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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    दस महाविद्या स्वरूप में १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर-भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुणी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरूप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारण 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

कठोर तप कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने वाली 'हिमालय पुत्री पार्वती'।

शिव संग माता पार्वती

सती या पार्वती

हिमालय-राज के गृह में भगवती परा शक्ति का पुत्री रूप में जन्म तथा उनके दर्शनों एवं भविष्य कथन हेतु नारद जी का अवतरण।

पर्वतराज हिमालय के गृह में देवी आदि शक्ति प्रकृति ने पुनः जन्म धारण किया, छठे दिन षष्ठी पूजन कर, दसवें दिन उनका नाम ‘पार्वती’ रखा गया। इस प्रकार त्रि-जगन्माता, परा प्रकृति ने हिमालय-राज की पत्नी मेनका के गर्भ से जन्म धारण कर, उनके गृह में रहने लगी। बाल्य लीलाएं करते हुए, पार्वती, हिमालय-राज के गृह में बड़ी होने लगी, उनका मुखमंडल बड़ा ही मनोरम था, जिसे देखकर हिमालय-राज तथा मेनका मुग्ध होते थे।

नारद जी द्वारा हिमालय-राज को पार्वती का भविष्य कथन।

देवर्षि नारद को जब ज्ञात हुआ कि! देवी आदि शक्ति प्रकृति ने हिमालय के गृह में जन्म धारण किया हैं, वे उनके दर्शनों हेतु हिमवान के गृह में गए। हिमालय-राज ने उनका नाना प्रकार से आदर सत्कार किया, तत्पश्चात सुखपूर्वक बैठाकर उन्होंने पार्वती के भविष्य के बारे में पूछा। नारद जी ने उन्हें कहा! “आपके पुत्री के हाथ में उत्तम लक्षण विद्यमान हैं, केवल एक रेखा ही विलक्षण हैं। उसका फल यह रहेगा! इसे ऐसा पति प्राप्त होगा जो महान योगी, नंग-धडंग रहने वाला तथा निष्काम होगा। न ही उसके माँ-बाप का कोई अता-पता होगा और न ही उसे मान-सम्मान का कोई ख्याल रहेगा एवं वह सर्वदा ही अमंगल वेश धारण करेगा।” देवर्षि नारद के इस प्रकार वचनों को सुनकर मेनका-हिमालय दोनों बहुत दुखित हुए, परन्तु पार्वती यह सुनकर मन ही मन बहुत हर्ष से खिल उठीं।


हिमवान ने नारद जी से कहा! “आपके भविष्य वाणी से मुझे बहुत दुःख हुआ हैं, ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे मैं अपनी पुत्री को इस विषाद योग से बचा सकूँ।” नारद जी ने कहा! “मैंने जैसे वर के बारे में बताया हैं, वैसे केवल भगवान शिव ही हैं, वे सर्व-समर्थ होते हुए भी लीला हेतु अनेक रूप धारण करते हैं। तुम अपनी कन्या का दान भगवान शिव को कर देना; वे सबके ईश्वर, सेव्य, निर्विकार, सामर्थ्य-शाली और अविनाशी हैं। पार्वती, भगवान शिव की शिवा होगी एवं सर्वदा उनके अनुकूल होगी, वे दोनों ‘शिव-पार्वती’ अर्धनारीश्वर रूप में विख्यात होंगे। आपकी यह पुत्री तपस्या के प्रभाव से सर्वेश्वर शिव को संतुष्ट कर उनके शरीर के आधे भाग को अपने अधिकार में कर लेंगी। भगवान शिव इनके अलावा किसी और से विवाह नहीं करेंगे, इन्हें देवताओं के कार्य पूर्ण करने हैं।" तुम अपनी कन्या का दान भगवान शिव के अतिरिक्त किसी और से करने की सोचना भी नहीं तथा यह सभी तथ्य गुप्त हैं इन्हें कभी प्रकाशित नहीं करना।

कामरूप (कामाख्या क्षेत्र) से भगवान शिव का तपस्या हेतु गंगावतरण शिखर पर जाना, हिमालय-राज का भगवान शिव से मिलने जाना तथा पार्वती का भगवान शिव के पास जाकर उन्हें आसक्त करने की अनुमति मांगना।

हिमालय-राज की भगवान शिव के उग्र तप हेतु चिंता।

इस पर हिमालय-राज ने नारद जी से कहा! भगवान शिव को महायोगी हैं तथा संसार से पूर्ण रूप से विरक्त हो चुके हैं। वे जैसा तप कर रहें हैं वह देवता भी नहीं कर सकते हैं तथा वे संसार के प्रति निरासक्त हो चुके हैं, उनके एकाग्र मन को कोई भी विचलित नहीं कर सकता हैं। इस अवस्था में वे कैसे मेरी पुत्री को अपनी पत्नी बनायेंगे? मैंने किन्नरों की मुख से निरंतर ऐसा सुना हैं कि! भगवान शिव ने पहले यह प्रतिज्ञा की थीं कि वह सती के अतिरिक्त किसी और से विवाह नहीं करेंगे।” इसपर नारद जी के कहा! “पूर्व काल में आपकी यह कन्या ही ‘सती’ थीं, पितृ-गृह में अनादर पाने के कारण इन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया था। असुर-पति तारकासुर ने देवताओं को जीतकर, अपने बल तथा अहंकार से समस्त देवताओं को अपने आधीन कर लिया हैं। वह तीनों लोकों का स्वामी हैं, ब्रह्मा जी के वर अनुसार उनकी मृत्यु तो निश्चित हैं, परन्तु, भगवान शिव के पुत्र के हाथों से उसकी मृत्यु होगी। समस्त देवता भगवान शिव से निवेदन करेंगे ही, परन्तु वास्तव में आपकी यह पुत्री ही उन्हें मुग्ध कर लेंगी। आपके यहाँ जन्म लेनी वाली यह महामाया सम्पूर्ण जगत को मुग्ध करने वाली हैं, लक्ष्मी रूप में साक्षात भगवान विष्णु को मुग्ध करती हैं। भगवान शिव भी शीघ्र ही अपनी वर्तमान योग-समाधि का त्याग कर देंगे।” इस प्रकार हिमालय-राज को सांत्वना देकर तथा पार्वती के दर्शन कर नारद मुनि चले गए।

