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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    दस महाविद्या स्वरूप में १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुणी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरूप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारण 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

श्री विद्या, महा त्रिपुरसुंदरी से सम्बद्ध शक्ति पीठ, कामाख्या।

कामाख्या मंदिर

कामाख्या मंदिर

शक्ति पीठों में सर्वश्रेष्ठ तंत्र पीठ कामाख्या।

कामरूप प्रान्त में अवस्थित कामाख्या पीठ सर्वश्रेष्ठ तंत्र पीठ हैं, आदि काल से यह पवित्र स्थान तीनों लोकों में विख्यात हैं। सती शक्तिपीठो की श्रेणी में यहाँ देवी सती की योनि या प्रजनन अंग गिरी थी, देवी की आराधना-पूजा! यहाँ योनि रूप में की जाती हैं। यह पीठ ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे, नीलाचल पर्वत श्रृंखला स्थित नील पर्वत पर अवस्थित हैं। यह पीठ संपूर्ण भारत से रेल, वायु तथा सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ हैं। निकटवर्ती हवाई अड्डा गुवहाटी तथा रेलवे स्टेशन कामाख्या हैं, कामाख्या रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी ४ कि. मी. की हैं। यहाँ बड़ी संख्या में संपूर्ण विश्व से श्रद्धालु, देवी के दर्शन-पूजा हेतु आते हैं। अम्बुवाची मेले में, यहाँ बहुत भारी संख्या में सामान्य श्रद्धालु, तांत्रिक तथा साधु-संन्यासी, देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु आते हैं।
कुम्भ मेले के पश्चात कामाख्या अम्बुवाची मेले में सर्वाधिक भक्तों-संन्यासियों का जमावड़ा होता हैं। माना जाता हैं की ३ दिनों के लिया देवी कामाख्या या त्रिपुरसुंदरी ऋतुस्रव युक्त रहती हैं, इसी अवधि में यहाँ विशाल मेले का आयोजना होता हैं। ऋतुस्रव के ३ दिन मंदिर के कपाट बंद रहते हैं तथा ३ दिन पश्चात, महा पूजा के साथ मंदिर दर्शनों हेतु खोल दिया जाता हैं। ऋतुस्रव अवधी में देवी के पूजा स्थान में लाल वस्त्र बिछा दिया जाता हैं, मंदिर खुलने के पश्चात वह लाल वस्त्र प्रसाद के रूप में भक्तों में विभाजित किया जाता हैं, जिसे अर्ग वस्त्र या रक्त वस्त्र कहते हैं। तंत्रों में इस वस्त्र की बड़ी महिमा बताई गई हैं, सभी श्रद्धालु देवी के अर्ग वस्त्र या रक्त वस्त्र को प्राप्त कर प्रसाद रूप में सर्वदा अपने पास रखते हैं। तंत्र साधकों के लिये अर्ग वस्त्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण तंत्र-सामग्री हैं।
कामाख्या मंदिर में देवी की कोई प्रतिमा या विग्रह नहीं हैं, केवल वह स्थान चिन्हित हैं जहाँ देवी सती की योनि गिरी थी, जिसे महा-मुद्रा पीठ के नाम से भी जाना जाता हैं तथा उस स्थान पर सर्वदा ही प्राकृतिक जल स्रोत बहती रहती हैं।

प्राचीन प्राग्ज्योतिषपुर राज्य।

प्राचीन प्राग्ज्योतिषपुर राज्य, आज असम में गुवाहाटी नगर के नाम से जाना जाता हैं; प्राग्ज्योतिषपुर! नरकासुर तथा उस के पुत्र भगदत्त का राज्य था। भगदत्त की कन्या भानुमती का विवाह, कौरव! दुर्योधन के साथ हुआ था तथा स्वयं उसने कुरु-क्षेत्र युद्ध में किरात सेना के साथ कौरवों की सहायता की; युद्ध में अर्जुन द्वारा भगदत्त की मृत्यु हुई थीं।
कालिका पुराण के अनुसार, जगत सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी ने इसी स्थान में बैठ कर ग्रह-नक्षत्रादि रचना की थीं, प्राचीन काल में यह क्षेत्र ज्योतिष विद्या तथा तंत्र-इंद्रजाल इत्यादि गुप्त विद्याओं का एक महान केंद्र था। तंत्र शास्त्रों के अंतर्गत मारण, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन, मोहन, इंद्रजाल या फिर कहे काला जादू हेतु, प्रागज्योतिषपुर विख्यात था। भीम और हिडिम्बा से उत्पन्न पुत्र, घटोत्कच का विवाह प्राग्ज्योतिषपुर के राज-कुमारी कामक-कण्टका से हुआ था। परिणामस्वरूप समस्त प्रकार के परा-अपरा शक्ति विद्याओं से युक्त घटोत्कच ने महाभारत का युद्ध लड़ा। यह स्थान अभी भी काला जादू या इंद्रजाल हेतु विख्यात हैं। नरकासुर, कामाख्या देवी का अनन्य भक्त था तथा किरात-राज घटक को मार कर उसने यह राज्य प्राप्त किया था।

