्य रत्नों के साथ-साथ अमृत भी छिपा हैं तथा उस अमृत का पान करने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती हैं, अमरत्व प्राप्त होता हैंं। इन सभी रत्नों के साथ उस अमृत को प्राप्त करने के लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा। यह कार्य अत्यंत दुष्कर हैंं, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो। कूट-नीति भी यही कहती हैं, कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए। तत्पश्चात् जब अमृत पीकर, सभी अमर हो जाओगे, तब दुष्ट दैत्य भी तुम्हारा अहित नहीं कर सकेंगे। देवगण ! इस कार्य के लिए दैत्य जो शर्त रखें, उसे स्वीकार कर लें। यह बात याद रखें कि शांति से सभी कार्य बन जाते हैं, क्रोध करने से कुछ नहीं होता।’’ भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण, दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया परिस्थिति के अनुसार शत्रु को भी मित्र बना लेना चाहिए, दैत्यों की सहायता से यहा कार्य बड़ी ही सुगमता से हो जायेगा तथा समुद्र मंथन से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अमृत प्राप्त होगा, जिसके पान से सभी देवता अमर हो जायेंगे। उस समय दानवो के राजा प्रतापी बलि थे, तीनों लोकों पर उनका अधिकार था, वे परम शिव भक्त तथा विष्णु भक्त थे। इंद्र द्वारा समझाने पर वे देवताओं के साथ मिल कर, समुद्र मंथन करने के लिये तैयार हो गए तथा मंथन से प्राप्त होने वाले रत्नों को आपस में बाँट लेने का निश्चय किया।
समुद्र मंथन के अंत में अमृत कलश के साथ धन्वंतर अवतरित हुए। अमृत कलश देवताओं से छीन को दानव पाताल ले गए, देवता नहीं चाहते थे की दानव अमृत पान कर अमरत्व प्राप्त करे। भगवान् विष्णु ने देवताओं के मनोरथ को सिद्ध करने हेतु, अत्यंत मनोहर मोहिनी अवतार धारण किया तथा पाताल गए। जिसे देख काम देव को भस्म करने वाले शिव भी विचलित हो गए, उन महामाया शक्ति मोहिनी को देख समस्त देवता मोहित हो गए तथा सभी दैत्यों को अमृत पान करने का भार उन मोहिनी देवी को दे दिया। मोहिनी देवी ने अमृत पान करने हेतु देवताओं को भी निमंत्रण देने का आग्रह किया, क्योंकि दानव तथा दैत्य दोनों भाई थे तथा दोनों ने मिल कर समुद्र का मंथन कर अमृत प्राप्त किया था। मोहिनी देवी की इच्छा अनुसार देवताओं को भी अमृत पान करने हेतु बुलाया गया तथा छल से देवी ने समस्त देवताओं को तो अमृत पिला दिया परन्तु दैत्यों को नहीं। इस छल को राहु नाम का दैत्य समझ गया तथा चुपके से देवताओं की पंक्ति में बैठ कर अमृत पान कर लिया, जिसे सूर्य तथा चन्द्रमा ने देख कर भगवान् विष्णु को तत्काल सूचना दी। भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु के सर को धढ़ से अलग कर दिया, परन्तु अमृत पान करने के कारण वश उसकी मृत्यु नहीं हुई। राहु का सर राहु नाम से तथा धढ़ केतु नाम से जाना गया। बस फिर क्या था, देवताओं ओर दैत्यों में युद्ध प्रारंभ हो गई, देवताओं ने दैत्यों को परास्त कर दिया तथा राजा बलि को भी मर डाला। परन्तु, दैत्य गुरु शुक्राचार्य मृत संजीवनी विद्या के ज्ञाता थे, उन्होंने पुनः बलि को जीवन प्रदान किया।