मेनका द्वारा पार्वती को किसी और पात्र के हाथों में कन्यादान करने हेतु हिमालय-राज से निवेदन।

नारद जी के गमन पश्चात, मेनका ने हिमालय से कहा! “नारद जी ने जो कुछ कहा हैं, मैं उसे अच्छी तरह नहीं समझ पाई हूँ, आप कन्या का विवाह किसी सुन्दर वर के साथ कर दीजिये, 'गिरिजा' (पार्वती) का वर कुलीन और संपन्न होना चाहिये। मेरी पुत्री मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं, आप कुछ ऐसा कीजिये जिससे वह सुखी और प्रसन्न रहें। इस कारण मेनका नाना प्रकार से विलाप करने लगी।” हिमालय-राज ने अपनी पत्नी को समझाया! मुनियों की बात कभी झूठी नहीं हो सकती हैं, तुम पुत्री को यह शिक्षा दो की वह भक्तिपूर्वक सुस्थिर चित से भगवान शिव हेतु तपस्या करें। शिव के समीप समस्त अमंगल भी मंगल हो जाते हैं, फिर उनका भेष अमंगलकारी ही क्यों न हो।

'गंगावतरण शिखर' पर जाकर भगवान शिव की तपस्या करना तथा हिमालय-राज से वहां किसी को भी न आने की व्यवस्था करने का निवेदन।

पार्वती की आठ वर्ष की आयु होने पर भगवान शिव को सती के पुनः जन्म धारण करने समाचार प्राप्त हुआ। उन्होंने मन ही मन बड़े आनंद का अनुभव किया, उन्होंने लौकिक गति का आश्रय लेकर अपने मन को एकाग्र किया और तप करने का विचार किया। अपने समस्त अनुचरों के साथ भगवान शिव ने भी कामरूप कामाख्या क्षेत्र त्याग कर, हिमालय में कठोर तपस्या हेतु प्रस्थान किया। जिस स्थान पर पहले कभी गंगा नदी, ब्रह्मलोक से स्वयं अवतरित हुई थीं, ‘गंगावतरण शिखर’ वहां भगवान शिव ध्यानमग्न होकर विराजमान हो गए। हिमालय पर रहने वाले गन्धर्वों तथा किन्नरों ने वहां भगवान शिव को एक कूट पर ध्यान-मग्न देखकर, हिमालय-राज से कहा! भगवान शिव कुछ ही दूर एक कूट पर अपने समस्त प्रमथ गणो के साथ हैं। उनके गणो में कुछ समाधि लगाये हुए थे तो कुछ थोड़े दूर बैठे हुए थे, कुछ नाच-गा रहे थे तो कोई हंस रहें थे। उनमें से कई नग्न दिगंबर थे तो कुछ पशु चर्म धारण किये हुए थे, कुछ भस्म लगाये हुए थे, किन्हीं के मस्तक पर जटाएं थीं, इस प्रकार उस भूत-नाथ की विभूति अनुपम थीं।"

इस प्रकार हिमालय-राज को जब ज्ञात हुआ की भगवान शिव उनके क्षेत्र में ध्यान मग्न हो तपस्या कर रहें हैं, वे उनसे मिलने हेतु गए तथा उनकी पूजा अर्चना की। भगवान शिव ने हिमालय-राज से कहा! “इस निर्जन स्थान पर मैं तपस्या हेतु आया हूँ, आप केवल इतनी व्यवस्था कर दे की कोई मेरे पास न आ पावें, जिससे मेरी तपस्या में किसी प्रकार का विघ्न न पड़ें। आपने नाना योगियों, मुनियों, किन्नरों को आश्रय स्थल प्रदान कर रखा हैं।” हिमालय-राज ने भगवान शिव को आश्वासन दिया की कोई भी निरर्थक मनुष्य आपके पास नहीं आ पायेगा, वे निश्चिंत होकर उस स्थान पर तपस्या करें; तदनंतर हिमवान वहां से वापस चले आयें। उन्होंने अपने अनुचरों को बुलवा कर कठोर चेतावनी दी की, कोई भी ‘गंगावतरण’ शिखर पर उनके आदेश के बिना न जायें। उस चेतावनी के भय से कोई देव, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, राक्षस तथा मनुष्य यहाँ तक की पशु भी भयभीत हो उस शिखर पर नहीं जाते थे।

माता-पिता द्वारा पार्वती को शिव-तपस्या की अनुमति।

यहाँ हिमालय-राज के घर, पार्वती दिन प्रतिदिन बढ़ती चली गयी तथा किशोर अवस्था को प्राप्त हुई। एक दिन पार्वती अपने माता-पिता से बोलने लगी कि! “मैं तप साधना हेतु भगवान शिव के पास जाऊंगी तथा उन्हें प्रसन्न कर पति रूप में प्राप्त करूँगी।” हिमालय-राज ने अपनी पुत्री को भगवान शिव के पास जाने की अनुमति नहीं दी, उन्हें अनुभव हो रहा था की पार्वती जो बहुत ही कोमल शरीर वाली हैं, वह किस प्रकार वन में जाएंगी तथा कठोर तप करेंगी। पार्वती ने अपने माता-पिता को समझाया की वह किसी प्रकार की चिंता न करें, उन्हें कोई दुःखी नहीं कर सकता हैं, वे शीघ्र ही भगवान शिव को आसक्त कर पुनः घर लौट आयेंगी। अंततः पार्वती के माता-पिता ने उन्हें भगवान शिव के पास जाने की अनुमति दे दी, परन्तु उनके साथ उनकी सहायता हेतु दो सखियाँ भी रहेंगी।

हिमालय-राज का गिरिजा को भगवान शिव की सेवा में प्रदान करना, योग ध्यान-मग्न भगवान शिव के पार्वती द्वारा नाना प्रकार से सेवा करना।