कामाख्या पीठ के उत्पन्न से सम्बंधित कथा।

भगवान शिव की पहली पत्नी सती के पिता प्रजापति दक्ष (जो ब्रह्मा जी के पुत्र थे) ने एक 'बृहस्पति-श्रवा' नाम के यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने तीनों लोकों से समस्त प्राणियों को निमंत्रित किया। परन्तु दक्ष, भगवान शिव से घृणा करते थे तथा उन्होंने भगवान शिव सहित उन से सम्बंधित किसी को भी, अपने यज्ञ आयोजन में आमंत्रित नहीं किया। देवी सती ने जब देखा की तीनों लोकों से समस्त प्राणी उनके पिता के यज्ञ आयोजन में जा रहे हैं, उन्होंने अपने पति भगवान शिव ने अपने पिता के घर जाने कि अनुमति मांगी। भगवान शिव, दक्ष के व्यवहार से परिचित थे, उन्होंने अपनी प्रिया सती को अपने पिता के घर जाने की अनुमति नहीं दी तथा नाना प्रकार से उन्हें समझने की चेष्टा की। परन्तु देवी सती नहीं मानी, अंततः विवश होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने गणो के साथ, उनके पिता के यज्ञ अनुष्ठान में जाने की अनुमति दे दी।
पिता के गृह में जाने के पश्चात सती! अपने पिता दक्ष से उनके यज्ञानुष्ठान स्थल में घोर अपमानित हुई। दक्ष ने अपनी पुत्री सती को स्वामी शिव सहित खूब उलटा-सीधा कहा, कटु वचनों से अपमान किया। परिणामस्वरूप, देवी अपने तथा स्वामी के अपमान से तिरस्कृत होकर, सम्पूर्ण यजमानों के सामने देखते ही देखते स्वयं को योग-अग्नि में भस्म कर दिया; देवी ने दक्ष से उत्पन्न देह का त्याग कर दिया।
भगवान शिव को जब इस घटना का ज्ञात हुआ, वो अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने जटा के एक टुकड़े से वीरभद्र तथा महाकाली को प्रकट किया, जो साक्षात मृत्यु या विनाश के कारक महाकाल स्वरूप ही थे। उन्होंने वीरभद्र तथा महाकाली को अपने गणो के साथ दक्ष यज्ञ आयोजन में जाकर सर्वनाश-नष्ट करने की आज्ञा दी। भगवान शिव के आदेशानुसार दोनों यज्ञ-स्थल पर गए और उन्होंने यज्ञ का सर्वनाश कर दिया, दक्ष के मस्तक को उसके देह से पृथक कर, उसकी आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी।
तदनंतर, भगवान शिव यज्ञ स्थल में आये तथा अपनी प्रिया सती के शव को कंधे पर उठाकर, तांडव नृत्य करने लगे। (शिव का नटराज स्वरूप, तांडव नित्य का ही प्रतीक हैं।) शिव के क्रुद्ध हो रुद्र या रौद्र रूप धारण कर तांडव नृत्य करने के परिणामस्वरूप, तीनों लोकों में हाहाकार मच गया एवं विध्वंस होने लगा। तीनों लोकों को भय मुक्त करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से, सती मृत देह के टुकड़े कर दिए, जो भारत वर्ष के विभिन्न स्थानों में पतित हुए। कामाख्या पीठ को योनि पीठ के नाम से जाना जाता हैं, क्योंकि इस स्थल पर देवी सती की योनि गिरी थी।

भगवान विष्णु के बारहवें अवतार 'वराह' के पुत्र, नरकासुर द्वारा त्रेता तथा द्वापर युग तक प्राग्ज्योतिषपुर का राज तथा पतन।

