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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    दस महाविद्या स्वरूप में १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुणी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरूप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारण 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

चराचर जगत के निर्माण, पालन, संहार करने वाली प्रथम शक्ति, आद्या शक्ति महा-माया, योग-निद्रा।

आद्या शक्ति माँ काली का भौतिक स्वरूप

आद्याशक्ति काली

सर्वप्रथम एवं आदि शक्ति 'आद्या शक्ति काली'

ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति से पूर्व घोर अंधकार से उत्पन्न होने वाली महा शक्ति या कहे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करने वाली शक्ति, 'आद्या या आदि शक्ति' के नाम से जानी जाती हैं। अंधकार से जन्मा होने के कारण वह 'काली' नाम से विख्यात हैं। विभिन्न कार्य के अनुरूप इन्हीं देवी ने नाना गुणात्मक रूप धारण किये हैं, सर्वप्रथम शक्ति होने के परिणामस्वरूप इन्हें आद्या शक्ति के नाम से जाना जाता हैं।

ओम कार तथा स्वस्तिक चिह्न से सम्बन्ध

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ओम कार सर्वोपरि एवं सर्वप्रथम हैं, समस्त अलौकिक शक्तियों का एक स्वरूप हैं ओम कार! संपूर्ण ब्रह्माण्ड इस ओम कार में समाया हुआ हैं। आद्या शक्ति ही वास्तविक रूप से ओम कर रूप में विद्यमान हैं। सर्वप्रथम, अंधकार से अवतीर्ण होने पर इन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड के निर्माण हेतु, जो निर्णय लिया वही श्री गणेश कहलाया, इस कारण किसी भी कार्य को प्रारंभ करना, श्री गणेश कहलाता हैं। स्वस्तिक चिन्ह जो की मांगलिक कार्य हेतु प्रेरणा का अत्यंत शुभ स्तोत्र हैं, वास्तविक रूप से इन्हीं आद्या शक्ति की वह प्रेरणा हैं, जिसके द्वारा इन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करवाया या निर्माण कारक बनी।

त्रि-गुण संरचना, त्रि-देवों से सम्बन्ध तथा प्राकट्य, सूर्य देव की उत्पत्ति

ब्रह्माण्ड का सञ्चालन सुचारु रूप से चलाने हेतु उन्होंने तीन प्राकृतिक गुणों की रचना की जो 'सत्व, राजस तथा तामस' नाम से जानी जाती हैं। साथ ही इन त्रिगुण परिचालन हेतु, 'त्रि-देव' तथा इनकी शक्ति रूपी 'त्रि-देवियों' की संरचना की। स्वयं देवी, भगवान विष्णु के अन्तः करण की शक्ति होकर, ब्रह्माण्ड के पालन तथा संरक्षण कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध सत्व गुण से हैं, इनकी शक्ति महालक्ष्मी हैं। भगवान विष्णु के नाभि से इन्होंने ही ब्रह्मा जी को प्रकट दिया तथा इस स्वरूप में देवी ब्रह्माण्ड रचना-कार या निर्माण कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध राजस गुण से हैं, इनकी शक्ति महासरस्वती हैं। भगवान विष्णु के चरणों से इन्होंने शिव जी को प्रकट दिया तथा इस स्वरूप में वे ब्रह्माण्ड के संहार कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध तामस गुण से हैं, इनकी शक्ति देवी स्वयं साक्षात रूप से सती तथा पार्वती हैं, वैसे इनके नाना अवतार हैं। साथ ही ऊर्जा के प्राप्ति हेतु आदि काल में सूर्य देव की भी रचना हुई, जिसके कारण इन्हें आदित्य भी कहा जाता हैं।

भगवान शिव द्वारा देवी आद्या शक्ति का परिचय करवाना।

सत्यवती पुत्र ‘वेद-व्यास’ द्वारा आदि शक्ति भगवती देवी के सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा तथा साधना कर ब्रह्म लोक में जाना।

एक बार भगवान विष्णु के अवतार सत्यवती पुत्र ‘वेद-व्यास’ जी जिन्होंने सम्पूर्ण पुराणों तथा उप-पुराणों की रचना की, सोचने लगे भगवान शिव जिन भगवती देवी की वास्तविकता को पूर्ण रूप से नहीं ज्ञात कर पायें, मैं उन्हें कैसे जान सकता हूँ? यह सोच उन्होंने दुर्गा देवी (आदि परा शक्ति, ‘आद्या देवी’) की एकांत हिमालय पर्वत पर, श्रद्धा युक्त हो तप-साधना प्रारंभ की। उनकी कठोर तपस्या से संतुष्ट हो भगवती देवी ने आकाश-वाणी की!
“मुनिवर आप ब्रह्म-लोक जायें, आप का जो भी ज्ञातव्य हैं; आप पूर्ण रूप से जान लेंगे; वहां वेदों द्वारा मेरा गुणगान करने पर में आप को प्रत्यक्ष दर्शन दूंगी तथा आप की मनोकामना भी पूर्ण करूँगी।”
इस आदेश पर मुनि-राज ब्रह्म-लोक पहुँचें, वहां उन्होंने सर्वप्रथम वेदों को प्रणाम किया तथा अपनी जिज्ञासा प्रकट की। वेद-व्यास जी के निवेदन को सुन, वेदों ने जिस प्रकार का उत्तर दिया या भगवती देवी का महात्म्य-गान किया, वह इस प्रकार हैं :-