अंततः माता-पिता से पार्वती ने अनुमति प्राप्त हुई, तत्पश्चात, हिमालय-राज उन्हें उस स्थान पर ले गए, जहाँ भगवान शिव सर्वदा योग साधना में मग्न रहते थे। हिमालय-राज ने भगवान शिव से अपनी पुत्री पार्वती तथा उनकी दो सखियों को अपनी सेवा में रखने का निवेदन किया। भगवान शिव ने उस मनोरम कन्या को देखकर आंखें मोड़ ली तथा पुनः ध्यान मग्न हो गए। तदनंतर, हिमालय-राज ने भगवान शिव से निवेदन किया कि वह प्रतिदिन अपनी कन्या के साथ उनके दर्शनों हेतु आयेंगे, वे अनुमति प्रदान करें। भगवान शिव ने केवल हिमालय-राज को ही आने की आज्ञा दी, पार्वती को नहीं। हिमालय-राज ने इसका कारण ज्ञात करना चाहा! क्यों उनकी कन्या उनकी सेवा हेतु नहीं आ सकती हैं? क्या वह सेवा के योग्य नहीं हैं? भगवान शिव ने हिमालय-राज को हँसते हुए उत्तर दिया! “यह तुम्हारी कन्या सुंदर कटिप्रदेश से सुशोभित, चंद्रमुखी और शुभ लक्षणों से युक्त हैं, इस कारण तुम्हें इसे मेरे समीप नहीं लाना चाहिये। वेदों ने नारी को मयारूपिणी कहा गया हैं, मैं योगी और सदा माया से निर्लिप्त रहने वाला हूँ, मुझे युवती स्त्री से क्या प्रयोजन। मैं नहीं चाहता हूँ की मेरा वैराग्य नष्ट हो जाए और मैं तपस्या से भ्रष्ट हो जाऊँ।” इस प्रकार के नाना वचन कहकर भगवान शिव चुप हो गए।

भगवान शिव का पार्वती को नित्य सेवा की अनुमति प्रदान करना।

इस पर पार्वती ने भगवान शिव से कहा! “आपने तपस्वी होकर गिरिराज से यह क्या कह दिया? आप ज्ञान विशारद हैं, तो भी मेरी बात सुनिए! शक्ति से युक्त होकर ही आप भारी तप कर रहें हैं, सभी कर्मों को करने की उस शक्ति हो ही ‘प्रकृति’ जानना चाहिये, इसी से सभी की सृष्टि, पालन तथा संहार होता हैं। आप कौन हैं? आपका सूक्ष्म प्रकृति क्या हैं? इसका विचार कीजिये, प्रकृति के बिना लिंग रूपी महेश्वर कैसे हो सकता हैं? इस तथ्य को हृदय से विचार कर ही आपको जो कहना हैं वह कहिये।" इस पर भगवान शिव ने पार्वती को उत्तर दिया ! “मैं उत्कृष्ट तपस्या द्वारा ही प्रकृति का नाश करता हूँ तथा तत्त्वतः प्रकृति रहित ‘शम्भु’ के रूप में स्थित होता हूँ। अतः सत्पुरुषों को कभी भी प्रकृति का संग्रह नहीं करना चाहिये, निर्विकार रहना चाहिये।” इसके पश्चात पार्वती ने मन ही मन भगवान शिव से कुछ दार्शनिक संवाद किये, जिसके पश्चात भगवन शिव ने उन्हें शास्त्र-विधि के अनुसार उनकी सेवा करने की आज्ञा दे दी।

हिमालय-राज, पार्वती सहित प्रतिदिन भगवान शिव के दर्शनों हेतु जाते थे, कभी-कभी पार्वती अपने सखियों के साथ भी जाती थीं तथा उनकी भक्ति पूर्वक सेवा करती थी। कोई भी गण उन्हें रोकता-टोकता नहीं था। पार्वती नाना प्रकार से विधिवत भगवान शिव की सेवा करने लगी, इस प्रकार महान समय व्यतीत हो गया, इस पर भी वे इन्द्रिय को संयमित कर उनकी सेवा में लगी रहीं। भगवान शिव, पार्वती की नित्य सेवा तत्परता देख दया से द्रविड़ हो उठे और विचार करने लगे “जब गिरिजा के अंतर मन में गर्व का बिज नहीं रहेगा, तब मैं उनका पाणिग्रहण करूँगा।” ऐसा निश्चय कर भगवान शिव सर्वदा ध्यान मग्न ही रहने लगे।

तारकासुर से पीड़ित देवताओं का ब्रह्मा जी के पास जाकर उसके वध हेतु निवेदन करना, पार्वती के प्रति भी निरासक्त का भाव देखकर काम-देव का भगवान शिव के पास जाना तथा काम-देव दहन।

तारकासुर को ब्रह्म प्रद्दत वरदान।

तारकासुर ने उग्र तप कर तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया तथा स्वयं 'इंद्र' हो गया, उसके सामान दूसरा कोई शासक नहीं रहा। तारकासुर के तपस्या से संतुष्ट होकर, ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया! “शिव पुत्र के हाथों से ही उसकी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं”। पीड़ित देव-गण, ब्रह्मा जी की शरण में गए तथा उनसे, उसके वध हेतु कोई उपाय करने का निवेदन किया। उस समय तीनों लोकों का वह अधिपति था तथा उसने समस्त देवताओं को उनके अधिकारों से वंचित कर, अपने अधीन ले लिया था, ब्रह्मा जी उसे वर देकर बंध गए थे। उन्होंने देवताओं को सुझाया कि! सभी देवता संसार से विरक्त हुए भगवान शिव के पास जाकर उनसे निवेदन करें की! हिमालय-कन्या ‘गिरिजा’ जो पूर्व जन्म में सती थीं उन्हें वे पत्नी रूप में स्वीकार करें। ब्रह्मा जी ने समस्त देवताओं को कोई ऐसा उपाय करने हेतु कहा! जिससे भगवान शिव, पार्वती से विवाह करें एवं उनके वीर्य को धारण कर पार्वती पुत्र उत्पन्न कर सकें। भगवान शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र से ही तारक-असुर का वध संभव था, इसके अतिरिक्त कोई भी उसका वध करने में समर्थ नहीं हैं।