नरकासुर जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु के बारहवें अवतार वराह के पुत्र थे तथा उनका लालन पोषण धरती-पृथ्वी देवी ने किया था। नरकासुर का जन्म असुर जाती में हुआ था, परन्तु राजर्षि जनक की शिक्षा तथा संसर्ग से वह आर्य भाव से सम्पन्न था। नरकासुर ने अपने पिता भगवान नारायण की कठिन तपस्या की तथा एक प्रकार से अमरत्व एवं श्री सम्पन्नता प्राप्त कर ली थी। भगवान नारायण ने नरकासुर को पहले ही बता दिया गया था कि! राज्य वृद्धि के लिए उसे द्वापर के अंत में ही पुत्र की प्राप्ति होगी। तुम देवताओं तथा ब्राह्मणों के प्रति अनुकूल आचरण रखना तथा उनका यथोचित सम्मान करना, अपनी असुरी संस्कारों से उनका कभी तिरस्कार, अपमान इत्यादि ना करना। जगन्माता कामाख्या या श्री विद्या की यथाविधि आराधना, उपासना में सर्वदा रत रहना; अन्यथा तुम नष्ट हो जाओगे। नरकासुर, भगवान नारायण की आज्ञा मानते थे, परिणामस्वरूप उसकी लक्ष्मी तथा राज्य की वृद्धि स्थिर थी तथा उस का राज्य त्रेता तथा द्वापर युग तक विद्यमान रहा।
द्वापर युग के अंत में, पाताल पति महाराज बलि के पुत्र वाणासुर तथा नरकासुर में घनिष्ठ मित्रता हुई। वाणासुर! देव एवं ब्राह्मण द्रोही एवं दैत्य प्रवृति संपन्न था, उसकी कुसंगति में पड़कर नरकासुर भी देव तथा ब्राह्मण द्रोही बन गया था। अपनी दैत्य प्रवृति के परिणामस्वरूप नरकासुर तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा, जिससे भीषण संहार होने लगा। उसके प्रताप से तीनों लोक भय-भीत रहने लगे, उसने देवराज इंद्र को पराजित कर देवमाता अदिति का कुण्डल हरण कर लाया था, वह अरुण को परास्त कर उस का छात्र ले आया था। नरकासुर के अत्याचार से प्रताड़ित सभी देवता, ब्रह्मा जी के पास गए तथा इस समस्या के निवारण हेतु प्रार्थना करने लगे। ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं को श्री विद्या माता त्रिपुरसुंदरी या माता कामाख्या की आराधना कर, उसनें अभय प्राप्ति का उपाय सुझाया। क्योंकि, नरकासुर के राज्य की देवी ही रक्षा करती थी, वह राज्य उन्हीं के अधीन थी। तदनंतर सभी देवताओं ने माता कामाख्या की आराधना की, उन्हें यथाविधि प्रसन्न किया तथा उन से अभय का वरदान प्राप्त किया।


नरकासुर के राज्य में महर्षि वशिष्ठ सन्ध्याचल पर्वत पर साधना करते थे, एक दिन वे माता कामाख्या के दर्शन हेतु आये। वाणासुर के कुसंगति से प्रेरित होने के कारण नरकासुर, देवी कामाख्या से द्वेष करने लगा था, उसने महर्षि वशिष्ठ को देवी दर्शन की आज्ञा नहीं दी; परिणामस्वरूप महर्षि ने क्रोधित होकर देवी कामाख्या को नरकासुर के राज्य से अंतर्ध्यान होने का श्राप दे दिया। नरकासुर स्वयं भगवान विष्णु के पुत्र थे तथा पृथ्वी उनकी माता थी, उन्हीं के आशीर्वाद से नरकासुर ने त्रेता से द्वापर युग तक, सुख, समृद्धि से भरे राज्य का भोग किया। परन्तु, देवी कामाख्या तथा अन्य देवताओ से द्रोह करने के कारण, पथ भ्रष्ट नरकासुर को देवी ने छल से भगवान विष्णु द्वारा वध करवाया।