ऋग्वेद : महर्षि! यह समस्त प्राणी जिनमें अंतर्भुक्त हैं और यह चराचर समग्र जगत जिनसे प्रवृत्त हैं तथा विद्वान जन जिन्हें परम-तत्त्व कहते हैं, वह देवी साक्षात् भगवती आद्या शक्ति दुर्गा ही हैं।
यजुर्वेद : ईश्वर द्वारा समस्त यज्ञों में जिस तत्त्व को पूर्णतः पूजा जाता हैं, वह तत्त्व एकमात्र स्वयं भगवती आदि शक्ति हैं, हम चारों वेद उन्हें प्रणाम करते हैं।
सामवेद : समस्त विश्व, जिस तत्त्व से पालित हैं, जिनका योगी एकांत में ध्यान करते हैं तथा जिनसे यह समस्त चराचर जगत अवभासित होता हैं, वह तत्त्व साक्षात् भगवती आदि शक्ति दुर्गा ही हैं।
अथर्ववेद : वह परम तत्त्व एकमात्र भगवती देवी का स्वरूप हैं, जिनका भक्तजन एकांत में साधना करने में जिनका साक्षात्कार पाते हैं।
इस प्रकार चारों वेदों के इस प्रकार कहने पर, वेद-व्यास जी ने उन भगवती देवी को एकांततः परब्रह्म तत्त्व रूप में स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात चारों वेदों ने उन भगवती देवी की स्तुति-वंदना भी की।


विश्व के सृष्टि, पालन तथा संहार, तीनों विशिष्ट कार्यों में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, अपने-अपने स्वभाव अनुसार, आप की इच्छा से ही व्याप्त हैं तथा इस के विपरीत आप पर नियंत्रण रखने वाला कोई नहीं हैं। इस संसार में आप के गुणों का वर्णन करने की क्षमता किसी में नहीं हैं।


भगवान विष्णु, आप के साधना के बल से ही परिपूर्ण हो युद्ध भूमि में नाना राक्षसों का वध करते हैं तथा त्रिलोक की रक्षा करने में समर्थ हैं। आप के आराधना के कारण ही भगवान शंकर नृत्यमुद्रा में अपनी छाती पर आप के चरण रखकर त्रिलोक का संहार करते हुए कालकूट विष का पान करने में समर्थ हुए हैं। प्रत्येक प्राणी के शरीर में जो परम पुरुष की शक्ति हैं, उसी के फलस्वरूप कोई आप को “देहात्मिका शक्ति” मानता हैं तो कोई दूसरा “चिदात्मिका शक्ति”, कुछ उसे “स्पन्दनात्मिका शक्ति” मानता हैं। आप ही के माया के वशीभूत हो नाना विद्वान आप के सम्बन्ध में भेद-ज्ञान की बातें करते हैं।

सर्वप्रथम आप के हृदय में जगत की सृष्टि की इच्छा जाग्रत हुई, वास्तविक स्थिति तो यह है की सर्वप्रथम यह परब्रह्म स्त्री-पुरुष आदि उपाधि समूह से रहित था। आप की ही इच्छा शक्ति से दो शरीर ‘स्त्री-पुरुष’ प्रकट हुए, हम तो यह मानते हैं कि परब्रह्म भी आप की मायामय शक्ति का दिव्य स्वरूप हैं। समस्त जगत ब्रह्म से उद्भूत हैं और वह ब्रह्म भी शक्ति-स्वरूप हैं, सभी पर-ब्रह्म से भी ऊपर आप की शक्ति हो मानते हैं।

देहधारियों के शरीर में व्याप्त छह चक्रों में शिव जी का वास हैं, देहधारियों के देह त्याग के पश्चात सभी प्रेतावस्था में रहते हैं, आप ही के आश्रय से छहों चक्र शिव या परमेश्वर तत्त्व को प्राप्त कर पाते हैं। वास्तविक ईश्वरत्व शिव में नहीं, अपितु आप में ही स्थित हैं। अतएव समस्त देवता आप के श्री चरणों में नतमस्तक रहते हैं।

देवी का नाना दिव्य रूप में अपने आप को प्रकट कर, व्यास मुनि को संशय मुक्त करना।

तत्पश्चात, देवी भगवती आद्या शक्ति व्यास मुनि के संदेह के निवारण हेतु नाना रूपों के उनके सनमुख प्रकट हुई। सर्वप्रथम उन्होंने समस्त प्राणियों में स्थित स्वकीय ज्योतिर्मय स्वरूप में अपने आप को प्रकट किया। तदनंतर, उन्होंने सहस्रों देदीप्यमान सूर्य की आभा से युक्त अपना दिव्य रूप प्रकट किया, जिसमें करोड़ों चंद्रमाओं की शीतल कांति छटक रहीं थीं। सहस्रों अस्त्र-शास्त्रों से युक्त उनके अनेक हाथ थे, नाना प्रकार के दिव्य अलंकारों से वह भगवती देवी सुशोभित थीं, शरीर से नाना गंध द्रव्यों का लेपन कर रखा था, वे भगवती देवी सिंह पीठासीन और कही-कही मृत शरीर या शव पर नृत्य करती हुई दिखाई दे रही थीं। कहीं-कहीं उनकी चार भुजाएँ थीं, श्याम वर्ण मेघ तुल्य उनके शरीर की आभा थीं। कभी-कभी वे दस भुजाओं, अठारह भुजाओं वाली तथा क्षण भर में दो भुजाओं वाली हो जाती थीं, कभी सौ भुजाओं से युक्त तथा अगणित भुजाओं वाली हो जाती थीं। कभी वे विष्णु रूप में परिणत हो जाती थीं तथा कभी वह श्याम रूप वाले कृष्ण के रूप में दिखाई देने लगी थीं। कभी ब्रह्मा जी जी के रूप में तो कभी शिव के रूप में दिखाई देती थीं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को व्यास मुनि के सनमुख अनेक रूप दिखाएँ, वास्तव में वे भगवती देवी ब्रह्म स्वरूप निराकार ही हैं। इस पर व्यास मुनि संशय-मुक्त हो गए।

