सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा

समस्त जीवों के पितामह, अपने ज्ञान से ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थूल तथा परा जीव तथा वस्तुओं का निर्माण करने वाले 'पितामह ब्रह्मा जी'। संसार या ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता, तमो गुण सम्पन्न, सृजन कर्ता।

पालन-कर्ता विष्णु

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालन-हार, पालन-पोषण के कर्त्तव्य या दाइत्व का निर्वाह करने वाले, सत्व गुण सम्पन्न 'श्री हरि विष्णु'। सृजन के पश्चात् तीनों लोकों के प्रत्येक तत्व तथा जीव का पालन-पोषण करने वाले।

संहार-कर्ता शिव

तीनों लोकों में विघटन या विध्वंस के प्राकृतिक लय के अधिष्ठाता, तमो गुण सम्पन्न 'शिव'। वह शक्ति जो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीवित तथा निर्जीव तत्व के विघटन के कार्यभार का निर्वाह करती हैं।

एकार्णव प्रलय काल के रक्षक “मत्स्य अवतार” तथा सृष्टि विस्तार वर्णन

चाक्षुस मन्वंतर में उपस्थित प्रलय समय सबकी रक्षा हेतु मनु को समस्त देवों के निकाय से निर्मित नौका प्रदान कर, प्रलय पश्चात् तीनों लोकों के जल मग्न हो जाने पर, मत्स्य अवतार धारण कर मनु की नौका को अपने से संयुक्त रख समस्त जीवों की रक्षा करना। ब्रह्मा जी द्वारा वैवस्वत मन्वंतर की सृष्टि रचना।

सूर्य पुत्र राजा मनु की तपस्या, उनके हाथ में एक छोटा सा मत्स्य आना तथा उस मीन का विशाल आकर प्राप्त करना।

प्राचीन काल में मनु नाम के एक तपस्वी राजा थे, अपने पुत्र पर समस्त राज्य का भर देकर वे योग अभ्यासी हो गए थे। मलय देश के एक भाग में सुख तथा दुःख में समभाव रहकर, वे उत्तम योग को प्राप्त कर चुके थे। मनु की तपस्या से संतुष्ट हो, कमलासन ब्रह्मा जी उन्हें वरदान देने हेतु साक्षात् समुपस्थित हुए तथा इच्छित वरदान मांगने के लिए कहा। मनु ने ब्रह्मा जी से कहा ! जिस समय इस सम्पूर्ण भूतों के समुदाय का तथा समस्त स्थावर और चार सृष्टि का प्रलय काल उपस्थित हो, उस घोर भयंकर समय पर, “मैं सबकी रक्षा करने के कर्ण से असमर्थ हो जाऊँ।” ब्रह्मा जी एवमस्तु कह कर वही पर अंतर्ध्यान हो गए। एक समय माँ मनु आश्रम में अपने पितृ गण के निमित्त तर्पण कर रहे थे तथा उनके हाथ में एक छोटी सी मछली, जल के साथ ही आ गई। उन्होंने उस मछली को देख कर उसकी रक्षा करने के लिए एक करकोदर में रख दिया, परन्तु एक ही रात्रि में वह १६ अंगुल तक बढ़ गया। इस प्रकार मत्स्य रूप में परिवर्तित होकर मनु से “मेरी रक्षा करो” कहा। राजा ने उस जलचरी को लेकर एक मानिक में डाल दिया तथा वहां पर भी वह एक रात्रि में विस्तृत हो तीन हाथ बड़ा हो गया। उस मत्स्य ने तदनंतर, सूर्य पुत्र मनु से बड़े ही विनम्र स्वर से कहा ! “मेरी रक्षा करो, मैं इस समय आप के शरण में आया हूँ”। मनु ने उस मत्स्य को कुएं में डाल दिया, पहले की तरह ही एक ही रात में मत्स्य और अधिक विस्तृत आकार वाला हो गया। इसके अनंतर मनु ने उस मत्स्य को गंगा नदी मैं प्रक्षिप्त कर दिया, परन्तु वहाँ भी उसका आकार और अधिक विस्तृत हो गया। तदनंतर, राजा मनु ने उस मत्स्य को समुद्र में प्रक्षिप्त कर दिया, वहां भी वो सम्पूर्ण समुद्र में व्याप्त होकर समुपस्थित हो गया। इस पर राजा मनु उस मत्स्य से अत्यंत भयभीत हो गए, उन्होंने मत्स्य से उसका परिचय ज्ञात करना चाहा, इस पर उन्हें संदेह हुआ की ये साक्षात् भगवान वासुदेव ही हैं।

राजा मनु द्वारा मत्स्य को श्री हरि जनार्दन के रूप में पहचान लेना तथा श्री हरि द्वारा उन्हें देवों के निकाय से निर्मित नौका प्रदान करना।