परन्तु, तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर पार्वती द्वारा प्रतिदिन उनकी सेवा करने पर भी, भगवान शिव का ध्यान भंग नहीं हो पा रहा था। ध्यान-भंग कर पार्वती की ओर देखने का भी उनके मन में विचार नहीं आता था, वे महान योगी हैं; इस पर देव-गुरु वृहस्पति ने देवताओं को मदन काम-देव के द्वारा उनके ध्यान भंग करने का उपाय सुझाया। देवता जानते थे की पार्वती उन्हें पति रूप में प्राप्त करने हेतु उनकी नाना प्रकार से आराधना कर रहीं हैं, परन्तु अधिक समय से योग समाधि में लीन भगवान शिव अपने ध्यान से च्युत नहीं हो रहें हैं।

देवगुरु वृहस्पति के कथनानुसार, देवराज इंद्रा द्वारा काम-देव को भगवान शिव के योग-साधना (ध्यान) भंग करने का आदेश।

देवराज ने ‘पुष्पधन्वा कामदेव’ जिनके पाँच बाण सभी कार्यों को सिद्ध करने वाले हैं, बुलवाकर आदेश दिया कि! “तारकासुर के अत्याचारों से तीनों लोक त्रस्त हैं तथा उनकी मृत्यु भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकती हैं, उसे ब्रह्मा जी का आशीर्वाद प्राप्त हैं। भगवान शिव, हिमालय के शिखर पर बैठ कर तपस्यारत हैं, जो संसार से अनासक्त हैं। आदि शक्ति जो पूर्व में सती रूप में उनकी पत्नी थीं, हिमालय के पुत्री के रूप में उत्पन्न हो, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु उत्तम सेवा-आराधना कर रहीं हैं। किन्तु भगवान शिव को उन कामिनी के रूप में कोई स्पृहा नहीं हैं, तुम योग्निष्ठा में रत उनको सम्मुग्ध करों। तुम कुछ ऐसा करो जिससे वे तप-साधन का त्याग कर, पार्वती के प्रति वैसे ही आसक्त हो जाए जैसे वे सती के प्रति थे।”

(इस पर काम-देव को ब्रह्म प्रदत्त दीर्घ काल से भूले हुए एक श्राप का स्मरण हो आया, जब उन्होंने शस्त्र परीक्षा के समय साध्य पुत्री की ओर दौड़ते हुए विधाता को अपने पुष्प-बाणों से बिंध दिया था। “देव कार्य हेतु वे भगवान शिव के अंगों पर बाण का प्रयोग करेंगे तथा उनके क्रुद्ध नेत्रों से निसृत अग्नि से भस्म हो जायेंगे।”)

काम-देव ने देवराज इंद्र को आश्वस्त किया की वे अवश्य ही भगवान शिव को सम्मुग्ध करेंगे। काम-देव ने देवताओं से निवेदन किया! यदि भगवान शिव उन्हें नष्ट करने का प्रयास किया तो सभी मिलकर उन्हें बचने का प्रयास करें। तत्पश्चात, काम-देव अपनी पत्नी रति तथा मित्र वसंत के संग भगवान शिव के तपोवन की ओर चले। साथ ही देवराज ने समस्त देवताओं को आज्ञा दी की वे सभी काम-देव के संग जाए तथा उनकी सहायता करें।

काम-देव के द्वारा भगवान शिव पर हर्षण, सम्मोहन तथा मोहक वाण चलाना।

भगवान शिव के तपो-वन में पहुँच-कर, काम-देव ने कुछ समय तक प्रतीक्षा की तथा उनके किसी दुर्बलता को ज्ञात करने का प्रयास किया, जिससे वे उन पर काम-वाणों द्वारा आक्रमण कर सकें। काम-देव तथा वसंत के उस स्थान पर उपस्थित होने के कारण, वहां पर उपस्थित सभी पशु-पक्षी तथा शिव-अनुचर काम मुग्ध विकल हो उठे, वसंतकी उपस्थित होने के कारण वहां का वातावरण काम-मुग्ध हो गया। उस समय मलयजन्य शीतल मंद सुगन्धित वायु बहने लगी, सभी प्राणी समुत्कंथित हो गए। भगवान शिव को निश्चल देखकर, काम-देव बहुत चिंतित हुए, अपने पत्नी रति द्वारा निषेध करने पर भी वे आगे बड़े तथा सम्मोहन बाण का उनपर संधान किया। परन्तु वह बाण भगवान शिव को देखकर पुनः लौट आया। इस प्रकार काम-देव को भगवान शिव के पास देखकर पार्वती भी उनके सनमुख गई; भगवान शिव कुछ क्षण हेतु ध्यान का परित्याग कर उनकी ओर देखने लगे। इस स्थित देखकर काम-देव, अपना धनुष लिए भगवान शिव के और अधिक निकट गए, समस्त देवता गण भी वही आकाश में उपस्थित थे। काम-देव ने सर्वप्रथम भगवान शिव के छाती में हर्षण नाम का बाण चलाया, जिससे उन्होंने प्रहृष्ट हो पार्वती की ओर दृष्टि पात किया। काम-देव की सहायता हेतु भगवान शिव के आसपास मनोहर शीतल मंद सुगंधित वायु बहाने लगी। तदनंतर काम-देव ने सम्मोहन नाम के बाण का प्रयोग किया, उस समय काम-देव की सेना ने भगवान शिव को चारों ओरों से घेर लिया, दक्षिण की ओर रति, बाएं ओर प्रीति तथा पीछे की ओर परम सुख प्रदान करने वाले वसंत स्थित हो गए। इसके पश्चात काम-देव ने सभी के देखते ही देखते मोहक बाण चलाया, जो भगवान शिव के हृदय में प्रविष्ट हो गया, जिसके परिणामस्वरूप वे पार्वती के आलिंगन हेतु उद्यत हुए। यह देख देवताओं ने काम-देव की भूरी-भूरी प्रशंसा की, उन्हें ऐसा लग रहा था की ऐसा कोई भी काम नहीं हैं जिसे वे न कर सकें।