नारद जी द्वारा विनय करने पर, भगवान शिव द्वारा अपने आराध्य का परिचय देना तथा देवी महिमा वर्णन।

एक बार भगवान शिव से नारद जी ने उनके इष्ट के सम्बन्ध में प्रश्न किया, प्रथम तो उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर देना उचित नहीं समझा। परन्तु नारद जी द्वारा भगवान विष्णु तथा शिव की संयुक्त हो स्तुति करने पर, भगवान विष्णु ने भी शिव जी से नारद के संशय के निदान हेतु प्रार्थना की।


भगवान शिव ने उत्तर दिया! "जिसे हम लोक व्यवहार में भगवती जगदम्बा कहते हैं वही इस जगत की ‘मूल प्रकृति’ हैं। व्यवहार में ब्रह्मा जी इस जगत के सृष्टि-कर्ता, भगवान विष्णु इसके पालन-कर्ता तथा मैं शिव संहार-कर्ता हूँ ! परन्तु वास्तव में तीनों लोकों के समस्त जीवों की सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाली एकमात्र भगवती ही हैं। वे भगवती देवी वस्तुतः रुप रहित हैं, परन्तु नाना प्रकार के लीला करने हेतु वे नाना देह धारण करती हैं। पूर्वकाल में, वे भगवती जगत को अपनी लीला से अवगत करने हेतु, अपनी सम्पूर्ण कलाओं युक्त हो दक्ष कन्या “सती” के रूप में प्रकट हुई थीं। तदनंतर, अपने कुछ अंशों के संग हिमालय पुत्री “पार्वती”, लक्ष्मी के रूप में भगवान विष्णु की पत्नी, सावित्री-सरस्वती के रूप में ब्रह्मा जी जी की पत्नी के रूप में विख्यात हैं।

एक समय चारों ओर केवल अन्धकार था, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, ग्रह इत्यादि विहीन थे। ना तो दिन और रात का विभाजन था, न ही अग्नि का कोई रूप था, न ही कोई दिशाएं थीं, उस समय यह समस्त जगत शब्द, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषयों से रहित था। उस समय केवल उस ब्रह्म की सत्ता थी, जिसे वेद शास्त्र ‘सत् एवं एकमात्र’ रूप में प्रतिपादित करते हैं। उस समय केवल सत् चित् आनंद विग्रह वाली, शुद्ध ज्ञान रूप, नित्य भगवती “प्रकृति” ही विद्यमान थीं, जिसका कोई विभाजन नहीं था। वह प्रकृति सर्वत्र व्याप्त थीं तथा विघ्न-बाधा आदि उपद्रवों से रहित तथा नित्यानंद स्वरूप एवं सूक्ष्म थीं। उन प्रकृति रूपी भगवती को अनायास जगत निर्माण की इच्छा हुई तथा रूप रहित होने पर भी उन्होंने अपनी इच्छा से एक रूप (आकार) धारण किया। वह रूप कृष्ण वर्ण युक्त पर्वत के अंश समान था तथा मुख खिले हुए कमल के समान प्रतीत हो रहा था। वह चार भुजाओं से युक्त थीं तथा उनके नेत्र लाल थे, केश खुले बिखरे हुए थे, वह निर्वस्त्र यानी दिगंबर थी, उनके स्थान स्थूल एवं अत्यधिक उभरे हुए थे।

उस समय उन्होंने स्वेच्छा से सत्त्व, राजस एवं तामस तीनों प्राकृतिक गुणों से युक्त एक पुरुष का सृजन किया, जो चैतन्य से रहित था। तदनंतर अपने अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा भगवती देवी ने उस पुरुष में संचारित की, उन भगवती की इच्छा जान कर पुरुष ने तीनों गुणों में से एक-एक गुण से युक्त विशेषता रखने वाले तीन पुत्रों को उत्पन्न किया। उन तीनों पुरुष का नाम ब्रह्मा, विष्णु तथा भगवान शिव हुए। परन्तु इस स्थिति में जगत की सृष्टि को आगे न बढ़ता देख, भगवाती ने उस पुरुष जो वह स्वयं ही थीं, द्विधा विभक्त कर दिया। उनमें से एक ‘जीव’ तथा दुसरा ‘परब्रह्म’ कहलाया।

