सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा

समस्त जीवों के पितामह, अपने ज्ञान से ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थूल तथा परा जीव तथा वस्तुओं का निर्माण करने वाले 'पितामह ब्रह्मा जी'। संसार या ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता, तमो गुण सम्पन्न, सृजन कर्ता।

पालन-कर्ता विष्णु

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालन-हार, पालन-पोषण के कर्त्तव्य या दाइत्व का निर्वाह करने वाले, सत्व गुण सम्पन्न 'श्री हरि विष्णु'। सृजन के पश्चात् तीनों लोकों के प्रत्येक तत्व तथा जीव का पालन-पोषण करने वाले।

संहार-कर्ता शिव

तीनों लोकों में विघटन या विध्वंस के प्राकृतिक लय के अधिष्ठाता, तमो गुण सम्पन्न 'शिव'। वह शक्ति जो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीवित तथा निर्जीव तत्व के विघटन के कार्यभार का निर्वाह करती हैं।

सांख्य योग के आचार्य, भगवान श्री हरि विष्णु के पांचवे अवतार कपिल मुनि।

कदर्म प्रजापति के घर देवहूति के गर्भ से नौ बहनों के संग कपिल रूप में अवतार धारण कर, समय के फेर से लुप्त हुई तत्वों का निर्णय करने वाले सांख्य-शास्त्र का आसुरी नामक ब्राह्मण को उपदेश दिया।

कदर्म जी की तपस्या तथा भगवान नारायण का वरदान।

स्वायम्भुव मनु के वंश ने मैथुन धर्म के द्वारा प्रजा की वृद्धि की, इनके पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपाद ने सात द्वीपों वाली इस पृथ्वी का यथावत धर्म पूर्वक पालन किया। स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूति कदर्म प्रजापति की व्याही गई थीं।
ब्रह्मा जी ने कदर्म प्रजापति को संतान उत्पत्ति की आज्ञा दी, तदनंतर उन्होंने कई वर्षों तक सरस्वती नदी के तट पर तपस्या प्रारंभ की। वे एकाग्रचित हो भगवान श्री हरि की आराधना करने लगे। उनकी तपस्या से संतुष्ट हो, सत्य युग के प्रारंभ में भगवान श्री हरि ने उन्हें शब्दब्रह्ममय रूप से मूर्तिमान होकर दर्शन दिया। भगवान नारायण भव्य सूर्य के समान तेजोमय थे, अपने वाहन गरुड़ पर आरूढ़ थे, उनके गले में श्वेत पद्म और कुमुद पुष्पों की माला थीं, गले में कौस्तुभ मणि, मुख नीली तथा चिकनी अलकावली से सुशोभित थे। शंख, पद्म, गदा तथा चक्र उन्होंने अपने हाथों में धारण कर रखीं थीं, कदर्म जी ने उनको साष्टांग प्रणाम किया तथा हाथ जोड़ कर मधुर वाणी में उनकी स्तुति की।
कदर्म की तपस्या से संतुष्ट भगवान श्री हरि ने उनसे कहा ! “मैंने तुम्हारे हृदय के भाव को जानकार पहले से ही उसकी व्यवस्था कर दी हैं। मेरी साधना कभी निष्फल नहीं होती हैं, प्रसिद्ध यशस्वी सम्राट स्वायम्भुव मनु ब्रह्मावर्त में रहते हुए सात समुद्र से युक्त इस पृथ्वी का शासन करते हैं। उनकी एक रूप-यौवन, शील तथा गुणों से सम्पन्न कन्या विवाह के योग्य हैं, प्रजापते तुम सर्वथा उसी के योग्य हो, वे तुम्ही को वह कन्या अर्पण करेंगे, परसों वे तुमसे मिलने यहाँ आएंगे। अब शीघ्र ही वह राजकन्या तुम्हारी पत्नी हो तुम्हारी यथेष्ट सेवा करेगी, तुम्हारे वीर्य अपने गर्भ में धारण कर नौ कन्याएं उत्पन्न करेगी, जिससे मरीचि आदि ऋषिगण संतान उत्पन्न करेंगे। में भी अपने अंश काला रूप से तुम्हारे वीर्य द्वारा तुम्हारी पत्नी देवहुति के गर्भ में अवतीर्ण होकर सांख्य शास्त्र की रचना करूँगा। तदनंतर श्री हरि विष्णु वहाँ से अपने लोक को चेले गए।

स्वायम्भुव मनु का कदर्म जी से मिलने, बिंदु-सरोवर पर जाना तथा अपनी कन्या “देवहूति” को कादर्म जी को समर्पित करना।