प्राग्ज्योतिषपुर, महामाया कामाख्या का निवास स्थल हैं तथा आज वहाँ पर देवी का भव्य मंदिर विद्यमान हैं। सर्वप्रथम, काम देव ने देव-शिल्पी विश्वकर्मा से देवी का मंदिर बनवाया, जो तीनों लोकों में आनन्दाख्य मंदिर के नाम से विख्यात था। ऐसा माना जाता हैं की नरकासुर ने भी यहाँ पर देवी का एक मंदिर बनवाया, जहां वह उनकी पूजा आराधना करता था तथा साथ ही उसका निजी भवन भी था। नील-पर्वत पर ऊपर स्थित मंदिर तक जाने हेतु, चार मार्गों का निर्माण भी नरकासुर द्वारा ही हुआ था, जो व्याघ्रद्वार, हनुमंतद्वार, स्वर्गद्वार तथा सिंघद्वार के नाम से आज भी जाने जाते हैं। एक दिन देवी कामाख्या ने नरकासुर को अपनी मनमोहक, मुग्ध कर देने वाली छटा दिखाई, परिणामस्वरूप नरकासुर देवी से मोहित हो गया तथा उनसे अपनी पत्नी बनाने की इच्छा प्रकट की। देवी कामाख्या, नरकासुर के वध हेतु छल स्वरूप उसके सनमुख प्रकट हुई थी, देवी ने नरकासुर के सनमुख एक प्रस्ताव रखा! "अगर एक ही रात में प्रातः कुक्कुट (मुर्गा) के बोलने से पूर्व, पर्वत के चारों दिशाओं में चार प्रशस्त मार्ग का निर्माण करने के साथ उनके निमित्त एक भव्य विश्राम गृह का निर्माण करवा देगा, तो मैं तेरी पत्नी बन जाऊंगी अन्यथा तेरा नाश कर दूंगी।" घमंड में चूर नरकासुर ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, देवी को पत्नी रूप में पाने की लालच में शीघ्र ही पथ तथा विश्राम-गृह निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया। देवी ने असुर के कार्य के वेग को देख, माया-रूपी कुक्कुट (मुर्गा) से रात्रि समाप्त होने से पहले ही रात्रि समाप्त होने की सूचना देने की आज्ञा दी तथा कुक्कुट द्वारा ऐसा ही किया गया। रात्रि समाप्त होने से पूर्व ही कुक्कुट ने अपने स्वाभाविक ध्वनि से प्रातः होने की सूचना दी; जिसके कारण क्रोध में आये हुए नरकासुर, उस कुक्कुट के वध हेतु उद्धत हुआ तथा उसका पीछा करते हुए ब्रह्मपुत्र नदी पार कर दूसरी ओर गया तथा कुक्कुट का वध किया। यहाँ, नरकासुर एक ही रात्रि में पर्वत पर चार प्रशस्त मार्ग तथा भवन का कार्य पूरा नहीं कर पाया, कारणवश देवी की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध कर, तीनों लोकों को भय मुक्त किया। आज भी नील पर्वत के चार मार्ग जो कामाख्या मंदिर तक जाते हैं, नरकासुर द्वारा ही बनाये गए थे।

नील पर्वत जाकर कामदेव-रति द्वारा देवी महामाया कामाख्या की महिमा का प्रचार करना तथा पुनः पूर्व रूप प्राप्त करना।

शिव तथा पार्वती के विवाह स्थल पर काम देव की पत्नी रति भी अपने पति को पुनः प्राप्त करने हेतु शिव जी की वन्दना करने लगी। देवी रति काम देव के भस्म को शिव जी के सनमुख रखा तथा विलाप करते हुए उन्हें पुनः जीवित करने की प्रार्थना करने लगी; विष्णु आदि देवताओं ने भी भगवान से इस प्रकार से प्रार्थना की। सभी की प्रार्थना को स्वीकारते हुए, शिव जी ने उस भस्म की और दृष्टिपात किया, जिसके फलस्वरूप काम देव आविर्भूत हुए; इस प्रकार देवी रति ने शिव विवाह के समय अपने पति को पुनः प्राप्त किया। परन्तु, काम के देव को उनका पहले जैसा रूप नहीं प्राप्त हुआ, तदनंतर दोनों पति-पत्नी भगवान के निकट जाकर नाना प्रकार से शिव स्तुति करने लगे। भगवान शिव ने काम-देव तथा रति से कहा! "नीलाचल पर्वत श्रृंखला पर देवी सती के देह खण्डों में एक गुप्त खंड विद्यमान हैं, वे दोनों वहां जाकर देवी की महिमा की प्रतिष्ठा करें; उनकी पूजा-आराधना तथा महिमा प्रचार करने से उन्हें पुनः पहले जैसा रूप प्राप्त हो जाएगा।" इस प्रकार अपने शारीरिक कांति पुनः प्राप्त करने के उपाय को जानकार कामदेव तथा देवी रति! नील पर्वत (नीलाचल) पर गए। उन दोनों दंपति ने यथाविधि महा-मुद्रा पीठ पर आकर पूजा-अर्चना प्रारंभ की तथा देवी को संतुष्ट एवं प्रसन्न किया तथा देवी की कृपा से कामदेव ने पुनः अपना पूर्व रूप प्राप्त किया। इस स्थान पर कामदेव ने अपना पूर्व रूप प्राप्त किया था, कारणवश इस स्थान को कामरूप क्षेत्र कहा जाता हैं।
काम-देव ने देवी महात्म्य प्रचार हेतु देव शिल्पी विश्वकर्मा से महा-मुद्रा स्थल पर एक पाषाण मंदिर बनवाने का आह्वान किया; अपने कारीगरों के साथ देव-शिल्पी भी छद्म भेष में मंदिर निर्माण कार्य में जुट गए। मंदिर की दीवारों पर ६४ योगिनियों तथा अष्ट-दश भैरव की प्रतिमा का निर्माण करवा कर, काम-देव ने इस मंदिर का नाम आनंदाख्या मंदिर नाम दिया।