इन भगवती प्रकृति भगवती देवी स्वयं ही माया, विद्या और पारा नाम से त्रिधा में विभक्त हो गई। उनमें से ‘माया’ जगत के प्राणियों को विमुग्ध कर इस संसार के सञ्चालन का कारण बनी। समस्त देहधारियों के देह में प्राण रूप से संचालित (परिस्पंदन) करने वाली ‘परा’ शक्ति कहलाई, तथा तत्त्व ज्ञान वाहिनी शक्ति ‘विद्या’ कहलाई। एक काल ऐसा आया की माया के वशीभूत हो प्राणियों ने उस आद्या शक्ति को भुला दिया और उस माया के वशीभूत हो वे जीव धीरे-धीरे प्रमत्त हो गए। इस पर तीसरी शक्ति ‘परा’ ने स्वयं को पाँच भागों में विभक्त कर दिया; ये हैं १. गंगा, २. दुर्गा, ३. सावित्री ४. लक्ष्मी एवं ५. सरस्वती। तदनंतर उन पूर्ण प्रकृति आद्या शक्ति ने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव तीनों से जगत की सृष्टि में उन तीनों का पृथक-पृथक उपयोग कर यह कहा !

'पूर्व काल में, मैंने (आद्या शक्ति) स्वेच्छा से तुम तीनों का सृष्टि रचना के निमित्त निर्माण किया, अतः आप लोग वही कीजिये जो मेरी इच्छा हैं। स्थावर तथा चर, जीवित तथा निर्जीव सभी की सृष्टि, रजो गुण संपन्न ब्रह्मा जी करें, यह सृष्टि समूह विविध भी होगा और विचित्र भी, अगणित भी होगा और असंयत भी। सत्व गुणी, महाबली विष्णु जगत के उपद्रव कारक प्राणियों का संहार कर इस सृष्टि का पालन करेंगे तथा तमोगुण से युक्त शिव अभी सुख पूर्वक विश्राम करें, जब सर्वथा प्रलय करने की मेरी इच्छा होगी, तब वे इस जगत का प्रलय करेंगे। आप तीनों परस्पर सहमत होते हुए, इन सृष्टि कार्यों में निरंतर लगे रहें, मेरा सहयोग करें। दूसरी ओर में भी सावित्री आदि नारियों के रूप में पाँच भागों में विभक्त हो, आपकी नारी के रूप में स्वेच्छा से विहार करूँगी। मैं स्वयं शिव के संग मिल कर विविध प्राणियों की स्त्रियों में स्वेच्छा से गर्भ धारण करने की कामना जाग्रत करूँगी। ब्रह्म देव आप मेरी आज्ञा से मानव सृष्टि के अभिवर्धन पर पूर्ण ध्यान रखें, इस सृष्टि के विस्तार का अन्य कोई उपाय अविशिष्ट नहीं हैं।' तदनंतर वह परा विद्या रूपी भगवती देवी वहाँ से अंतर्ध्यान हो गई, उन्हीं का आदेश पा कर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का कार्य प्रारंभ किया।"

भगवती आदि शक्ति को पत्नी स्वरूप में प्राप्त करने हेतु ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश द्वारा तपश्चर्या करना तथा भयानक डरावने रूप में देवी का तीनों देवों के सनमुख प्रकट होना।

शिव जी ने उन आदि शक्ति भगवती को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु, भक्ति भाव से तपश्चर्या प्रारंभ की। इस बात को स्वकीय दिव्य चक्षु से जानकार विष्णु जी भी उन भगवती देवी को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु, तपश्चर्या प्रारंभ की, इसी प्रकार ब्रह्मा जी ने भी एक स्थान पर बैठ कर उन भगवती देवी को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु तप कार्य प्रारंभ किया। इस पर वह प्रकृति भगवती देवी तीनों की परीक्षा लेने हेतु उन तीनों के सनमुख प्रकट हुई। भगवती देवी ने अपना स्वरूप भीषण घोर डरावना बना रखा था, सर्वप्रथम भगवती देवी, ब्रह्मा जी के सनमुख प्रकट हुई, उनके विकराल रूप को देख ब्रह्मा जी भयभीत हो अपने मुख को दूसरी ओर कर लिया। तदनंतर, भगवती देवी उस ओर गई जिस ओर ब्रह्मा जी का मुख था, उस पर ब्रह्मा जी ने पुनः अपना मुख घुमा दिया। इस प्रकार भगवती देवी विकराल रूप धारण कर जिसे देख समग्र ब्रह्माण्ड डर जाये, बार-बार ब्रह्मा जी के सामने आई। इस पर ब्रह्म जी बहुत भयभीत हो तपस्या छोड़ कर भाग गए। तदनंतर वह विकराल रूप वाली आदि शक्ति, विष्णु जी ने सनमुख प्रकट हुई, देवी का वह रूप देख कर वे बहुत डर गए। भय वश विष्णु जी अपनी आँखों को मूंद कर, तपस्या बीच में ही छोड़कर, समुद्र में जाकर छिप गए। इसके पश्चात वह भयंकर स्वरूप वाली देवी, भगवान शिव के पास गई, नाना प्रकार के भयंकर से भी भयंकर डरावना स्वरूप दिखा कर वे उन्हें तपस्या से च्युत नहीं कर पाई। उन्हें जैसे ही ज्ञात हुआ की आदि शक्ति प्रकृति देवी उनकी परीक्षा लेने उपस्थित हुई हैं, वे और अधिक गाढ़ समाधि में निमग्न हो गए। इस पर वे महादेव शिव जी से प्रसन्न हो, अपनी पूर्ण कला से युक्त हो शिव के सानिध्य में गई तथा स्वर्ग में गंगा के रूप में निवास करने लगी। स्वकीय अंशभूत सावित्री के रूप में वे भगवती देवी ने ब्रह्मा जी को अपना पति वरन कर लिया तथा लक्ष्मी जी ने विष्णु को अपना पति स्वीकार कर लिया।