श्री हरि के जाने के पश्चात, कदर्म जी उनके समय की प्रतीक्षा करते हुए बिंदु-सरोवर में ही रुके रहे। मनु जी, महारानी सतरूपा तथा उनकी कन्या रथ में आरूढ़ हो, पृथ्वी पर विचरते हुए भगवान श्री हरि के बताये अनुसार दिन में महर्षि कदर्म के आश्रम पर पधारे। सरस्वती के जल से भरा हुआ बिंदु-सरोवर वह स्थान हैं, जहाँ कदर्म के प्रति उत्पन्न हुई, अत्यंत करुणा के वशीभूत हो भगवान श्री हरि के नेत्रों से अश्रु की बूंदें गिरी थीं। उस स्थान में पहुँच कर, मनु ने देखा ! बहुत काल तक तपस्या करने के परिणामस्वरूप कदर्म जी का शरीर बहुत तेजस्वी प्रतीत हो रहा था। महाराज मनु को अपनी कुटिया में आये हुए तथा प्रमाण करते देख कर कदर्म जी ने उन्हें आशीर्वाद से प्रसन्न किया तथा यथोचित आतिथ्य की रीति से उनका स्वागत सत्कार किया। कदर्म जी ने उनसे वहां आने का प्रयोजन पूछा तथा उनके लिए यथोचित आज्ञा देने का निवेदन किया।
मनु ने कदर्म जी से कहा ! मुने ! ब्रह्मा जी ने वेदों की रक्षा हेतु, ताप, विद्या, योग से संपन्न और विषयों में अनासक्त आप जैसे ब्राह्मणों को अपने मुख से उत्पन्न किया। इस कन्या के स्नेह वश मेरा चित बहुत चिंता ग्रस्त रहता हैं; कृपा कर आप मेरी प्रार्थना सुने !
“ये मेरी कन्या जो प्रियव्रत तथा उत्तानपाद की बहिन हैं, अवस्था, शील और गुण आदि में अपने योग्य वर प्राप्त करने की इच्छुक हैं तथा जब से इस ने नारद जी के मुखारविंद से आप के बारे में सुना हैं, ये आप को ही अपने वर के रूप में प्राप्त करना चाहती हैं। द्विज वर मैं आप को ये कन्या बड़ी श्रद्धा से समर्पित करता हूँ, कृपा कर आप इसे स्वीकार कीजिये। यह गृहस्थोचित कार्यों हेतु सभी प्रकार से उपयुक्त हैं, मैंने सुना हैं आप विवाह करने हेतु उत्सुक हैं। आप का ब्रह्मचर्य एक सीमा तक हैं, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो हैं नहीं, इसलिए आप इस कन्या को स्वीकार कीजिये।”

कदर्म जी के संग मनु कन्या देवहूति का विवाह।

मनु के इस प्रकार निवेदन करने पर, कदर्म जी ने उनकी कन्या से ब्रह्मा विधि से विवाह करने का निश्चय कर लिया। इस विवाह के निमित्त कदर्म जी ने एक पण (शर्त) भी रखा, जब तक उनके कोई संतान न हो जाये, तब तक ही वे गृहस्थ धर्म अनुसार रहेंगे, उसके पश्चात भगवान के बताये हुए संन्यास प्रधान धर्मों को अधिक महत्व देंगे। जिसे मनु तथा उनकी पत्नी सतरूपा ने स्वीकार कर लिया, तदनंतर दोनों ने प्रसन्नता पूर्वक अपनी कन्या का कदर्म जी को बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित सम्माग्रियों के संग दान कर दिया, इसके पश्चात वे अपने नगर ब्रह्मावर्त की राजधानी वर्हिष्मती गए। यह वह स्थान हैं, जहाँ पृथ्वी को रसातल से लाने के पश्चात शरीर कंपन से भगवान वराह के रोम झड़ कर गिरे थे, वे रोम ही निरंतर हरे भरे रहने वाले कुश और कास हुए।
माता-पिता के चले जाने के पश्चात देवहूति कदर्म जी की, ठीक उसी प्रकार प्रतिदिन प्रेम पूर्वक सेवा करने लगी, जैसे पार्वती जी भगवान् शिव की करती हैं। समस्त प्रकार के इन्द्रिय विकारों जैसे काम-वासना, दंभ, द्वेष, लोभ, पाप और मद का त्याग कर बड़ी सावधानी से देवहूति, कदर्म जी की सेवा में लगी रहती थीं। विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम, मधुर भाषण इत्यादि गुणों से देवहूति अपने पति देव को संतुष्ट करती थीं। अपने पति को ही देवता मान कर, देवहूति पति की सेवा करती थीं तथा उनसे कई आशाएं रखती थीं। कदर्म जी की सेवा करते हुए वे बड़ी दीन हो गई थीं, शरीर सुख गया था। एक दिन देवहूति ने अपने पति कदर्म जी को वह प्रतिज्ञा याद करवाया जिस में उन्होंने ये कहा था कि, “गर्भाधान होने तक में तुम्हारे साथ गृहस्थ सुख का उपभोग करूँगा”, आब उस की पूर्ति होनी चाहिये। देवहूति ने दोनों के समागम हेतु शास्त्र के अनुसार जो कर्तव्य हो उसका प्रबंध करने की इच्छा प्रकट की तथा एक भवन की निर्माण करने हेतु भी प्रार्थना की।

आपनी पत्नी देवहूति के इच्छा पूर्ति निमित्त, समागम हेतु दिव्य विमान का निर्माण कर दोनों पति-पत्नी का विहार करना तथा एक संग नौ कन्याओं का जन्म।