भगवान शिव के क्रोध-अग्नि से काम-देव दहन तथा काम-पत्नी रति पर उनकी कृपा।

भगवान शिव ने उपस्थित परिस्थिति हेतु, अपनी इन्द्रियों पर पुनः निग्रह कर चित्त में आये विकार पर विचार किया। इस बीच वहां पर ब्रह्मा जी भी पहुँच गए और उपस्थित समस्त देवताओं ने महादेव की स्तुति करना प्रारंभ किया। ब्रह्मा जी ने काम-देव तथा वसंत को तत्काल खिंच कर पीछे हटाया। भगवान शिव ने यह समझ लिया, अवश्य ही यह आक्रमण काम-देव का हैं तथा उन्होंने क्रोध युक्त हो प्रलय-काल की अग्नि के सामान प्रज्वलित अपना तृतीय नेत्र खोला। उनके तीसरे नेत्र से सम्पूर्ण जगत को भस्म करने वाली प्रबल अग्नि निकली तथा तत्काल ही काम-देव को भस्म कर दिया। यह देख पार्वती का सारा शरीर श्वेत वर्ण युक्त हो गया, वहां पर उपस्थित देव समूह इस घटना पर बड़े ही दुःखी तथा हतोत्साहित हुए। काम-देव की पत्नी रति यह देख! क्षण भर के लिए अचेत हो गई, कुछ क्षण पश्चात उनकी चेतना आने पर वे बहुत विलाप करने लगी, इस पर वहां उपस्थित सभी बहुत दुःखी हुए। सभी देवताओं ने रति से कहा तुम काम-देव के थोड़े से भस्म को अपने पास रखो, भगवन शिव उन्हें पुनः जीवित कर देंगे।

इस प्रकार समस्त देवगणो ने भगवान शिव की स्तुति की, उनसे निवेदन किया की वे काम-देव के इस कृत्य पर प्रसन्नता तथा न्यायपूर्वक पूर्वक विचार करें, इसमें काम-देव का कोई स्वार्थ नहीं हैं। हम सभी देवताओं के कहने पर ही उन्होंने यह कार्य किया हैं, इसे आप अन्यथा न समझे। आपके क्रोध के कारण उपस्थित परिस्थिति हेतु ही सती-साध्वी रति अकेली हो गई हैं और अत्यंत दुःखी हो विलाप कर रही हैं, कृपा कर आप उसे सांत्वना प्रदान करें। आपको रति के शोक का निवारण करना चाहिये! अन्यथा इस संसार के समस्त प्राणियों का संहार हो जायेगा। इस पर भगवान शिव ने देवताओं से कहा! “मेरे क्रोध से जो हो गया, वह अन्यथा नहीं हो सकता हैं, रति पति काम-देव तब तक देह रहित रहेंगे जब तक श्री कृष्ण जन्म नहीं हो जाता, रुक्मणी के गर्भ से काम-देव पुनः जन्म लेंगे तथा उनका नाम ‘प्रधुम्न’ होगा।” देवताओं ने भगवान शिव से पुनः निवेदन किया कि वे काम-देव को शीघ्र ही जीवन-दान देकर रति के प्राणों की रक्षा करें। भगवान शिव ने देवताओं आश्वासन दिया! वे काम-देव को पुनः सभी के हृदय में स्थापित कर देंगे, वह उनका गण होकर विहार करेगा। इसके पश्चात भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए तथा सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गए।

भगवान शिव के तीसरे नेत्र प्रकट हुई वडवाग्नि को समुद्र में स्थापित करना तथा शिव के अंतर्ध्यान होने के कारण व्याकुल हुई पार्वती को देवर्षि नारद द्वारा उत्तम शिव आराधना का उपाय बताना।

भगवान शिव के तीसरे नेत्र से प्रकट हुई अग्नि, बिना किसी प्रयोजन के ही प्रज्वलित हो सभी दिशाओं में फैलने लगी। जिसके कारण समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया, देवता तथा ऋषि, ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की कृपा से प्राप्त हुए तेज से, उस वडवाग्नि को स्तंभित कर दिया तथा उसे एक घोड़े के रूप में परिवर्तित कर दिया, जिसके मुख से ज्वालाएँ निकल रहीं थीं। इसके पश्चात उस घोड़े को लेकर ब्रह्मा जी समुद्र तट पर गए, उन्हें देख समुद्र हाथ जोड़-कर उनके सनमुख आयें तथा उनसे आगमन का कारण पूछा। ब्रह्मा जी ने सिन्धु से कहा! “यह अश्व साक्षात् भगवान शिव का क्रोध हैं, काम-देव को भस्म करने के पश्चात यह सम्पूर्ण जगत को भी दग्ध करने को उद्धत हुआ हैं। मैंने इसे स्तंभित कर, घोड़े के रूप में परिवर्तित कर दिया हैं; यह अश्व जो अपने मुख से ज्वाला प्रकट कर रहा हैं, तुम प्रलय-काल तक इसे धारण करो।” ब्रह्मा जी के निवेदन को सिन्धु-राज ने स्वीकार कर लिया, यह दूसरे किसी और के लिए असंभव था। तदनंतर, वह वडवाग्नि समुद्र में प्रविष्ट हुई तथा सागर के जल का दहन करने लगी, इसके पश्चात ब्रह्मा जी अपने लोक को चले आयें।