सर्वप्रथम, आदि काल में भगवती प्रकृति पूर्ण थीं, तदनंतर उन्हीं के अंश से पाँच श्रेष्ठ स्त्रियों की सृष्टि हुई १. गंगा, २. दुर्गा, ३. सावित्री ४. लक्ष्मी एवं ५. सरस्वती। सावित्री, ब्रह्मा जी को प्राप्त हुई, लक्ष्मी, विष्णु जी को प्राप्त हुई, परन्तु पूर्ण प्रकृति भगवती आद्या शक्ति ने देह धारण कर, दक्ष प्रजापति के घर कन्या रूप में जन्म धारण किया, जिनका शिव जी के संग विवाह हुआ।

सत्व, सात्विक अथवा सत गुण

तीनो लोको के पालन हेतु प्राकृतिक शक्ति

'सत्व गुण', सत्यता पर आधारित हैं तथा अन्य दोनों गुणों से श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि सत्य का पालन अत्यंत कठिन हैं। तीनों गुणों से संयुक्त होते हुए पर भी, आद्या शक्ति प्रधानतः सत्वगुणी हैं। ब्रह्माण्ड के पालन तथा स्थिति हेतु, 'सत्व गुण' की आवश्यकता होती हैं, जिसके अधिष्ठित देव भगवान विष्णु हैं। इस गुण में सत्य, पवित्रता तथा शुद्धता के सिद्धांतों का समावेश हैं, किसी भी जीव को मन, वचन, शारीरिक रूप से किसी भी प्रकार का कष्ट न देना, सर्वदा सत्य का आचरण तथा भाषण, पवित्र स्थानों में रहन-सहन जैसे दैनिक कृत्यों का प्रतिपादन होता हैं। भगवान विष्णु तथा उनकी पत्नी कमला या लक्ष्मी, सम्पूर्ण जगत के पालन कार्य का निर्वाह करती हैं, उनमें सत्व गुणी प्राकृतिक शक्ति का समावेश हैं। निर्माण या जन्म के पश्चात, प्राकृतिक गुणों के अनुसार जीव के आचरण-चरित्र का निर्माण होता हैं, यद्यपि प्रधानिक गुण जन्म के साथ ही जीव के साथ विद्यमान रहते हैं। जैसे गाय सत्व गुणी सम्पन्न हैं वह हिंसक नहीं हैं, इस के विपरीत सिंह हिंसक हैं तथा तमो गुण प्रधान है। सत्य का आचरण, पवित्रता, त्याग तथा अहिंसा की भावना, किसी को भी शारीरिक तथा वचन दोनों प्रकार से किसी प्रकार का कष्ट न देना इत्यादि सत्व गुणी आचरण तथा स्वभाव हैं। मनुष्य के स्वभाव में किसी एक गुण की प्रधानता होती हैं, बाकी अन्य दो गुण निम्न, अथवा अधिक व न्यूनतम मात्रा में विद्यमान रहती हैं।

राजस, राजसिक अथवा रजो गुण

तीनों लोकों के निर्माण तथा ज्ञान हेतु प्राकृतिक शक्ति

दूसरी प्राकृतिक शक्ति, 'राजस या रजो गुणी' नाम से जानी जाती हैं। इस शक्ति के अंतर्गत नव सृजन तथा ज्ञान संचय का समावेश हैं। पितामह ब्रह्मा तथा उनकी पत्नी सरस्वती, सावित्री तथा गायत्री, प्रधान रूप से इस शक्ति के स्वामी हैं, जिस से प्रेरित होकर, ज्ञान प्राप्त कर निपुण हो, संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण, इन्हीं के द्वारा किया गया हैं, परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी को 'पितामह' नाम से जाना जाता हैं। सृजन, रजो गुण के बिना संभव नहीं हैं, सृजन हेतु परिस्थिति के अनुरूप ढालना पड़ता हैं, इस में सत्य तथा असत्य दोनों तथ्यों का समावेश होता हैं। रजो गुण के अंतर्गत सत्व तथा तमो, दोनों गुणों का समावेश देखा जाता हैं, तथा माध्यम श्रेणी का माना जाता हैं। उदाहरण स्वरूप, समस्त संसारी मनुष्य या नर-नारी इसी गुण के आधीन हैं, अपने परिवार के पालन पोषण के हेतु सत्य तथा असत्य दोनों मार्गों का सहारा लेना पड़ता हैं। पारिवारिक जीवन का पालन करने वाले समस्त जीव, इसी प्राकृतिक शक्ति के अंतर्गत अपना जीवन निर्वाह करते हैं। इसके विपरीत संन्यासी समुदाय, प्रधानतः अन्य दोनों गुणों के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता हैं, जैसे वैष्णव संन्यासी सत्व गुण तथा शैव और शक्ति संन्यासी संप्रदाय तमो गुण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता हैं।