कूच बिहार के राजा विश्व सिंह द्वारा कामाख्या पीठ की खोज तथा मंदिर पुनर्निर्माण

नरकासुर के पश्चात, कालांतर में देवी कामाख्या से सम्बद्ध यह पीठ प्रायः लुप्त हो गया था, केवल मात्र एक स्तूप रूप में मंदिर के कुछ अंश बचे हुए थे। यहाँ केवल मेच तथा कोच संप्रदाय के जन-जातीय लोग विपत्ति उपस्थित होने पर, नाना प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हेतु, उत्सवों तथा त्यौहार पर देवी की पशु-पक्षियों की बलि देकर पूजा अर्चना करते थे। किसी की कोई वास्तु या पालतू पशु खो जाने पर लोग यहाँ मनोकामना मांगते थे।

नीलाचल पर्वत पर महाराजा विश्व सिंह तथा उनके छोटे भाई का अपने सेना से बिछड़ना, एक वृद्ध महिला द्वारा उन्हें अमृत तुल्य जल पान करवाना तथा मांगी हुई मनोकामना के फलस्वरूप सेना से वापस मिलना।

कूच-बिहार के महाराजा विश्व सिंह ने देवी महामुद्रा पीठ, वर्तमान कामाख्या मंदिर का जीर्णोधार करवाया; पहले के मंदिर के केवल कुछ अंश ही बचे हुए थें। एक दिन महा-राजा विश्व सिंह तथा उनके छोटे भाई शिव सिंह, अहोम राजाओं के साथ युद्ध करते हुए, रात में नीलाचल पर्वत पर मार्ग भूल गए तथा अपनी सेना से बिछड़ गए। इधर-उधर अपनी सेना को ढूंढ़ते हुए वे दोनों थक गए तथा प्यास के मारे व्याकुल होकर जल श्रोत की खोज करने लगे। दोनों निराश होकर वापस लौट ही रहें थे की एकाएक एक अदृश्य शक्ति उन्हें देवी के खंडित मंदिर स्तूप के पास ले गई तथा दोनों भाई ने वहाँ एक बुढ़िया को पूजा अर्चना करते देखा। उन्होंने बुढ़िया से सर्वप्रथम जल पान करने हेतु प्रार्थना की, बुढ़िया ने उन्हें वहां स्थित जल कुंड से अमृत तुल्य जल पिलाया, तदनंतर वे एक वृक्ष तले विश्राम करने लगे। विश्राम करते हुए उनके मन में इस स्थान से सम्बन्ध में और अधिक जानने की उत्सुकता जागी। दोनों भाई ने बुढ़िया से कई प्रश्न किये! जिससे उन्हें ज्ञात हुआ कि! यह स्थान एक सिद्ध देवी पीठ हैं तथा यहाँ मांगी हुई हर मनोकामना पूरी होती हैं। दोनों ने देवी माँ को प्रणाम किया तथा उनकी मानसिक पूजा की, तदनंतर महाराजा ने व्याकुल होकर उनके सैन्य-दल से वापस मिला देने तथा उन्हें निष्कंटक राज्य प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। साथ ही महाराजा ने मन ही मन प्रण किया कि! कामना पूरी होने पर वे उस स्थान पर सोने का मंदिर बनवाएंगे तथा विशेष पूजा आराधना की व्यवस्था करेंगे। कुछ समय पश्चात ही वे अपनी बिछड़ी हुई सेना से वापस मिल गए, इस कारण उनके मन में देवी के प्रति दृढ़ विश्वास जागृत हुई। महाराजा ने वृद्ध महिला से देवी पूजा-अर्चना से सम्बंधित और अधिक ज्ञान प्राप्त किया तथा देवी पीठ के प्रति श्रद्धा युक्त हुए।
जिस स्थान (कुंड) पर महाराज ने जल पान किया था वहां उन्होंने अपने नाम लिखित हीरे की अंगूठी डाल दी थीं तथा मन ही मन कामना की कि अपने राज्य वापस लौटने के पश्चात वे काशी में गंगा-स्नान हेतु प्रस्थान करेंगे। और यदि उन्हें काशी में गंगा स्नान करते हुए उनकी नाम लिखित अंगूठी वहां मिल जाए तो वे देवी शक्ति को प्रत्यक्ष स्वीकार करेंगे। राज्य में लौटने के पश्चात वे राज-कार्य में व्यस्त रहकर सब भूल गए; एक बार महाराजा जब काशी गंगा स्नान हेतु गए तथा वे गंगा जी में स्नान तर्पण कर रहें थे, उनके हाथ में अंजलि हेतु लिए हुए जल के साथ वह अंगूठी भी उनके हाथ में आ गई। इस घटना से महाराजा बहुत आश्चर्य-चकित हुए तथा उन्हें सहसा याद आया की उन्होंने वह अंगूठी नीलाचल पर्वत के जल स्रोत में डाल दी थीं। वापस अपने राज्य-देश लौट-कर उन्होंने इस अचंभित करने वाली घटना को अपने पण्डितों से सभा बुलवा कर चर्चा करवाया, सभी ने माना की वृद्ध महिला द्वारा बतलाया हुआ वह स्थान सिद्ध जाग्रत पीठ हैं। महाराज भी अपने प्रतिज्ञा पालन हेतु कटिबद्ध हो उठे तथा नीलाचल पर्वत पर जाकर अपने कर्मचारियों सहित शिविर की स्थापना की। जंगल इत्यादि साफ करवा कर, उस स्थान की खुदाई की गई; जिससे काम-देव के बनाए हुए मंदिर के कुछ अंश प्राप्त हुए।