नारद जी का हिमालय के घर जा पार्वती को शिव आराधना की दीक्षा प्रदान करना।

काम-देव को भस्म करने वाली परिस्थिति से पार्वती भयभीत हो गई तथा अपने दोनों सखियों के संग अपने घर चली आयी। काम-देव को दाह करने के पश्चात भगवान शिव अदृश्य हो गए थे, उनके विरह से पार्वती अत्यंत व्याकुल हो गयी एवं क्लेश का अनुभव करती थीं। वे सर्वदा ही शिव-शिव का जप किया करती थीं, पिता के घर रहकर वह अपनी कल्पना भगवान शिव के संग ही करती थीं। एक दिन नारद मुनि घूमते हुए हिमालय के गृह में गए, हिमवान ने उनका यथोचित आदर सत्कार किया। हिमवान ने देवर्षि नारद को सुखद आसन प्रदान किया तथा उनसे सब कुछ कह सुनाया। देवर्षि ने हिमवान को भगवान शिव के भजन करने का परामर्श दिया तथा गुप्त भाव से पार्वती के पास गए और उनसे कहा! “तपस्या के गर्व युक्त हो तुमने भगवान शिव की तपस्या की थीं, उन्होंने तुम्हारे उसी गर्व को नष्ट किया हैं। तुम्हारे स्वामी महेश्वर विरक्त तथा महायोगी हैं, उन्होंने केवल काम-देव को भस्म कर तुम्हें जीवित छोड़ दिया हैं। तुम उत्तम तपस्या में संलग्न हो चिरकाल तक शिव की आराधना करो। तपस्या से तुम्हारा संस्कार हो जाने पर भगवान शिव तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करेंगे, तुम्हारा परित्याग नहीं करेंगे। तुम उनके अतिरिक्त किसी और को अपना पति स्वीकार नहीं करना।”

इसपर पार्वती, देवर्षि से बोली! “आप सर्वज्ञ हैं, इस चराचर जगत का उपकार करने वाले हैं, मुझे भगवान शिव के आराधना हेतु कोई मन्त्र प्रदान करें, उचित मार्गदर्शन करें।” इस प्रकार पार्वती के निवेदन पर देवर्षि ने उन्हें भगवान शिव के पंचाक्षर मन्त्र का विधिपूर्वक उपदेश दिया तथा मन्त्र का प्रभाव भी बताया।

शिव आराधना हेतु पार्वती की दुष्कर तपस्या, ब्रह्मा-विष्णु तथा देवता और दैत्यों का महादेव शिव के पास जाकर पार्वती से पाणिग्रहण करने का आग्रह करना।

भगवान शिव को वर रूप में प्राप्त करने हेतु पार्वती की कठोर तपस्या।

नारद जी के प्रस्थान पश्चात उन्होंने शिव-तपस्या को ही अपना साध्य माना और मान को उसके लिए निश्चल किया। अपनी दो सखियों के साथ पार्वती ने तपस्या हेतु माता-पिता से आज्ञा मांगी। पिता हिमवान ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु, माता मेनका ने स्नेह-वश उन्हें रोका, उस समय उनके मुंह से ‘ओ माँ’ (उमा) निकली, जिस कारण उनका एक नाम 'उमा' भी लोक विख्यात हो गया। अंततः मेनका ने भी उन्हें कठोर तपस्या हेतु वन में जाने की अनुमति दे दी। अपनी दो सखियों के संग पार्वती ने तपस्या हेतु ‘गंगावतरण क्षेत्र’ हेतु प्रस्थान किया, शीघ्र ही उन्होंने वल्कल धारण कर, प्रिय वस्त्रों का परित्याग किया। पार्वती ने उस स्थान में तपस्या प्रारंभ की जहां पर काम-देव को दग्ध किया गया था, उनके द्वारा उस स्थान पर तप करने के कारण, उस शिखर का नाम “गौरी-शिखर” पड़ गया (पार्वती का एक नाम गौरी भी हैं)।
उन्होंने ऐसी तपस्या प्रारम्भ की जो महान मुनियों हेतु भी कठिन था, वे मन सहित इन्द्रियों को वश में रखकर ग्रीष्म ऋतु में अपने चारों और अग्नि प्रज्वलित कर, वर्षा काल में वर्षा के जल से भीग कर तथा शीत काल में हिम खण्डों में बैठ कर, शिव के पंचाक्षर मन्त्र का जप करती थीं। शुद्ध चित वाली पार्वती के ऊपर नाना महान कष्ट आयें परन्तु उनका तप निश्चल ही रहा, वे केवल शिव में मन लगाये रहती थीं। पार्वती ने प्रथम वर्ष केवल फलाहार ही किया, द्वितीय वर्ष से असंख्य वर्षों तक उन्होंने केवल पत्तों को भोजन के रूप में ग्रहण किया। इसके पश्चात उन्होंने निराहार रहकर (जिसके कारण उनका एक नाम ‘अपर्णा’ भी विख्यात हुआ) साधना प्रारंभ की, एक पैर से खड़ी हो पार्वती साधना करने लगी, उनके अंग चीर और वल्कल से ढके थे, वे मस्तक पर जटाओं का समूह धारण किये रहती थीं, इस प्रकार कठोर तप करने के कारण उन्होंने देवताओं तथा मुनियों को जीत लिया।
जहाँ पहले कभी भगवान शिव ने ६० हजार वर्षों तक तपस्या की थीं, उस स्थान पर क्षण-भर रुककर पार्वती सोचने लगी ! “क्या महादेव यह नहीं जानते हैं की मैं उनके लिए उत्तम तथा कठोर नियमों का पालन कर तप कर रहीं हूँ? क्या कारण हैं की दीर्घ काल तक कठोर तप करने वाली इस सेविका के पास वे नहीं आयें? वेद-मुनिजन भगवान शिव की गुणगान करते हैं, कहते हैं की शिव सर्वज्ञ, सर्वात्मा, सर्वदर्शी, समस्त प्रकार के सुख प्रदान करने वाले, दिव्य शक्ति संपन्न, सबके मनोभाव को समझने वाले, भक्तों को उनकी अभीष्ट वास्तु प्रदान करने वाले, समस्त क्लेशों के निवारण करने वाले हैं। यदि मैं समस्त कामनाओं का परित्याग कर भगवान शिव मैं अनुरक्त हुई हूँ तो वे मुझ पर प्रसन्न हो, यदि मैंने नारद जी द्वारा प्रदत्त शिव पञ्चाक्षर मन्त्र का उत्तम भक्तिभाव युक्त हो तथा विधिपूर्वक जप किया हो तो भगवान शिव मुझ पर प्रसन्न हो।”