कदर्म मुनि जो सर्वथा ही भगवान श्री हरि की साधना में लगे रहते थे, अपनी पत्नी देवहूति के निवेदन पर उन्होंने योग में स्थित होकर एक विमान का निर्माण किया, जो इच्छा अनुसार सभी स्थानों में जा सकता था। साथ ही वह विमान सर्व कामना के अनुसार इच्छित भोग-सुख प्रदान करने वाला था, अत्यंत सुन्दर तथा मनोरम, नाना प्रकार के रत्नों से युक्त, सभी ऋतुओं में सुखदायक था। कदर्म जी ने देवहूति को बिंदु-सरोवर में स्नान कर उस भवन पर प्रवेश करने हेतु कहा। देवहूति ने अपने पति की बात मानते हुए सरस्वती नदी के पवित्र जल से भरे हुए उस सरोवर में प्रवेश किया, उस समय वह बहुत मैली-कुचैली शादी पहने हुए थीं, शरीर में मेल जमा हुआ था तथा कांतिहीन थे, सर के बाल आपस में चिपके हुए थे। सरोवर में गोता लगाते ही देवहूति एक महल में पहुँच गई तथा वहां उन्होंने एक सहस्त्र कन्याओं को देखा। किशोर अवस्था वाली वह सभी कन्यायें, देवहूति को देख कर खड़ी हो गई और हाथ जोड़ कर कहने लगी की “हम सब आप की दासियाँ हैं, हमें आज्ञा दीजिये, हम आप की क्या सेवा करें।” उन कन्याओं ने देवहूति को गंध मिश्रित जल से स्नान करवाया और दो निर्मल तथा नवीन वस्त्र परिधान हेतु प्रदान की। नाना प्रकार के अमूल्य आभूषण, सर्व गुण संपन्न भोजन, पीने के लिए स्वादिष्ट आसव भी दिए, उन कन्याओं ने उनका मांगलिक शृंगार किया, नाना प्रकार के आभूषणों से सजाया गया। देवहूति ने अपने पति कदर्म का स्मरण किया तो अपने आप को सहेलियों सहित वही पर पाया, वहां कदर्म ऋषि विराजमान थे, इस पर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ।
कदर्म जी ने जब देखा की देवहूति का शरीर स्नान करने से निर्माण हो गया हैं तथा विवाह काल से पूर्व उनका जैसा स्वरूप-रूप था वैसी हो गई हैं, अपूर्व शोभा से संपन्न हो गए हैं, उन्होंने बड़े प्रेम से अपनी पत्नी को विमान पर चढ़ाया। उस दिव्य विमान पर निवास कर उन्होंने दीर्घ काल काक कुबेर जी के समान मेरु पर्वत की घाटियों में विहार किया, कामदेव को बढाने वाली शीतल, सुगन्धित, मंद वायु इन दोनों की कमनीय शोभा का विस्तार कर रहीं थीं। कदर्म जी यह सारा भूमंडल, जो द्वीप-वर्ष आदि की विचित्र रचना के कारण बड़ा ही आश्चर्य मय प्रतीत होता हैं, अपनी प्रिय देवहूति सहित विहार कर आपने आश्रम को वापस आ गए। उन्होंने अपने आप को नौ भागों में विभक्त कर रति सुख हेतु उत्सुक देवहूति को आनंदित करते हुए बहुत वर्षों तक विहार किया। आत्म ज्ञानी कदर्म प्रजापति तथा मुनि सर्व प्रकार के संकल्पों के ज्ञाता थे, देवहूति को संतान प्राप्ति हेतु उत्सुक देख तथा भगवान श्री हरि आदेश को स्मरण कर उन्होंने अपने स्वरुप के नौ विभाग किये तथा कन्याओं की उत्पत्ति हेतु एकाग्रचित्त हो पत्नी के गर्भ में अपने वीर्य को स्थापित किया। इस कारण देवहूति ने एक संग नौ कन्याओं को जन्म दिया।
अपनी पूर्व प्रतिज्ञा अनुसार देवहूति ने देखा की उनके पति कदर्म संन्यास आश्रम ग्रहण कर वन जाना चाहते हैं। इस पर देवहूति ने अपने पति से निवेदन किया की, मैं आप की शरणागत हूँ, आप मुझे अभय दान दीजिये। इन नौ कन्याओं हेतु योग्य वर संधान हेतु, मेरे जन्म-मरण रूपी शोक दूर करने हेतु, आप के वन जाने के पश्चात कोई नहीं रहेगा। आपके परम प्रभाव को न जानकार मैंने इन्द्रिय विषयों में आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया हैं, अवश्य ही मैं भगवान की माया से बहुत ठगी गई हूँ, आप जैसे मुक्ति दाता पति देवता को पाकर भी में संसार-बंधन से मुक्त होने की इच्छा नहीं करती हूँ।