सादाहरण शिला खण्डों से मंदिर निर्माण पर रात में मंदिर टूट कर गिरना, प्रत्येक शिला खंड के ऊपर एक-एक रत्ती सोने से मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण करना तथा कलापहड़ द्वारा मंदिर पर आक्रमण।

महाराज ने उस स्थान पर सादाहरण शिला खण्डों से मंदिर बनवाने का कार्य प्रारंभ किया, परन्तु दिन में निर्मित मंदिर रात में गिरकर टूट जाती थीं तथा कई दिनों तक ऐसा ही होता रहा। एक रात्रि में महाराज ने सपना देखा की उनके सिरहाने एक रक्त वस्त्र धारण की हुई एक कन्या आकर बैठीं तथा कहने लगी! "हे राजन! पूर्व की प्रतिज्ञा का स्मरण करो! तुमने सोने के मंदिर बनवाने की प्रतिज्ञा की थीं" इस पर महाराज को अपने प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया, परन्तु सोने का मंदिर बनवाने हेतु इतनी अधिक मात्रा में सोना महाराज के पास नहीं था। इस निमित्त महाराज ने कन्या से विनम्र प्रार्थना की, इस प्रकार उनकी कातर ध्वनि सुनकर देवी ने उन्हें प्रत्येक शिला खंड के ऊपर एक-एक रत्ती सोना रखकर मंदिर निर्माण करने हेतु कहा; इस प्रकार मंदिर का कार्य पूरा हुआ। असम-बंगाल से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निर्वाचित कर, धन तथा भूमि आदि उन्हें प्रदान कर उन्हें वहां बसाया गया तथा देवी की उत्तम पूजा अर्चना की व्यवस्था की गई।
महाराजा विश्व सिंह की मृत्यु के पश्चात, उनके पुत्र नर-नारायण पितृ सिंहासन पर आरूढ़ हुए तथा उन्होंने अपने छोटे भाई चिला-राय को युवराज तथा प्रधान सेनापति घोषित कर दिया। दोनों भाइयों ने अपने पिता के वैरी अहोम राजा! खोर को परास्त कर चारों और विजय प्राप्त की। परन्तु महाराजा विश्व सिंह के अंतिम राज-काल के समय से ही बंग-देश के अधिकार को लेकर बड़ी समस्या थीं। गौड़ देश में मुस्लिम नवाबों का आधिपत्य था तथा वे एक दूसरे से आपस में भिड़े हुए थे, महाराजा नर-नारायण ने दक्षिण-पश्चिम में अपने राज्य विस्तार का संकल्प लिया, जिसके कारण अन्य अहोम राजाओं के साथ घोर युद्ध हुआ। इस समय मुस्लिम सेनापति स्वधर्म द्रोही कालापहाड़ ने १५५३ में कामाख्या मंदिर पर आक्रमण कर मंदिर को बहुत क्षति पहुँचाई, उस समय महाराजा विश्व सिंह द्वारा संस्कार किये हुए कामाख्या मंदिर की विशेष प्रसिद्धि थीं। युद्ध में व्यस्त रहने के कारण महाराज नर-नारायण, कालापहाड़ के आक्रमण को रोकने में असमर्थ रहें।