पार्वती को हिमालय तथा मेनका द्वारा शिव आराधना त्याग करने की सलाह देना, उनके उग्र तपस्या से तीनों लोकों का संतप्त होना।

इस प्रकार नित्य चिंतन करती हुई पार्वती अपना मुंह नीचे किये दीर्घ काल तक तपस्या में लगी रहीं, परन्तु भगवान शिव प्रकट नहीं हुए। पार्वती के माता-पिता, मेरु और मंदराचल आदि ने उन्हें समझाया की भगवान शिव की तपस्या अत्यंत कठिन हैं, वे तपस्या का त्याग करें। पार्वती ने उनसे कहा! “आप! मेरी जो प्रतिज्ञा हैं उसे सुन ले! काम-देव को भस्म करने वाले भगवान शिव विरक्त हैं, परन्तु मैं अवश्य ही अपने तप से उन्हें संतुष्ट कर लुंगी। आप सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने निवास स्थल को जाये।” इस प्रकार पार्वती के दृढ़ निश्चय को देखकर सभी अत्यंत विस्मित होकर जैसे आयें थे, वैसे ही लौट गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने और भी अधिक कठोर ताप करना प्रारम्भ कर दिया, जिसके कारण तीनों लोक संतप्त हो उठें, सभी महान कष्ट में पड़ गए। यह देख समस्त देवता निस्तेज होकर ब्रह्मा जी की शरण में गए तथा उन्होंने जगत के संतप्त होने का कारण पूछा। ब्रह्मा जी ने मन ही मन सब ज्ञात किया और देवताओं से बोले! “उपस्थित, तीनों लोकों में जो दाह उत्पन्न हुआ हैं, वह पार्वती की तपस्या का फल हैं।” ब्रह्मा जी समस्त देवताओं के संग भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर में गए तथा उनको उत्पन्न परिस्थिति से अवगत करवाया। भगवान विष्णु बोले! “मैंने आज पार्वती की तपस्या का कारण जान लिया हैं, अब तुम सभी मेरे साथ भगवान शिव के पास चलो। हम सभी उनसे प्रार्थना करेंगे की वे पार्वती का पाणिग्रहण करें, जैसे भी हो वे पार्वती के आश्रम में जाकर उन्हें वरदान प्रदान करें। हम सभी उस स्थान पर चलेंगे जहाँ भगवान शिव तपस्या कर रहे हैं।” सर्वप्रथम देवताओं को भगवान शिव के पास जाने से डर लग रहा था, परन्तु भगवान विष्णु के समझाने पर उनका डर दूर हुआ।

देवताओं द्वारा भगवान शिव से पार्वती के पाणिग्रहण करने का निवेदन।

ब्रह्मा तथा विष्णु सहित समस्त देवता भगवान शिव के निकट गए तथा उनकी स्तुति-वंदना की! नंदिकेश्वर ने भगवान शिव से कहा की देवता तथा मुनि महान संकट में पड़कर आपके पास आयें हैं, कृपा कर आप उनका उद्धार करें। तदनंतर, भगवन शिव ने अपना नेत्र खोला तथा ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त देवताओं से उनके आने का कारण पूछा। भगवान विष्णु ने कहा! “तारकासुर देवताओं को अत्यंत दुःख तथा महान कष्ट दे रहा हैं, आपके पुत्र द्वारा ही उस असुर का वध संभव हैं, अन्यथा नहीं। आप गिरिजा का पाणिग्रहण कर, देवताओं पर कृपा करें।” भगवान विष्णु का यह कथन सुनकर भगवान शिव ने कहा! “जैसे ही मैंने गिरिजा का पाणिग्रहण किया, सभी जीव सकाम हो जायेंगे। मैंने काम-देव को जलाकर देवताओं का बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया हैं, आज से सभी लोग मेरे साथ सुनिश्चित रूप से निष्काम होकर रहें। समाधि के द्वारा परमानंद का अनुभव करते हुए सभी निर्विकार जो जायेंगे, काम नरक की प्राप्ति कराने वाला हैं, सभी देवताओं को काम और क्रोध का परित्याग कर देना चाहिये।” इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मा-विष्णु सहित देवताओं तथा ऋषि-मुनियों को निष्काम धर्म का उपदेश दिया, इसके पश्चात वे पुनः ध्यान लगाकर चुप हो गए। देवताओं ने पुनः भगवान शिव की स्तुति कर उनपर आयें महान क्लेश का उद्धार करने का निवेदन किया। ब्रह्मा तथा विष्णु जी ने मन ही मन भगवान शिव से दीनतापूर्ण वाणी द्वारा अपना अभिप्राय निवेदन किया; अंततः वे प्रसन्न हुए। भगवान श्री हरी विष्णु ने कहा! नारद जी की आज्ञा से पार्वती कठोर तप कर रहीं हैं, जिसके कारण त्रिलोकी आच्छादित हो रहीं हैं, आप उन्हें अभिलाषित वर प्रदान करें। आप सर्वज्ञ हैं, अंतर्यामी हैं, आप अवश्य ही समस्त परिस्थिति के ज्ञाता हैं।” तदनंतर, भगवान शिव ने ब्रह्मा-विष्णु तथा अन्य देवताओं के निवेदन को स्वीकार कर लिया।

भगवान शिव द्वारा पार्वती के तप की परीक्षा लेने हेतु सप्त-ऋषियों को भेजना तथा इसके पश्चात स्वयं जाना।