श्री कपिल देव जी का जन्म तथा उनकी नौ बहनों का नाना प्रजापतियों से साथ विवाह।

देवहूति की इस प्रकार कहने पर कदर्म जी भगवान श्री हरि के कथन का स्मरण हो आया और उन्होंने अपनी पत्नी को समझाया की बहुत शीघ्र ही भगवान श्री हरि उनके गर्भ में जन्म लेंगे। कदर्म जी ने अपनी पत्नी को संयम, नियम, ताप और दानादि करते हुए श्रद्धा पूर्वक भगवान श्री हरि का भजन करने हेतु कहा, इससे श्री हरि उनके गर्भ से अवतार धारण कर दोनों का गर्व बढ़ाएंगे। देवहूति अपने पति के कथनानुसार पूर्ण विश्वास के साथ भगवान श्री हरि की आराधना करने लगी। अंततः भगवान श्री हरि देवहूति के गर्भ से प्रकट हुए, उस समय आकाश में मेघ जल बरसाने लगे, गन्धर्व गण गान करने लगे, अप्सराएँ आनंदित हो नाचने लगे, आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। उस समय सरस्वती नदी के तट पर कदर्म जी के आश्रम पर मरीचि आदि ऋषि-गणों के संग ब्रह्मा जी भी आयें। ब्रह्मा जी को यह ज्ञात हो गया था की साक्षात् भगवान विष्णु ही सांख्य शास्त्र का उपदेश देने अपने विशुद्ध सत्त्व-मय अंश से अवतीर्ण हुए हैं।
ब्रह्मा जी प्रसन्नता प्रकट करते हुए कदर्म जी ने कहने लगे ! “तुमने मेरा सम्मान करते हुए जो मेरी आज्ञा का पालन किया हैं, इससे तुम्हारे द्वारा निष्कपट भाव से मेरी पूजा हुई हैं। तुम्हारी ये सुन्दर तथा सुशील कन्याएँ, इस सृष्टि में वंश बढ़ाएंगे, अब तुम मरीचि आदि मुनिवरो को इनके स्वभाव अथवा रुचि अनुसार अपनी कन्याओं का अर्पण करो। मैं जनता हूँ आदि-पुरुष श्री नारायण ही अपनी योगमाया से तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए हैं, ये सिद्ध गणों के स्वामी अविद्या जनित मोह का त्याग कर पृथ्वी में स्वछंद रूप से विचरण करेंगे, सांख्य शास्त्र के आचार्य के रूप में माननीय होंगे तथा तुम्हारी कीर्ति का विस्तार कर ‘कपिल’ नाम से प्रसिद्ध होगे।” तदनंतर ब्रह्मा जी, नारद, सनकादि मुनियों सहित अपने वाहन हंस पर विराजमान होकर वह से ब्रह्म लोक चले गए।
ब्रह्मा जी के जाने के पश्चात, कदर्म जी ने मरीचि आदि ऋषियों के साथ अपनी कन्याओं का विधि पूर्वक विवाह किया। कदर्म जी ने अपनी कला नामक कन्या मरीचि को, अनसूया अत्रि को, श्रद्धा अंगीरा को, हविर्भुवा पुलस्त्य को, पुलह को गति, क्रतु के संग क्रिया का विवाह किया, भृगु को ख्याति, वसिष्ठ जी को अरुंधती और अथर्व ऋषि को शांति नाम की कन्या समर्पित की गई। तदनंतर, ये ऋषि कदर्म जी की आज्ञा ले अपने-अपने आश्रमों को पधार गए। इसके पश्चात कदर्म जी कपिल अवतार धारी भगवान विष्णु के पास गए और उनकी स्तुति-वंदना की, साथ ही उन्होंने सन्यास मार्ग में जाने की आज्ञा देने का भी अनुरोध किया।

कपिल मुनि
कपिल मुनि
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योगियों द्वारा ध्यान करने वाले श्री हरि विष्णु
श्री हरि विष्णु

साधु पुरुष के लक्षण तथा संग से लाभ।

बुद्धिमान मानव आसक्ति को आत्मा का अच्छेद्ध बंधन मानते हैं; परन्तु वही आसक्ति या संग जब संत-महापुरुषों हेतु होती हैं तो वह सरलता से मोक्ष का मार्ग खोल देती हैं। जो मानव सहनशील, दयालु, समस्त देहधारियों का हित चाहने वाले, शत्रु भाव का त्याग, शांत, सरल स्वभाव तथा सत्पुरुषों का सम्मान करने वाले होते हैं तथा मेरे (श्री हरि विष्णु) के अनन्य भाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिए सम्पूर्ण कर्मों तथा नाना बंधनों का त्याग करते हैं, मेरे परायण होकर मेरी कथाओं का कीर्तन करते हैं तथा मुझे में चित लगाये रहते हैं; उन भक्तों को संसार का कोई भी ताप या कष्ट नहीं सता सकता हैं। ऐसे पुरुष ही साधुओं की श्रेणी में आते हैं; मानव को उन्हीं सत्पुरुषों के संग की इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि वे आसक्ति से उत्पन्न समस्त दोषों को हरने वाले हैं। सत्पुरुषों या साधु पुरुषों के समागम से शीघ्र ही मोक्ष मार्ग में श्रद्धा, प्रेम तथा भक्ति का क्रमशः विकास होता हैं, मेरी सृष्टि आदि लीलाओं का चिंतन करने से प्राप्त हुई मेरी भक्ति द्वारा इस लोक तथा परलोक के भोग-विलासों में वैराग्य हो जाने पर मनुष्य, योग के भक्ति प्रधान इत्यादि नाना सरल उपायों से समाहित हो मनोनिग्रह हेतु यत्न करता हैं। प्रकृति के गुणों से उत्पन्न नाना प्रकार के शब्दादि विषयों का त्याग कर, वैराग्य युक्त ज्ञान तथा योग से, मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्ति से मनुष्य अपने अन्तरात्मा को इसी देह में प्राप्त कर लेता हैं।

भक्ति योग महिमा
देवहूति ने तदनंतर अपने पुत्र रूपी कपिल भगवान् से पूछा ! आप की समुचित भक्ति का स्वरूप का हैं ? निर्वाण पद को प्राप्त करने का सरल उपाय क्या हैं ? आपका कहा हुआ योग कैसा हैं और उसके कितने अंग हैं ? विशेषकर स्त्रियों को ये कैसे सुगमता से प्राप्त हो सकता हैं ?