गौड़ देश के नवाव के साथचिला-राय का युद्ध हेतु जाना, नवाव द्वारा चिला-राय को बंदी बनाया जाना तथा नवाव के माँ की चिकित्सा।

श्री-हट्ट विजय प्राप्ति के पश्चात नर-नारायण तथा चिला-राय ने कालापहाड़ के कुकृत्यों का बदला लेने की योजना बनाई तथा गौड़ देश के मुस्लिम शासकों पर आक्रमण करने का संकल्प लिया। युद्ध में जाने से पूर्व दोनों भाई कामाख्या मंदिर पर गए, जहाँ के क्षत-विक्षत अवस्था को देख कर उनका मन बहुत क्षुब्ध हुआ। उस समय युद्ध हेतु उद्धत होने के कारण वे मंदिर के संस्कार हेतु असमर्थ थे, उन्होंने देवी माँ से युद्ध में विजय पश्चात मंदिर के पुनर्निर्माण करने का संकल्प लिया। महाराजा नर-नारायण ने इस प्रकार संकल्प लेकर अपने अनुज चिला-राय को सैन्य-दल के साथ गौड़ नवाब सुलेमान से युद्ध हेतु भेजा। परन्तु, घोर युद्ध होने के पश्चात चिला-राय को प्रथम बार बंदी बना लिया गया। कुछ दिनों तक चिला-राय सुलेमान के कारागार में बंदी रहें, इस अवस्था में देवी कामाख्या ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया तथा कहा! टूटे हुए मंदिर को देख कर भी उसके संस्कार की व्यवस्था न कर वह युद्ध हेतु निकला, इस उपेक्षा के कारण ही उनकी यह दशा हुई हैं। काल नवाब की माँ को सांप काट लेगा, जिसकी चिकित्सा किसी भी हाकिम-वैध से नहीं हो पायेगी तथा अंत में तुम्हें बुलवाया जाएगा। तुम यह कहना! "तुम नवाब की माता को पूर्ण रूप से स्वस्थ करने में समर्थ हो।" अगले दिन ऐसा ही हुआ, नवाव की माता को सांप ने डस लिया, राज्य के समस्त वैधों- ओझाओं ने उन्हें स्वस्थ करने की पूर्ण चेष्टा की पर कोई फल नहीं प्राप्त हुआ। अंत में देवी कामाख्या एक वृद्ध महिला का भेष बदल कर नवाव के पास आईं और कहा! "कारागार में बंदी चिला-राय उनके माता के चिकित्सा करने में समर्थ हैं।" तुरंत ही नवाव सुलेमान ने चिला-राय को बुलवाया तथा उनसे उनकी माता को स्वस्थ करने के निमित्त निवेदन किया; देवी कामाख्या के प्रसाद से वे नवाव की माता को चिला-राय स्वस्थ करने में सफल रहें। नवाव की माता के अनुरोध पर नवाव सुलेमान तथा चिला-राय ने आपसी बैर भूल कर स्नेह युक्त हो भातृ-भाव स्थापित किया। तदनंतर, नवाव ने सम्मान से साथ चिला-राय को अपने गृह भेज दिया, अपने राज्य में आकर उन्होंने सभी को पूर्ण वृतांत कह सुनाया।

महाराज नर-नारायण तथा उनके भ्राता चिला-राय, कालापहड़ द्वारा क्षति ग्रस्त हुए मंदिर के संस्कार में प्रवृत्त हुए, १५५५ में मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया तथा सन १५६५ में कार्य पूर्ण हुआ। सन १८९३ ई. के भीषण भूकंप में क्षति ग्रस्त होने पर, कूच-बिहार के राज वंश ने ३२०० रु मंदिर जीर्णोद्धार हेतु दिए थें।