तामसिक अथवा तमो गुण

तीनों लोकों के संहार हेतु प्राकृतिक शक्ति

तीसरी शक्ति को 'तामसिक अथवा तमो' गुण के नाम से जाना जाता हैं। ब्रह्माण्ड के समस्त तत्वों के उपयोग पश्चात नष्ट तथा संहार का समावेश इस गुण के अंतर्गत हुआ हैं, तथा इस के स्वामी भगवान शिव तथा उनकी पत्नी सती या पार्वती, काली, दुर्गा इत्यादि को बनाया गया है। प्रधानतः शिव तथा शक्ति, सर्वदा नित्य संहार कार्य में संलग्न रहते हैं, त्यागी हुई समस्त जीवित अथवा निर्जीव तत्व के शिव स्वामी हैं। प्राणी के देह त्याग के पश्चात, शव रूप में शिव ही देह में विद्यमान रहते हैं तथा मृत देह के पंचत्व में विलीन होने की शक्ति, शिव तथा शक्ति ही हैं। तमो गुण नाम वाले, इस प्राकृतिक गुण को निम्न श्रेणी का माना गया हैं क्योंकि इस के अंतर्गत हिंसा, अपवित्रता, असत्यता के सिद्धांतों का प्रतिपादन होता हैं। वास्तव में देखा जाये तो संहार किसी नियम के अधीन नहीं रह सकती, संहार बिना उत्पत्ति संभव नहीं हैं, संहार के अंतर्गत सभी तथ्यों में, विनाश ही सर्वप्रथम सम्मिलित हैं, फिर इस का रूप भयंकर ही क्यों न हो। संहारक कार्य या विनाश, भयानक ही होता हैं इस में संशय नहीं हैं।

नारद जी द्वारा ब्रह्मा जी से ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति कर्ता के सम्बन्ध में प्रश्न करना

देवी भागवत पुराण के अनुसार, एक बार नारद जी ने अपने पिता ब्रह्मा जी पूछा कि! "सम्पूर्ण ब्राह्मण का आविर्भाव कैसे हुआ तथा इस चराचर जगत का परम परमेश्वर कौन हैं ?" ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया कि! "इस प्रश्न का उत्तर देना भगवान विष्णु के लिये भी संभव नहीं हैं, जल प्रलय के पश्चात, उन्होंने अपने आप को एक कमल पुष्प में आविर्भाव हुआ देखा, तदनंतर कमल के आदि तथा अंत न पाने में असमर्थ उन्होंने आकाश-वाणी के अनुसार मैंने तपस्या की। मधु तथा कैटभ नामक दो महा-दैत्यों द्वारा प्रताड़ित होने पर, भगवान विष्णु उनकी सहायतार्थ प्रकट हुए। उन्होंने मेरी रक्षा हेतु दैत्य भ्राताओं से पाँच हजार वर्ष तक युद्ध किया, परन्तु विजय न प्राप्त कर सकें। तदनंतर, उन्होंने आदि शक्ति की स्तुति की तथा उनकी सहायता प्राप्त कर मधु तथा कैटभ का वध किया। दैत्यों के मृत्यु के पश्चात भगवान शिव का प्राकट्य हुआ। वास्तव में भगवान विष्णु के अन्तः करण की शक्ति आद्या शक्ति महामाया, योगमाया हैं, उन्हीं से प्रेरित होकर वे दुष्टों का संहार कर तीनों लोकों का पालन करते हैं। तदनंतर, हम तीनों को सृष्टि, पालन तथा संहार का कार्यभार स्वयं भगवती आदि शक्ति द्वारा प्रदान किया गया। परन्तु शक्ति हीन होने के कारण, हम तीनों के मन में नाना प्रकार के शंका का उदय हुआ। तदनंतर, शंका निवारण तथा शक्ति प्रदान हेतु आदि शक्ति माता हम तीनों देवों को अपने रमणीय निवास स्थल या लोक में ले गई।"

त्रिगुणात्मक, प्राकृतिक शक्तियों की आवश्यकता तथा निरूपण

त्रिगुणात्मक प्रकृति, शक्ति या बल, "सात्विक (सत्व), राजसिक (रजो) तथा तामसिक (तमो)" तीन श्रेणियों में विभाजित हैं। हिन्दू वैदिक दर्शन के अनुसार संसार के प्रत्येक जीवित और निर्जीव तत्त्व, की उत्पत्ति या जन्म इन्हीं गुणों के अधीन हैं। ब्रह्मांड के सुचारु संचालन हेतु, यह तीन प्राकृतिक बल या गुण अत्यंत अनिवार्य तथा आवश्यक हैं, इनके बिना ब्रह्मांड का सञ्चालन संभव नहीं हैं। निर्माण, पालन और विनाश के बिना संभव नहीं है, जन्म रजो से, आयु सत्व से तथा मृत्यु तामसी गुण से सम्बंधित हैं। इसी अनुसार तत्व की उत्पत्ति रजो से, सत्ता या अस्तित्व सत्व से तथा विनाश तमो गुण से संचालित होते हैं। किसी भी एक बल की अधिकता या न्यूनतम, संसार चक्र सञ्चालन के संतुलन को प्रभावित कर, समस्त व्यवस्था को आच्छादित, असंतुलित कर सकता हैं। विनाश के बिना नूतन उत्पत्ति या सृष्टि करने का कोई लाभ नहीं हैं, अन्यथा तत्वों की बाढ़ जैसे स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। (उदाहरण स्वरूप, आज सर्वत्र हम प्लास्टिक के उपयोग से होने वाले 'प्रदूषण' को देख रहे हैं, कैसी विकराल स्थिति उत्पन्न हो गई हैं और इसका एक ही कारण हैं, उपयोग के पश्चात प्लास्टिक नष्ट नहीं हो पता हैं।) परिणाम स्वरूप इस संसार चक्र का अस्तित्व नष्ट हो सकता हैं। आद्या शक्ति, जिन्होंने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्व का प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से निरूपण किया हैं, वे भी इन्हीं तीनों गुणों के अधीन भिन्न-भिन्न रूपों में अवतरित हुई। महा-काली, पार्वती, दुर्गा, सती तथा अनगिनत सहचरियों के रूप में, वे ही तामसिक शक्ति हैं, महा सरस्वती, सावित्री, गायत्री इत्यादि के रूप में वे ही राजसिक शक्ति हैं, महा लक्ष्मी, कमला इत्यादि के रूप में वे ही सात्विक शक्ति हैं। साथ ही इन देवियों के भैरव क्रमशः भगवान शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु, क्रमशः सात्विक, राजसिक, तामसिक बल से सम्बंधित हैं।