मनु ने कुछ विचार किया, जिस पर वे पूर्ण रूप से निश्चित हो गए की ये साक्षात् केशव ही हैं, उन्होंने कहा हे केशव ! मैं आप को अच्छी तरह से पहचान गया हूँ, आप ही इस विशाल मत्स्य के रूप में उपस्थित होकर मेरे सनमुख प्रकट हुए हैं। आप को मेरा प्रणाम हैं। इस प्रकार जब राजा मनु ने श्री हरि विष्णु से निवेदन किया, उस समय मत्स्य स्वरूपी श्री हरि जनार्दन ने कहा ! बहुत अच्छा ! तुमने मुझे अच्छी तरह से पहचान लिया हैं। कुछ ही समय पश्चात पृथ्वी जाल मग्न हो जाएगी, जिससे परिणामस्वरूप समस्त पर्वत, वन, समस्त कानन इस मेदिनी के साथ जल में डूब जायेंगे। समस्त देवों के निकाय से निर्मित हुई एक बड़ी नाव या नौका, श्री जनार्दन ने राजा मनु को प्रदान किया तथा कहा ! यह नौका समस्त जीवों की रक्षा हेतु निर्मित की गई हैं। हे सुव्रत ! जो भी स्वदेज-अंडज-जरायुज और उदि्भज जीव हैं उस सब अनाथों को इस नौका में स्थान देकर आप उन सभी की रक्षा कीजिएगा। जिस समय यह नौका युगान्त की वायु से अभिहित हो यह नौका डोलने लगेगी, इस नौका को मुझ मीन या मत्स्य से संग से संयमित कर देना। इसके पश्चात नूतन सृष्टि के समय आप ही सम्पूर्ण जगत के प्रजापति होंगे। इस प्रकार से सत्ययुग के आदि काल में सर्वज्ञ और घृतिमान् नृप तथा देवों के द्वारा पूज्य मन्वंतर का भी अधिपति होगा।

मत्स्य अवतार रूपी श्री हरि का मनु को प्रलय काल की स्थिति परिचित करवाना तथा मनु द्वारा प्रलय से बचे हुए जीवों को नौका में स्थान देना।

मत्स्य अवतार ने मनु से कहा ! आज से ही धरातल पर वर्षा का अभाव हो जायेगा, सौ वर्षों के भीतर यहाँ घोर अकाल पड़ेगा, दुर्भिक्ष आ जायेगा। इसके उपरांत, पूर्ण तप्त अंगार के वर्ण के समान वर्ण वाले सप्त सूर्य सात दारुण रश्मियाँ में परिवर्तित हो जाएगी तथा जीवों के संहार का कार्य करेगी, बड़वानल अत्यंत भयंकर रूप धारण कर लेगा। पाताल लोक से भगवान संकर्षण के मुख से निकलने वाली विषाग्नि तथा भगवान रुद्र के ललाट के तीसरे नेत्र से निकलने वाली अग्नि घोर रूप धारण करेगी, फलस्वरूप तीनों लोक परम क्षोभ को प्राप्त हो जाएगी। देवता, ग्रह-नक्षत्र इत्यादि समस्त इस क्षोभ के ग्रस्त हो सशय को प्राप्त होगा। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी भस्म के सदृश हो जाएगी, उस समय यहाँ समस्त आकाश मंडल ऊष्मा से तृप्त हो जायेगा। सम्वर्त्त-भिमानंद-द्रोण-चंड-वलाहक-विध्युत्पताक और शोण ये सात संसार के लय करने वाले मेघ हैं, अग्नि के तेज से संभूत इस मेदिनी को आप्लावित कर देंगे। तब सातों समुद्र एक रूप धारण करेंगे, तदनंतर तीनों लोक जलमग्न हो जायेगा। यहाँ समुद्र के अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होगा, उस समय तुम इस वेद रूपी नौका में सभी को ले कर मुझ से संयमित कर, मेरी सिंह से इस नव को बाँध देना, मेरे प्रभाव से यहाँ नौका सुरक्षित रहेगी। इस आंतर-प्रलय में सोम, सूर्य, मैं, चारों लोकों सह ब्रह्मा जी, नर्मदा नदी, मार्कंडेय ऋषि, महेश जी, चारों वेद, विद्याओं द्वारा घिरे हुए पुराण और तुम्हारे साथ विश्व केवल हे ही बच पायेंगे। चाक्षुष मन्वंतर के प्रलय काल में, इस प्रकार जब सारी पृथ्वी एकार्णव हो जाएगी तथा तुम्हारे द्वारा सृष्टि का प्रारंभ होगा, तदनंतर, मैं वेदों को प्रवृत्त करूँगा, ऐसा कह कर भगवान् श्री हरि विष्णु वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
इस प्रकार समुत्पन्न योग सम स्थित होने पर, भगवान वासुदेव ने एक सींग वाले मत्स्य रूप में अवतार धारण किया तथा एक सर्प मनु के पास बह कर आ गया। प्रलय पश्चात तीनों लोकों के जल मग्न हो जाने पर, राजा मनु ने समस्त जीवित-अजीवित स्थावर तथा जंगम तत्वों, जीवों को नौका में स्थान दिया। मत्स्य अवतार धारी श्री हरि जनार्दन से उस नौका को एक भुजंग (सर्प) के द्वारा, मत्स्य भगवान के सींग में समागत किया गया। इस प्रकार धर्म के ज्ञाता मनु ने समस्त भूतों को समाकर्षित करके योग के द्वारा समा-रोपित किया।