भगवान कपिल ने अपनी माता से कहा ! जिस मनुष्य का चित एकमात्र भगवान में ही लग गया हैं ऐसे मनुष्य वेद विहित कर्मों में लगी हुई तथा विषयों का ज्ञान कराने वाली दोनों प्रकार की इन्द्रिय जो श्री हरि के प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति हैं, वही भगवान की अहैतुकी भक्ति हैं, यह मुक्ति से भी बढ़कर हैं। मेरे प्रसन्नता के लिए समस्त कार्य करने वाले बड़ भागी भक्त, जो एक दूसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे पराक्रमों की चर्चा करते हैं, मेरे साथ एकीभाव की भी इच्छा नहीं करते है, वे साधुजन अरुण-नयन एवं मनोहर मुखारविंद से युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपों की झांकी करते हैं। दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार, हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और इन्द्रियां फंस जाती हैं। ऐसे भक्तों के न चाहने पर भी उन्हें परम पद की प्राप्ति करा देती हैं।

अन्धकार रूपी अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर यद्यपि वे मेरे मायापति के नाना लोकों जैसे सत्यादि में भोग-संपत्ति, भक्ति की प्रवृत्ति के पश्चात स्वयं प्राप्त होने वाली नाना प्रकार की सिद्धियाँ या वैकुण्ठ लोक के ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करते हैं। परन्तु, उन आत्म-तत्व ज्ञान से युक्त मनुष्यों को, मेरे धाम की प्राप्ति पर सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती हैं। जिन मानवों का केवल मात्र मैं ही आश्रय हूँ, उनका प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, सुहृदय, इष्ट मैं ही हूँ, न उन्हें मेरा काल चक्र ग्रास करता हैं और न ही वे नाना भोगों से रहित रहते हैं। जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जाने वाले वासनामय लिंग देह हो तथा देह से सम्बंधित धन, पशु, गृह इत्यादि पदार्थ तथा नाना संग्रहों का त्याग कर भक्ति से मेरा भजन करते हैं, मैं उन्हें मृत्यु रूप संसार सागर या भाव सागर से पार कर देता हूँ, उन्हें मोक्ष पद की प्राप्ति होती हैं। मैं ही साक्षात् भगवान् हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ, समस्त प्राणियों में स्थित आत्मा मैं ही हूँ, मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने पर मृत्यु रूपी महा भय से छुटकारा नहीं प्राप्त हो सकता हैं। मेरे भय से ही वायु चलती हैं, सूर्य तपता हैं, इंद्र वर्षा करता हैं, अग्नि जलती हैं तथा मृत्यु अपने कार्य में प्रवृत्त होती हैं। योगी-जन ज्ञान तथा वैराग्य से युक्त हो भक्ति योग के द्वारा परम शक्ति को प्राप्त करने हेतु मेरा आश्रय लेते हैं। संसार में मनुष्यों हेतु सबसे बड़ा कल्याण प्राप्त का साधन एक मात्र ‘भक्ति-योग’ के द्वारा मुझ में स्थित होना हैं।

महदादि भिन्न-भिन्न तत्त्व का वर्णन।

कपिल भगवान ने तदनंतर अपनी माता को प्रकृति आदि नाना तत्त्वों के लक्षण का उपदेश दिया, उनके अनुसार इसके ज्ञान से ही मानव प्रकृति के गुण, जो मनुष्य योनि या नाना जीवों हेतु स्वाभाविक हैं, से मुक्त हो जाता हैं। आत्म-दर्शन रूप ज्ञान ही मानव की मुक्ति या मोक्ष का कारण हैं और वही उसे अहंकार रूप हृदय ग्रंथि का छेदन करने वाला हैं। सम्पूर्ण जगत जिससे व्याप्त हो प्रकाशित होता हैं, वह आत्मा ही पुरुष हैं, वह अनादि, निर्गुण, प्रकृति से परे, अन्तः कारण में स्फूर्ति प्रदान करने वाला और स्वयं ही प्रकाशमान हैं। उन सर्वव्यापक पुरुष ने अपने पास लीला-विलास पूर्वक आई हुई अव्यक्त और त्रिगुणात्मिका वैष्णवी माया को स्वेच्छा से स्वीकार किया हैं। वह लीला परायण प्रकृति अपने नाना गुणों द्वारा उन्हीं पुरुष के अनुरूप प्रजा को जन्म देने लगी; यह देख पुरुष ज्ञान को आच्छादित करने वाली उसकी आवरण शक्ति से मोहित हो गया तथा अपने स्वरूप को भूल गया। इस प्रकार अपने से भिन्न प्रकृति को अपना स्वरूप समझ लेने से पुरुष प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाने वाले कर्मों में अपने को ही कर्ता मान लेता हैं। इस कर्तव्य के अभिमान से ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनंद स्वरूप पुरुष को जन्म-मृत्यु रूपी बंधन एवं परतंत्रता की प्राप्ति होती हैं। कार्य-रूप शरीर, कारण-रूप इन्द्रिय तथा कर्ता रूप इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओं में पुरुष जो अपने-पन का आरोप कर लेता हैं, उसमें विद्वान प्रकृति को hi कारण मानते हैं तथा वास्तव में प्रकृति से परे होकर भी जो प्रकृतिस्थ हो रहा हैं, उस पुरुष को सुख-दुःख के भोगने का कारण मानते हैं।