इस चराचर जगत के समस्त जीवों का जन्म, स्वभाव तथा प्रकार इन तीनों गुणों से अंतर्गत प्रतिपादित होता हैं। जन्म के अनुसार हिंसक प्राणी जैसे सिंह, बाघ, कुत्ता, बिल्ली इत्यादि तामसिक गुण सम्पन्न हैं इसी के विपरीत गाय, छाग, मेष, महिष इत्यादि सात्विक गुण सम्पन्न हैं। गिलहरी, मछलियाँ इत्यादि जो दोनों आमिष तथा निरामिष भोजी हैं, राजसिक गुण से सम्पन्न हैं। स्वभाव से किसी को किसी भी प्रकार से कष्ट पहुँचना तामसिक हैं, अपने शत्रु तथा मित्र दोनों में सम भाव रखना, किसी द्वेष का न रखना, निंदा, चर्चा, वाणी तथा शरीक रूप से कष्ट न देना सात्विक गुण हैं।

संसार के समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों में इन्हीं आद्या शक्ति का अंश व्याप्त होना।

देवी आद्या शक्ति, नाना स्वरूपों में अवतरित हो, संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त तत्वों में विद्यमान हैं। इनके अनगिनत अवतारी रूप हैं, त्रि-देवों के रूप में ब्रह्मा, विष्णु तथा भगवान शिव हैं तथा त्रि-देवियों या महा देवियों से स्वरूप में ये ही महा काली, महा लक्ष्मी, महा सरस्वती हैं। महाविद्याओं, के रूप में ये ही १० महाविद्या, काली, तारा, श्री विद्या त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी तथा कमला हैं। नव दुर्गा के रूप में ये ही शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं। समस्त योगिनियां, जो पार्वती की सहचरियां या सहेलियां हैं, भगवान विष्णु की योगमाया शक्ति के रूप में देवी ही महामाया या योगमाया नाम से विख्यात हैं। जब भी इस संसार के सञ्चालन हेतु देवताओं को संकट का सामना करना पड़ा है, तब-तब इन्हीं देवी ने भिन्न-भिन्न रूपों में अवतरित हो, देवताओं की सहायता की तथा उन्हें संकट मुक्त किया। असुर जो सर्वदा ही स्वर्ग लोक के राज्य को प्राप्त कर, नाना प्रकार के दिव्य भोगो को भोगने की अभिलाषा रखते थे, ब्रह्मा तथा शिव की कठोर तपस्या कर, उन से कोई वर प्राप्त कर लेते थे। असुर-दैत्य, स्वर्ग पर आक्रमण कर स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लेते थे तथा समस्त देवताओं के भागों को स्वयं भोगते थे। एसी परिस्थिति में देवताओं को इधर-उधर भटकना पड़ता था तथा स्वर्ग लोक के समस्त भोगो को असुर ही भोगते थे। जब-जब देवताओं के सनमुख, इस प्रकार की विपरीत परिस्थिति प्रस्तुत हुई, इन्हीं आद्या शक्ति देवी अपने नाना अवतारों में अवतरित हो, समस्त दानवों को युद्ध में परास्त किया तथा देवताओं को भय मुक्त कर उन्हें उनके पद पर पुनः अधिष्ठित किया।

सर्वप्रथम भगवान विष्णु जब मधु और कैटभ से ५००० वर्ष तक युद्ध करते हुए थक गए, उन्होंने सहायता हेतु आद्या शक्ति की आराधना की। फल स्वरूप आद्या शक्ति प्रकट हुई, और उन्होंने भगवान विष्णु से कहा की मैं इन्हें अपनी माया से मोहित कर दूंगी, तब आप इनका वध कर देना। देवी आद्या शक्ति से मोहित हुए ये दोनों महा दैत्यों ने भगवान विष्णु को आशीर्वाद दिया की, जहाँ न जल हो और न ही भूमि, ऐसे स्थान में उन का वध करें। उस समय प्रलय पश्चात सर्वत्र जल ही जल व्याप्त था, भगवान विष्णु ने अपनी जंघा पर उन महा दैत्यों का सर रख कर अपने सुदर्शन चक्र से उनके मस्तक को देह से अलग कर दिया। दैत्य राज महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज इत्यादि, समस्त दैत्यों का देवी ही अपने बल तथा पराक्रम से वध कर, देवताओं को भय मुक्त किया। जब-जब देवताओं पर विपत्ति या संकट उपस्थित हुआ, सभी देवों ने मिल कर इन्हीं आद्या शक्ति की आराधना-स्तुति, वन्दना की, तथा इन्हीं शक्ति ने अपने तेजो बल पराक्रम से समस्त संसार को भय मुक्त किया। इन के मुख्य नमो में दुर्गा, तथा काली नाम सर्वाधिक प्रचलित हैं। दुर्गमासुर नाम के दैत्य का वध करने के कारण इन देवी,दुर्गा नाम से विख्यात हुई, साथ ही दुर्गम संकटों से मुक्ति हेतु भी जगत-प्रसिद्ध हुई। सांसारिक कष्टों ने निवारण हेतु, दुर्गम संकटों से मुक्त करने वाली दुर्गा, के शरण में जाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता हैं।