शिव के द्वारा चन्द्रमा की रक्षा कर अपने मस्तक पर धारण करना।

राहु के मस्तक कर जाने पर १०० करोड़ मुख्य मुख्य दैत्य, गरजते हुए देवताओं को ललकारते हुए युद्ध के लिए आगे बड़े। राहु चन्द्रमा को अपना ग्रास बना कर, इंद्र के पीछे दौड़ा तथा समस्त देवताओं को अपना ग्रास बनाने का इच्छुक था, परिणामस्वरूप देवताओं ने चन्द्रमा को पृथ्वी पर छोड़ कर, स्वर्ग का पलायन किया। राहु चन्द्रमा को निगल जाना चाहता था, यह देख चन्द्रमा ने भय से व्याकुल हो भगवान् शिव की शरण में जाने का विचार किया। चन्द्रमा मन ही मन सहायता हेतु भगवान् शिव की स्तुति करने लगे, परिणामस्वरूप भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए। भगवान् शिव ने चन्द्रमा के भय के निवारण हेतु, उन्हें अपने जटा-जुट में धारण कर लिया, तब से चन्द्रमा शिव जी के मस्तक पर शोभा पाते हैं। राहु ने भी भगवान् शिव की स्तुति की, राहु दैत्य होते हुए भी शिव भक्त था तथा इसी प्रभाव के कारण वो अमृत पान करने में समर्थ हुआ था। राहु ने शिव जी से कहा, मेरा भक्ष्य चन्द्रमा इस समय आप के पास हैं, कृपा कर उसे अप मुझे दे दीजिए। राहु द्वारा की गई स्तुति से शिव जी बहुत संतुष्ट हुए, भगवान् शिव के जटा-जुट में छिपे हुए चन्द्रमा ने राहु के ऊपर अमृत का स्राव किया, जिस से राहु के अनेक सर हो गए। देव कार्य की सिद्धि हेतु, भगवान् शिव ने राहु के मस्तकों की माला बना कर, अपने गले में धारण किया।

वामन अवतार का स्वरूप।
ब्रह्मचारी रूप धारी, वामन अवतार
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स्वर्गाधिपति देवराज इंद्र।
देवराज इंद्र
ब्रह्मचारी रूप धारी, वामन अवतार
ब्रह्मचारी रूप धारी, वामन अवतार

राजा बलि द्वारा लक्ष्मी जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाना तथा धन-तेरस पर्व का आरंभ।

राजा बलि अपनी सभी प्रजा में सम दृष्टि रखते थे, न्याय प्रिय तथा पुरुषोत्तम भाव से प्रजा का पालन करते थे। उन्होंने अपनी प्रजा में एक विकट असमानता का अवलोकन किया, कोई बहुत दरिद्र था तो कोई बहुत धनवान्, कुछेक के पास बहुत खाना, वैभव, सुख तथा को असंख्य लोग भूखे रहते थे, शरीर पर न मात्र के वस्त्र थे। इस पर वो विचलित हो गए तथा इसका कारण अपने गुरु शुक्राचार्य से पूछा। शुक्राचार्य ने बलि को बताया की इस भेद-भाव का कारण केवल लक्ष्मी जी हैं, जो सभी पर सम दृष्टि नहीं रखती हैं, वो ही धन, सुख, वैभव प्रदाता हैं। अगर बलि को अपनी समस्त प्रजा को सुखी देखना हैं तो, लक्ष्मी जी को पृथ्वी के समस्त प्राणियों पर सम दृष्टि रखनी पड़ेगी।
राजा बलि वैकुण्ठ गए तथा उन्होंने लक्ष्मी जी से पृथ्वी पर पधारने का सविनय निमंत्रण दिया, साथ ही उन्हें सभी प्राणियों पर सम भाव रखने का भी निवेदन किया। परन्तु, विष्णु पत्नी लक्ष्मी ने बलि के साथ पृथ्वी पर आने से माना कर दिया, जिस पर दोनों में विवाद हुआ, राजा बलि ने लक्ष्मी जी को पृथ्वी पर चलने की आज्ञा दी, क्योंकि बलि स्वर्ग का अधिपति था तथा वैकुण्ठ का भी अधिकारी था। तदनंतर, भगवान् विष्णु वहाँ आये तथा लक्ष्मी जी को बलि के साथ जाने की आज्ञा दी, कुछ दिन भगवान् विष्णु भी लक्ष्मी हीन रहें।
पृथ्वी पर लक्ष्मी जी का यथोचित आदर सत्कार हुआ, उन्हें स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा कर राजा बलि की पत्नी ने उनकी पूजा अर्चना की। लक्ष्मी जी ने बलि से पूछा की तुम मुझे यहाँ रख कर क्या करोगे? राजा बलि ने कहा 'में अप को यहाँ बंदी नहीं बना कर रखूँगा, में चाहता हूँ आप सारे भेद-भाव मिटा कर, दरिद्रों के झोप्रियों में रहें, कार्य करने वालों के पसीने के एक एक बुंद पर अप निवास करे, सभी पर सम दृष्टि रखें। जहाँ जहाँ अप नहीं हैं वहाँ के लोग कैसे जीवन निर्वाह करते हैं में अप का परिचय उस परिस्थिति से करवाना चाहता हूँ, अप की स्थापना करना चहता हूँ। कही कल की प्रजा ये न कहें की साक्षात् लक्ष्मी जी को अपने घर लाने वाले बलि राज ने अपनी प्रजा को भूखा रखा।' इस पर लक्ष्मी जी बहुत संतुष्ट हुई तथा बलि राज से कहा को वो बलि की प्रजा के लिये क्या कर सकती हैं। बाली राज ने लक्ष्मी जी से निवेदन किया, की कल अश्विन मास तेरस के दिन, राजा ओर प्रजा के सभी भेद-भाव मिटा कर अप की पूजा करें तथा अप सभी के ऊपर सम दृष्टि रखें तथा पृथ्वी के अंत तक ये दिन धन-तेरस के नाम से जाना जाये। जिसे लक्ष्मी जी ने स्वीकार कर लिया तथा बलि राज और प्रजा दोनों ने मिल कर लक्ष्मी जी की पूजा की तथा लक्ष्मी जी ने समस्त भेद-भाव मिटा कर अपनी कृपा दृष्टि सभी पर डाली।