देवहूति ने अपने पुत्र से कहा ! इस चराचर विश्व के स्थूल तथा सूक्ष्म कार्य जिनके रूप हैं और जो इसके कारण हैं, उन प्रकृति तथा पुरुष का लक्षण आप मुझ से कहिये।

भगवान कपिल ने अपने माता से कहा ! जो त्रिगुणात्मक, अव्यक्त, नित्य और कर कारण रूप हैं तथा स्वयं निर्विशेष होकर भी सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय हैं, उस प्रधान नामक तत्त्व को ही प्रकृति कहते हैं। पाँच महा-भूत, पाँच तन्मात्रा, चार अन्तः कारण और दस इन्द्रिय- इन चौबीस तत्वों ही प्रकृति का कार्य हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये पाँच भूत हैं जिनसे स्थूल तत्वों का निर्माण होता हैं; गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द, ये पाँच तन्मात्राएँ हैं। श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका, वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ, और पायु, ये दस इन्द्रियाँ हैं; मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चारों के रूप में एक अन्तः करण अपनी संकल्प, निश्चय, चिंता और अभिमान रूप से चार प्रकार की वृत्तियों से लक्षित होता हैं। इस प्रकार तत्व ज्ञानी पुरुषों ने सगुन ब्रह्म के सन्निवेश स्थान, इन चौबीस तत्त्वों की संख्या बताई गई हैं। काल पचीसवां तत्त्व हैं; कुछ ज्ञानी जन काल को पुरुष से भिन्न तत्त्व ना मान कर पुरुष का प्रभाव अर्थात ईश्वर की संहार-कारिणी शक्ति मानते हैं। जिससे माया के कार्य-रूप देह में आत्मत्व के अभिमान कर अहंकार से मोहित होते हैं तथा आपने आप को कर्ता समझने वाले जीव को सर्वदा ही भय लगा रहता हैं। जिनकी प्रेरणा से गुणों की साम्यावस्था रूप निर्विशेष प्रकृति में गति उत्पन्न होती हैं, वास्तव में वे पुरुष रूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं। अपनी माया के द्वारा सभी प्राणियों के भीतर जीव रूप से तथा बाहर काल रूप से व्याप्त हैं वही आत्म तत्व या आत्मा पचीसवा तत्त्व हैं।

क्रिया तथा शक्ति प्रधान “अहंकार” की उत्पत्ति।

जब परमपुरुष भगवान् ने नाना जीवों को अदृश्य देखा, तब उन्हें क्षोभ की प्राप्ति हुई, उन्होंने सम्पूर्ण जीवों के उत्पत्ति हेतु अपनी माया से चिच्छक्ति रूप वीर्य को स्थापित किया, जिसके परिणामस्वरूप उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। लय-विक्षेप आदि रहित तथा सृष्टि के अंकुर रूप इस महत्तत्त्व ने अपने आप में स्थित विश्व को प्रकट करने हेतु अपने आप को आच्छादित करने वाले प्रलय-कालीन अन्धकार को अपने ही तेज से पी लिया। जो सत्व-गुण मय, स्वच्छ, शांत, विकार-शून्य, भगवान के आश्रय स्वरूप “चित्त” हैं, वही महत्तत्त्व हैं, जो ‘वासुदेव’ नाम से विख्यात हैं। भगवान के वीर्य रूप चित-शक्ति से उत्पन्न हुए महत्तत्त्व के विकृत जो जाने पर, उससे क्रिया तथा शक्ति प्रधान “अहंकार” की उत्पत्ति हुई, यह वैकारिक, तैजस और तामस तीन प्रकार से विभक्त हैं। उसी से क्रमशः मन, इन्द्रियां तथा पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति हुई हैं, इस भूत, इन्द्रिय और मन रूप अहंकार को ही ज्ञानी पुरुष साक्षात् ‘संकर्षण’ नाम से विख्यात “अनंत-देव” कहते हैं। इस अहंकार का देवता रूप से कर्तव्य, इन्द्रिय रूप से करणत्व और पञ्च महाभूत रूप से कार्यत्व लक्षण हैं तथा सत्व आदि गुणों के सम्बन्ध से शांतत्व, घोरत्व और मूढ़त्व इसके लक्षण हैं। उपर्युक्त तीनों प्रकार के अहंकार में से वैकारिक अहंकार के विकृत होने पर “मन” उत्पन्न हुआ, जिससे नाना कामनाओं की उत्पत्ति होती हैं। यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियों के अधिष्ठाता “अनिरुद्ध” नाम से विख्यात हैं। तैजास अहंकार में विकार होने पर, बुद्धि तत्त्व की उत्पत्ति हुई, नाना तत्वों के स्फुरण रूप विज्ञान और इन्द्रियों के व्यापार में सहायक होना तथा पदार्थों का विशेष ज्ञान, ये बुद्धि के कार्य हैं, यह बुद्धि तत्त्व ही “प्रधुम्न” हैं। तैजस अहंकार का कार्य इन्द्रियां भी हैं, ज्ञान तथा कर्म विभाग से ‘कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय’ दो भेद हैं, प्राण की शक्ति कर्म हैं और ज्ञान बुद्धि की।

शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रुपतन्मात्र, रसतन्मात्र, गंधतन्मात्र की उत्पत्ति।

भगवान के चेतन शक्ति की प्रेरणा से तामस अहंकार के विकृत होने पर, ‘शब्दतन्मात्र’ का जन्म होता हैं। आकाश तथा शब्द का ज्ञान कराने वाली ‘शब्दतन्मात्र’ से श्रोत्रेन्द्रीय उत्पन्न हुई हैं। अर्थ को प्रकट करना, ओट में खड़े हुए वक्ता का भी ज्ञान करा देना और आकाश का सूक्ष्म रूप होना; यही ‘शब्द’ के लक्षण हैं।
भूतों को विश्राम देना, सभी के बाहर-भीतर उपस्थित रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मन का आश्रय; यही ‘आकाश’ के कार्य हैं। ‘शब्दतन्मात्र’ के वृति ‘आकाश’ में काल गति से विकार होने पर ‘स्पर्शतन्मात्र’ का प्रादुर्भाव होता हैं, इसी से वायु तथा स्पर्श ग्रहण करने वाली ‘त्वगिन्द्रीय’ (त्वचा) उत्पन्न हुई। कठोरता, कोमलता, शीतलता, उष्णता तथा वायु का सूक्ष्म रूप होना, ये स्पर्श के लक्षण हैं।
भगवान् की प्रेरणा से ‘स्पर्शतन्मात्र’ रूपी वायु के विकृत होने पर, परिणामस्वरूप ‘रुपतन्मात्र’ हुआ उससे रूप को उपलब्ध कराने वाली ‘नेत्रेन्द्रिय’ का प्रादुर्भाव हुआ; वस्तु के आकर का बोध करना, द्रव्य के अंग रूप से प्रतीत होना ‘रुपतन्मात्र’ के कार्य हैं।
तदनंतर, भगवान की प्रेरणा से ‘रुपतन्मात्र’ तेज के विकृत होने पर परिणामस्वरूप ‘रसतन्मात्र’ उत्पन्न हुआ तथा जिससे जल तथा रस को ग्रहण करने वाली ‘रसनेन्द्रिय’ (जिह्वा) का प्रादुर्भाव हुआ, यह अपने शुद्ध रूप से एक ही हैं। अन्य भौतिक पदार्थों के संयोग से वह कसैला, मीठा, तीखा, कड़वा, खट्टा, नमकीन आदि अनेक प्रकार का हो जाता हैं।
तदनंतर, भगवान् की प्रेरणा से रस स्वरुप ‘जल’ के विकृत होने पर, ‘गंधतन्मात्र’ का प्रादुर्भाव हुआ, इससे पृथ्वी तथा गंध को ग्रहण करने वाली ‘घ्रणेन्द्रीय’ प्रकट हुई। गंध एक हैं; तथापि परस्पर मिश्रित द्रव्य भागों की न्यूनाधिकता से वह मिश्रित गंध, दुर्गन्ध, सुगंध, मृदु, तीव्र और अम्ल आदि अनेक प्रकार का हो जाता हैं।