वास्तव में शक्ति ही, सञ्चालन, निर्माण तथा विध्वंस का प्रतीक हैं, शक्ति या बल के अभाव में स्थिति शून्य ही रहेगी। आद्या शक्ति ही वह बल या कहे तो प्रेरणा का श्रोत हैं, जिनसे इस चराचर जगत के सुचारु सञ्चालन का कार्य पूर्ण होता हैं। सूर्य से प्रकाश, हवा का वहन, बादल द्वारा जल वर्षा, प्रकृति में घटित होने वाली सभी जैविक तथा अ-जैविक क्रियाएं शक्ति के अभाव में अस्तित्व में नहीं रह सकती हैं। हिन्दू शास्त्र, तंत्रों के अनुसार पत्नी को शक्ति का पद प्राप्त है, अर्थात पुरुष की शक्ति उसकी पत्नी ही हैं। चराचर संपूर्ण जगत की जन्म प्रदाता होने के परिणाम स्वरूप माता के रूप में पूजिता हैं। जीवन की उत्पत्ति तथा विकास, हर चरण मातृ शक्ति द्वारा ही परिचालित है, परिणाम स्वरूप शक्ति संसार में सर्वोपरि है।

श्वेताश्वेत उपनिषद के अनुसार देवी आद्या शक्ति स्वयं त्रि-शक्ति के रूप में अवतरित हुई हैं। आद्या शक्ति, एक होते हुए भी, लोक कल्याण के अनुरूप, भिन्न-भिन्न रूपों में अवतरित हो, ज्ञान, बल तथा क्रिया रूपी शक्तियों से अवतरित होकर महा-काली, महा-लक्ष्मी तथा महा-सरस्वती रूप धारण करती हैं। परिणाम स्वरूप देवी त्रि-शक्ति, नव-दुर्गा, दस महाविद्या तथा ऐसे अन्य अनेक अवतारी नामों से पूजिता हैं।

अथर्व वेद के अनुसार, देवी आद्या शक्ति की महिमा

अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यम् च।।
समस्त देवता देवी के सनमुख प्रकट हुए और नम्रता से पूछने लगे ! "हे महादेवी तुम कौन हो।" देवी ने उत्तर दिया ! "मैं ब्रह्मा स्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति, समस्त पुरुष तथा असद्रूप और सद्रूप जगत उत्पन्न हुआ हैं।

अहमानन्दानानन्दौ। अहं विज्ञानाविज्ञाने। अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये। अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि। अहमखिलं जगत्।।
मैं ही आनंद तथा अनानन्दरूपा हूँ, विज्ञान और अविज्ञान मैं हूँ, जानने योग्य ब्रह्म और अब्राहम भी मैं ही हूँ, पांच महा भूतों से और बिना पांच भूतों से निर्मित तत्व भी मैं ही हूँ। यह समस्त दृष्टि गोचर जगत भी मैं ही हूँ।

वेदोऽहमवेदोऽहम्। विद्याहमविद्याहम्। अजाहमनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम्।।
वेद और अवेद, विद्या और अविद्या, अजा और अनजा, निचे और ऊपर, अगल और बगल सभी ओर मैं ही हूँ।

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि। अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि। अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ।।
मैं ही रुद्रों तथा वसुओं के रूप में संचार करती हूँ, मैं आदित्यों और विश्वेदेवो के रूपों में विद्यमान हूँ, मैं मित्र और वरुण दोनों का, इंद्रा एवं अग्नि का और दोनों अश्विनी कुमारों का भरण पोषण करती हूँ।

अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधामि। अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि।।
मैं सोम, त्वष्टा, पूषा तथा भाग को धारण करती हूँ, तीनों लोकों को आक्रांत करने के लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले विष्णु, ब्रह्मा और प्रजापतियों को धारण करती हूँ।

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते। अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।।
देवताओं को उत्तम हवि पहुंचाने वाले और सोमरस निकालने वाले यजमानों के लिये हविर्द्रव्यों से युक्त धन धारण करती हूँ। मैं संपूर्ण जगत की ईश्वरी, उपासकों को धन देने वाली, ब्रह्म रूपा और यज्ञ होमो में प्रधान हूँ।

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे। य एवम् वेद। स देवीं सम्पदमाप्नोति।।
मैं आत्म स्वरूप पर आकाशादि निर्माण करती हूँ। मेरा स्थान आत्म स्वरूप को धारण करने वाली बुद्धि वृति में है। जो इस प्रकार जनता हैं, देवी संपत्ति लाभ करता हैं।

भगवान शिव

भगवान शिव
भगवान शिव का अद्भुत स्वरूप