आज भी इस दिन को धन-तेरस के रूप में मनाया जाता हैं।

बलि राज द्वारा १०० वा अश्वमेघ यज्ञ करना, वामन जी की बलि पर कृपा तथा दीपोत्सव पर्व या दीपावली।

बलि राज अपने १०० वे अश्वमेघ यज्ञ के अश्व को छोड़ते हुए, द्वार पर अये हुए याचक को इच्छित दान देने का संकल्प किया। भगवान् विष्णु के ब्रह्मचारी बालक रूप वामन ने माता अदिति को दिये हुए वचन अनुसार, देवताओं तथा दैत्यों के उचित अधिकार को पुनः प्राप्त कराने तथा जन कल्याण हेतु, देवताओं से सहायता मांगी। सूर्य देव ने अपना गायत्री मंत्र, पृथ्वी ने शरीर रक्षा के लिये मृग चर्म, चन्द्रमा ने भुजंग दंड, सावित्री ने माला, ब्रह्मा ने कमंडल, कुबेर ने भिक्षा पात्र, आकाश ने छत्र, जगदम्बा ने अपनी शक्ति वामन जी को प्रदान की।
देवताओं द्वारा दिये गए नाना शक्तियों से संपन्न हो, वामन जी राजा बलि के यज्ञ अनुष्ठान में याचक बन कर गए, वामन जी का स्वरूप अत्यंत ही मनोहर ब्रह्मचारी रूप में गए। उनके तेजस्वी रूप को देख कर सभी बहुत मोहित हुए, बलि राज ने उनसे दान मांगने के लिये कहा। वामन जी ने कहा, अगर अप दान देने के इच्छुक ही हैं तो पहले हाथ में जल ले कर दान का संकल्प करे। इस पर दैत्य गुरु शुक्राचार्य को ब्रह्मचारी बालक पर संदेह हुआ तथा वो जान गए की ये कोई ओर नहीं साक्षात् जगदीश्वर विष्णु हैं और वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने आये हैं। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने बलि को दान संकल्प करने से रोका पर बलि राज नहीं माने इस पर उन्होंने बलि को श्री हीन होने का शाप दे दिया। बलि ने जैसे ही कमंडल रूपी जल के पात्र से संकल्प हेतु जल हाथ में लेना चाहा, कमंडल से जल नहीं गिरा। कमंडल के मुँह को शुक्राचार्य शूक्ष्म देह धारण कर रोकें हुए थे, जिसे वामन जी ने तिनके के सहारे से कमंडल का मुँह साफ किया। परन्तु तिनके के चोट दे शुक्राचार्य के चक्षु को क्षति पहुँची तथा वे अंधे हो गए तथा चिल्लाते हुए बहार आये, उनके अनुसार वह उनका दैत्यों को बचाने का आखिरी प्रयास था तथा वे अन्यत्र चले गए।
शुक्राचार्य जी के जाने के पश्चात्, बलि राज ने हाथ में जल ले कर ब्रह्मचारी बालक को इच्छित दान देने का संकल्प किया। ब्रह्मचारी बालक ने बलि राज से तीन पग भूमि दान में मांगी तथा राजा बलि ने उन्हें तीन पग भूमि दान में देने का संकल्प किया। देखते ही देखते बालक रूपी ब्रह्मचारी बड़े होने लगे तथा सत्य लोक तक उन्होंने अपने अप को विस्तृत कर लिया। एक पग में उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी को ले लिया, दूसरे पग में सम्पूर्ण आकाश को अब तीसरे पग के लिए बलि के पास कुछ शेष नहीं रह गया था। दो पगों से ही वामन जी ने तीनों लोकों को ले लिया था, उन्होंने तीसरे पग को रखने के लिये बलि से स्थान देने के लिये कहा। बलि की पत्नी विन्ध्यावली ने वामन जी से कहा, मानव देह भी माटी का ही बना हुआ हैं, वो अपना तीसरा पग उनके पति बलि तथा उनके मस्तक पर रखें। इस पर वामन जी बहुत प्रसन्न हुए, अपना सर्वस्व दान करने वालों के वे दास होते हैं। भगवान् वामन ने अपने तीसरे पग रूप में अपना पैर बलि राज तथा उनकी पत्नी के मस्तक पर रखा तथा उन्हें पाताल भेज दिया। साथ ही आषाढ़ सुदी एकादशी से चार महीनों तक बलि राज का द्वार-पाल बन, पाताल में रहने का अपना विचार भी सुनाया। इस प्रकार इस चराचर जगत के ईश्वर भगवान् विष्णु ने बलि को सर्वोच्च स्थान देकर, यह सिद्ध किया की वो अपने भक्तों के दास हैं।