विराट पुरुष (मानव देह) की उत्पत्ति।

आकाश का विशेष गुण ‘शब्द’, जिसका विषय “श्रोत्रेन्द्रीय” हैं; वायु का विशेष गुण ‘स्पर्श’, जिसका विषय “त्वगिन्द्रीय” हैं; तेज का विशेष गुण ‘रूप’, जिसका विषय “नेत्रेन्द्रिय” हैं; जल का विशेष गुण ‘रस’, जिसका विशेष गुण “रसनेन्द्रिय” हैं तथा पृथ्वी का विशेष गुण ‘गंध’, जिसका विषय “घ्रणेन्द्रीय” हैं। वायु आदि कार्य-तत्त्वों में आकाशदि कारण-तत्त्वों के स्थित होने कर परिणामस्वरूप अनेक गुण से अनुगत होते हैं; महाभूतों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध केवल पृथ्वी में ही अवस्थित हैं। जब महत्तत्त्व, अहंकार, और पञ्च-भूत तत्त्व परस्पर मिल न सकें, ये पृथक-पृथक ही रहे, तब जगत के आदि कारण श्री नारायण ने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणों के सहित उनमें प्रवेश किया। भगवान के प्रवेश के कारण क्षुब्ध और आपस में मिले हुए उन तत्त्वों से एक जड़ अंड की उत्पत्ति हुई तथा उस अंड से तदनंतर विराट पुरुष की अभिव्यक्ति हुई। यह अंड चरों ओर से क्रमशः एक दूसरे से जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार और महत्तत्त्व; इन ६ आवरणों से घिरा हुआ हैं तथा बहार का आवरण सातवाँ ‘प्रकृति’ हैं। कारणमय जल में स्थित होने पर, उस तेजोमय अंड से उठकर उस विराट पुरुष ने पुनः उसमें प्रवेश किया तथा कई छिद्र किये। सर्व प्रथम अंड के छिद्रों से मुख प्रकट हुआ, जिससे वाक्-इन्द्रिय और उसके अनन्तर ‘वाक्’ का अधिष्ठाता ‘अग्नि’ उत्पन्न हुआ। तदनंतर, नाक के छिद्र नथुने प्रकट हुए, उनसे प्राण सहित ‘घ्रणेन्द्रीय’ उत्पन्न हुई, जिसका अधिष्ठाता ‘वायु’ उत्पन्न हुए। इसके पश्चात नेत्र प्रकट हुए, जिससे ‘चक्षु-इन्द्रिय’ का प्रादुर्भाव हुआ और इसके अधिष्ठाता सूर्य उत्पन्न हुए। इसके पश्चात ‘कान’ प्रकट हुआ, जिसके इन्द्रिय ‘श्रोत्र’ और अधिष्ठाता दिग्देवता प्रकट हुए। इसके पश्चात उस विराट पुरुष से रोम, मूंछ-दाढी तथा सर के बाल उत्पन्न हुए, इसके पश्चात त्वाचाकी अभिमानी ओषधियां उत्पन्न हुई। तदनंतर लिंग प्रकट हुआ, उससे वीर्य तथा वीर्य के पश्चात लिंग का अभिमानी आपोदेव (जल) उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात गुदा प्रकट हुई जिससे अपान वायु और अपान के पश्चात उसका अभिमानी मृत्यु-देवता उत्पन्न हुए। तदनंतर हाथ प्रकट हुआ, जिससे बल और इसके पश्चात हस्तेन्द्रिय का अभिमानी इंद्र उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात चरण प्रकट हुए, उनसे गति (गमन की क्रिया) और पादेन्द्रिय अभिमानी विष्णु देवता उत्पन्न हुए। तदनंतर, विराट पुरुष के नाड़ियाँ प्रकट हुए तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ, जिससे नदियाँ हुई, इसके पश्चात उदार प्रकट हुआ, जिसका अभिमानी देवता समुद्र हुए। तदनंतर, हृदय प्रकट हुआ तथा इससे मन का प्राकट्य हुआ, जिसके अभिमानी देवता चंद्रमा हुए। हृदय से ही बुद्धि और उसके बाद, बुद्धि के अभिमानी ब्रह्मा उत्पन्न हुए। तत्पश्चात अहंकार और उसके पश्चात अहंकार का अभिमानी देवता रुद्र प्रकट हुए। तदनंतर चित उत्पन्न हुआ जिसका अभिमानी देवता क्षेत्रज्ञ हुए।
समस्त देवता उत्पन्न होते हुए भी उस विराट पुरुष को जाग्रत करने में असमर्थ रहे, से जाग्रत करने हेतु सभी अपने-अपने उत्पत्ति स्थानों में प्रविष्ट होने लगे। अग्नि ने विणा के संग मुख में प्रवेश किया, परन्तु इस से विराट पुरुष नहीं उठे, वायु ने घ्रणेन्द्रिय सहित नासिका के छिद्र में प्रवेश किया, परन्तु इस का कोई लाभ नहीं हुआ। सूर्य ने चक्षु सहित नेत्रों में प्रवेश किया, दिशाओं ने श्रवणन्द्रिय सहित कानों में प्रवेश किया, ओषधियों ने रोम सहित त्वचा में प्रवेश किया, जल ने वीर्य सहित लिंग में प्रवेश किया, मृत्यु ने गुदा में प्रवेश किया, विष्णु ने गति सहित चरणों सहित प्रवेश किया, नदियों ने रुधिर सहित नाड़ियों में प्रवेश किया, समुद्र ने क्षुधा-पिपासा सहित उदार में प्रवेश किया, मन सहित चंद्रमा ने हृदय में प्रवेश किया, बुद्धि सहित ब्रह्मा ने हृदय में प्रवेश किया, रुद्र सहित अहंकार ने उसी हृदय में प्रवेश किया, परन्तु वह पुरुष जाग्रत अवस्था में नहीं आ पाया। परन्तु जब चित्त के अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञ ने चित्त सहित हृदय में प्रवेश किया तो वह पुरुष जल में उठ कर खड़ा हो गया।



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धन्वन्तरि अवतार

धन्वन्तरि अवतार, देव वैध

वामन अवतार

वामन अवतार, स्वर्ग का सिंहासन पुनः इंद्र को प्रदान करवाने वाले

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राम अवतार, राक्षसों से रक्षा हेतु

धन, सुख, वैभव की अधिष्ठात्री देवी, विष्णु जी की अर्धांगिनी 'माता लक्ष्मी'

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देवताओं को केवल अमृत पान करा उनका कार्य सिद्ध करने वाले, मोहिनी।

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धूमावती

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