देवी कामाख्या के शाप से केंदुकलाई नाम के पुजारी ब्राह्मण का पाषण तथा महाराज नर-नारायण का अंधा हो जाना।

केंदुकलाई नाम के एक पुजारी ब्राह्मण कामाख्या मंदिर के सिद्ध पुरोहित थें, नित्य संध्या काल में वे बड़े ही भक्ति भाव से देवी माँ की आरती करते थे तथा देवी कामाख्या उन्हें नित्य दर्शन देती थीं। धीरे-धीरे यह समाचार चारों ओर फैला तथा महाराज नर-नारायण को जब यह पता चला, उनके मन भी देवी दर्शन हेतु तीव्र अभिलाषा जागृत हुई एवं वे अपने राज्य से कामाख्या मंदिर आयें। उन्होंने पुजारी ब्राह्मण से निवेदन किया! जिनके दर्शन बड़े-बड़े योगी-मुनि नहीं कर पाते हैं, वह देवी उन्हें नित्य दर्शन देती हैं, वे ऐसे कोई व्यवस्था करें जिससे वे भी अपने आराध्य इष्ट देवी के दर्शन कर सकें। इस हेतु उन्हें जितनी भी धन-रत्न इत्यादि चाहिये, वे उन्हें प्रदान करेंगे। महाराज के इस प्रकार निवेदन करने पर पुजारी किसी अदृश्य भय से आतंकित हो उठे तथा महाराज से कहने लगे! "किसी छल के सहारे देवी दर्शन उचित नहीं हैं, वे देवी की भक्ति-युक्त हो नित्य आराधना-पूजा करें, वे सभी की अभिलाषा पूर्ण करती हैं।" परन्तु, महाराज नहीं माने और अधिकाधिक अनुनय-विनय करने लगे, अन्तः में पुजारी ने देवी दर्शन हेतु एक गुप्त उपाय बताया और खिन्न हो गए। नित्य की तरह संध्या के समय पुजारी आरती करने लगे तथा घंटा-ध्वनि से विहल हो देवी कामाख्या भक्त ब्राह्मण पुजारी के सामने नृत्य करने लगे; पुजारी के निर्देशानुसार महाराजा भी उत्तर भाग के एक झरोखे से झांक रहे थे। मंदिर के भीत दिव्य अलौकिक प्रकाश था, अचानक महाराज की आंखें चौंधिया गई तथा देवी कामाख्या क्रुद्ध हो गई। उन्होंने पुजारी ब्राह्मण केंदुकलाई के मस्तक पर चपेटा मारा और उन्हें पाषाण होने का श्राप दे दिया तथा महाराज उसी क्षण अन्धे हो गए। महाराज की इस हीन आचरण के कारण देवी कामाख्या महाराज पर अत्यंत क्रोधित हुई तथा शाप दिया कि! "तू अभी नीलाचल पर्वत का त्याग कर चला जा, तेरे वंश का कोई भी इस पीठ के दर्शन हेतु वंचित रहेगा। दर्शन तो दूर हैं, अगर तेरे वंश का कोई भी इस पीठ पर आया तो तेरे वंश का नाश हो जाएगा।"

कामाख्या मंदिर से सम्बंधित अन्य तथ्य।

दस-महाविद्या श्रेणी की विभूतियों के अंतर्गत देवी षोडशी, त्रिपुर-सुंदरी ही देवी कामाख्या का अन्य नाम हैं। देवी पीठ के संलग्न ही देवी सरस्वती तथा देवी लक्ष्मी का पीठ-स्थान हैं, यहाँ तीनों महा-देवियों की पूजा की जाती हैं। मूल देवी मंदिर के भीतर अष्ट-भैरव की मूर्तियाँ हैं तथा बाहरी दीवाल पर २४ पुरुष तथा ३६ नारी मूर्तियाँ नृत्य मुद्रा में बनी हुई हैं। इस पीठ पर देवी कुमारी रूप में विद्यमान हैं, चिर यौवन हैं; यहाँ कुमारी पूजन करने से समस्त देवी देवताओं की पूजा हो जाती हैं। इस पीठ या नील पर्वत कर दस महाविद्याओं के मंदिर विद्यमान हैं तथा इस पीठ के भैरव! उमानंद हैं।

योनि पीठ कामाख्या से सम्बंधित चित्र

६४ योगिनियों की मूर्तियां, कामाख्या मंदिर के दीवारो पर
६४ योगिनियों की मूर्तियां, कामाख्या मंदिर के दीवारों पर स्थापित।