एकार्णव के समय मनु का श्री मत्स्य अवतार से पृथ्वी के उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रश्न करना तथा श्री वासुदेव का उत्तर।

उस समय जब सम्पूर्ण जगत एक अर्णव स्वरूप में था, भानु ने भगवन केशव से पूछा था कि ! इस विश्व की उत्पत्ति तथा प्रलय, राजाओं आदि के वंश, मन्वंतर, वंश, भुवन का विस्तार, दान, धारण का विधान, शाश्वत श्राद्ध कल्प, चारों वर्ण तथा आश्रम के विभाग, इष्ट संज्ञा वाला कर्म, देवों की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में बताएं।
इस पर मत्स्य भगवान ने कहाँ ! यह तमोमय महाप्रलय का अंत होने पर, यह स्थावर और चर जगत अविज्ञेय और अविज्ञात सा रहता हैं, अंधकार युक्त था, न ही किसी विषय की कोई कल्पना की जा सकती थीं और न ही कोई वास्तु जानी जा सकती थीं, न किसी वास्तु का कोई चिन्ह शेष रह गया था। इसके पश्चात पुण्य कर्मों के प्रभाव से निराकार स्वयंभु भगवान, इस समस्त जगत को पुनः प्रकट करने में, अभिप्राय से अंधकार का भेदन कर, प्रादुर्भूत हुए। उस समय इन्द्रियों की पहुँच से परे, अतीत, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म अव्यक्त से परे, सनातन, अविनाशी स्वयं ही उद्भूत हुए, जिन्हें ‘नारायण’ के नाम से जाना जाता हैं। वे स्वयं ही आविर्भूत हुए, जो अपने देह से अभिन्न इस विविध भांति के जगत की रचना करने की इच्छा वाले थे। उन्होंने सर्वप्रथम जाल ही रचना की तथा उसमें बीज का निक्षेप किया, वही बीज एक हजार वर्ष के पश्चात स्वर्ण तथा रजतमय अंडे के रूप में परिवर्तित हुआ। तत्पश्चात, वे स्वयंभू स्वयं ही, महान तेज से युक्त आत्म संभव हो अंडे में प्रविष्ट होकर अपने प्रभाव से विष्णु तत्व को प्राप्त करते हैं। तदनंतर, उस अंडे के भीतर सर्वप्रथम भगवान सर्वप्रथम सूर्य उत्पन्न हुए, जी आदि से प्रकट होने के परिणामस्वरूप “आदित्य” तथा वेदों का पाठ करने के कारण ब्रह्मा नाम से जाने गए। उन्होंने, उस अंडे के दो खण्डों में विभक्त कर स्वर्ग और भूमि या भूतल को प्रकट किया, उन दोनों के मध्य में सभी दिशाओं तथा शाश्वत व्योम की रचना की। उस अंडे के जरायु भाग से मेरु पर्वत आदि सातों पर्वत प्रकट हुए, उल्व से विद्युत सहित मेघ मंडल निर्मित हुआ। उसी अंडे से पितृ गण, नदियाँ तथा मनु समुदाय उत्पन्न हुआ, लवण सागर ‘इक्षु समुद्र और सुरा सागर अंडे में उपस्थित जल से प्रकट हुए, जो अनेक रत्नों से समन्वित थे। सृजन करने की इच्छा वाले वे देव प्रजापति हो गए थे, उनके तेज से वहां पर यह मार्तण्ड उत्पन्न हुआ। अंड के मृत होने पर, जो इसे समुत्पन्न करता हैं उसे मार्तण्ड कहा गया हैं, उस महान आत्मा वाले का या रजोगुण स्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत का सृजन करने वाले लोक पितामह चतुर्मुख ब्रह्मा के नाम से विख्यात हुआ, सम्पूर्ण जगत सहित देव-असुर, मानव इत्यादि सभी की उन्होंने ही रचना की।

मत्स्य अवतार
मत्स्य अवतार
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मनु की नौका का भगवान् मत्स्य के संग संयमित होकर, जल प्रलय के दुस्प्रभाव से मुक्त रहना
<b>मनु</b> की नौका का भगवान् मत्स्य के संग


आद्या शक्ति काली


रघुनन्दन श्री राम

राक्षसों के मुक्ति दिलाने वाले तथा मर्यादा पुरुषोत्तम के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करने वाले रघुनंदन श्री राम।

धन्वन्तरी

देवताओं के वैध जो समुद्र मंथन के समय अमृत कलश ले कर प्रकट हुए थे।

भक्त की रक्षा करने वले, नृसिंह

अपने परम भक्त प्रह्लाद को उनके दैत्य राज पिता की यातनाओं से मुक्त करने वाले, भगवान नरसिंह या नृसिंह।

मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने वाले कुर्म अवतार

मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करने वाले 'कुर्म अवतार'।

मोहिनी अवतार

दैत्यों से अमृत कलश ले कर, केवल देवताओं को छक कर अमृत पान करने वाले श्री हरि विष्णु का मोहिनी अवतार।

माता तारा

मोक्ष तथा सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करने वाली, 'माता तारा'



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