दीपोत्सव या दीपावली मनाने का कारण।

इस प्रकार स्वर्ग का राज्य देवताओं को पुनः प्राप्त हो गया, माता लक्ष्मी भी भगवान् विष्णु के पास वापस वैकुण्ठ चली गई। बलि राज ने वामन जी से कहा, अप ने छद्म से तीन दिन के भीतर मेरा सर्वस्व ले लिया, इन तीन दिनों तक पृथ्वी में मेरा ही राज रहें तथा इन तीन दिनों में दीपोत्सव के साथ उत्सव मानाने वालो के घर अप की पत्नी लक्ष्मी चिर वास करे। तब से अश्विन चौदस से तीन दिनों तक दीपोत्सव मनाया जाता हैं, जो दीपावली पर्व के नाम से प्रसिद्ध हैं।

पाप हरिणी गंगा की उत्पत्ति।

भगवान वामन ने दूसरे पग के लिये पैर ऊपर उठाया तथा उन्होंने सम्पूर्ण आकाश को नाप लिया । उनका दूसरा पैर सत्य लोक में बैठे कमलोद्भव ब्रह्मा जी के पास जा कर ठहरा, ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल के पवित्र जल से उनके पैर धोये, जिस से लोक हित कारी गंगा प्रकट हुई, जो समस्त पापों से मुक्ति प्रदान करती हैं।



आद्या शक्ति काली


५१ शक्तिपीठ

माता सती के ५१ शक्तिपीठ

नाना रत्नों की प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन

नाना रत्नों की प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन

समुद्र मंथन से प्राप्त हुई, धन, सुख, वैभव, सम्पन्नता की अधिष्ठात्री देवी, कमला

समुद्र मंथन से प्राप्त हुई, धन, सुख, बैभव, सम्पन्नता की अदिस्थात्री देवी "कमला"

धन, सुख, वैभव की अधिष्ठात्री देवी, विष्णु जी की अर्धांगिनी 'माता लक्ष्मी'

धन, सुख, वैभव की अधिष्ठात्री देवी, विष्णु जी की अर्धांगिनी 'माता लक्ष्मी'

देवताओं को केवल अमृत पान करा उनका कार्य सिद्ध करने वाले, मोहिनी।

देवताओं को केवल अमृत पान करा उनका कार्य सिद्ध करने वाले, मोहिनी।

समुद्र मंथन में अमृत कलश अपने हाथों में ले कर प्रकट होने वाले, देवताओं के वैध भगवान धन्वंतरि।

समुद्र मंथन में अमृत कलश अपने हाथों में ले कर प्रकट होने वाले, देवताओं के वैध भगवान धन्वंतरि।



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