देवताओं के चले जाने के पश्चात, पार्वती की तप की परीक्षा लेने हेतु भगवान शिव समाधिस्थ हो गए। उन दिनों पार्वती देवी बड़ी भरी उग्र तप कर रहीं थीं, उनके उग्र तप को देखकर भगवान शिव भी विस्मय में पड़ गए। उन्होंने वशिष्ठ इत्यादि सप्त-ऋषियों का स्मरण किया, जिसके कारण शीघ्र सभी मुनि वहां उपस्थित हुए। उनसे भगवान शिव ने कहा! “गौरी-शिखर पर देवी पार्वती कठोर तप कर रहीं हैं, मुझे पति रूप में प्राप्त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य हैं। मेरे अतिरिक्त अन्य सभी कामनाओं का परित्याग कर, वे एक उत्तम निश्चय पर पहुँच चुकी हैं। तुम सभी उस स्थान पर जाओ और दृढ़ता से उनकी परीक्षा लो, वहां तुम्हें सर्वथा छलयुक्त बातें कहनी चाहिये।” भगवान शिव की आज्ञा पाकर वे तुरंत ही उस स्थान पर गए, वहां जाकर उन्होंने पार्वती का महान तेज देखा। सप्त-ऋषि गण, साधारण मुनि रूप धारण कर पार्वती के पास गए तथा उनके इस कठोर तप का कारण पूछा! पार्वती ने उन्हें बताया कि वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं।

सप्त-ऋषियों का नारद जी तथा शिव की निंदा करना तथा तपस्या के प्रति पार्वती को निश्चल देख उन्हें आशीर्वाद देकर लौटना।

इस प्रकार पार्वती के वचन सुनकर वे सभी जोर से हंस पड़े और छल युक्त मिथ्या वचन बोलने लगे! देवर्षि नारद व्यर्थ ही अपने आप को पंडित मानते हैं, उनमें तो क्रूरता भरी हुई हैं। क्या आप उनके चरित्र को नहीं जानती? वे दूसरों के चित को मोह में डालकर मथ डालते हैं, उनकी बातें सुनने से सर्वथा हानि ही होती हैं। उनके कारण ही दक्ष के प्रथम पुत्र-गण पुनः अपने गृह लौटकर नहीं आयें, ऐसा ही द्वितीय पुत्रों के साथ भी हुआ। विद्याधर चित्रकेतु को उन्होंने ऐसा उपदेश दिया, जिससे उनका घर ही उजाड़ गया। वे सर्वदा ही दूसरे की बुद्धि मैं भेद पैदा करते हैं, वे अपनी विद्या जिसे सुना देते हैं वह घर छोड़ कर भीख मांगने लगता हैं, उनका मन मलिन हैं। तुम भी व्यर्थ ही उनके भुलावे में आकर मूर्ख बन दुष्कर तप कर रहीं हो। तुम जिनके लिए तप कर रहीं हो, वे काम के शत्रु, सदा ही उदासीन तथा निर्विकार हैं, अमांगलिक वस्तुओं को अपने शरीर में धारण किये रहते हैं, लज्जा को तो वे तिलांजलि दे चुके हैं, न ही उनका घर हैं और न ही द्वार। उनके कुल का भी किसी को ज्ञान नहीं हैं, कुत्सित भेष ग्रहण करते हैं, भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं और नाग-धड़ंग हो शूल धारण करते हैं। तुम स्वयं विचार करो ऐसे वर को प्राप्त कर तुम्हें क्या सुख मिलेगा? जो सर्वदा ही अकेले रहने वाले, शांत, संग-रहित और अद्वितीय हैं, उनके साथ किसी स्त्री का निर्वाह कैसे होगा? तुम हमारी आज्ञा से अपने घर को चली जाओ तथा इस दुर्बुद्धि को त्याग दो। तुम्हारे योग्य वर केवल भगवान विष्णु हैं, जो समस्त गुणों से युक्त हैं तथा वैकुण्ठ में वास करते हैं। हम तुम्हारा विवाह उनसे करवा देंगे, वह तुम्हारे लिए समस्त सुखों को प्रदान करने वाला होगा, तुम शिव से विवाह का हठ त्याग दो।”

इस प्रकार के मुनियों द्वारा वचन सुनकर पार्वती हंस पड़ी तथा उन ज्ञान-विशारद मुनियों से बोलीं! “आपने अपने समझ के अनुसार ठीक ही कहाँ हैं, परन्तु मेरा हठ भी छुटने वाला नहीं हैं। पर्वत से उत्पन्न होने के कारण मेरे शरीर तथा प्राण में कठोरता विद्यमान हैं। अपनी बुद्धि से इस प्रकार विचार कर कृपा कर आप मुझे तपस्या से रोकने का प्रयास न करें, मेरे निमित्त देवर्षि का उपदेश ही परम हितकारी हैं।” इस प्रकार सप्त-ऋषियों को उपदेश देकर गिरिजा निर्विकार चित से चुप हो गई, उनके उत्तम निश्चय को जानकर सप्त-ऋषि गण उनकी जय-जय कार करने लगे तथा उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।

वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान शिव का पार्वती के आश्रम जाना तथा तपस्या का उद्देश्य ज्ञात करना।

इसके पश्चात भगवान शिव ने साक्षात पार्वती की परीक्षा लेने का निश्चय किया, मन ही मन वे पार्वती से बहुत संतुष्ट थे। एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर दंड तथा छत्र लिए वे उनके आश्रम में गए, तेजस्वी ब्राह्मण को आया देखकर पार्वती ने उनकी पूजा की तथा आदरपूर्वक कुशल-समाचार पूछा। पार्वती ने उनसे पूछा आप कौन हैं तथा कहाँ से आयें हैं? ब्राह्मण ने कहा “मैं इच्छानुसार विचरण करने वाला वृद्ध ब्राह्मण हूँ। तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो और इस निर्जन वन में किस उद्देश्य हेतु तपस्या कर रहीं हो? "

पार्वती ने कहा! “मैं हिमाचल की पुत्री ‘पार्वती’ हूँ, इससे पहले जन्म में मैं शिव पत्नी तथा दक्ष कन्या सती थीं। पूर्व में मैंने अपने पितृ गृह में पति निंदा सुनकर, अपने शरीर का त्याग कर दिया था। मैं इस शिखर पर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तप कर रहीं हूँ, परन्तु वे संतुष्ट हो मुझे दर्शन नहीं दे रहें हैं। अब मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी, इसके पश्चात जहाँ-जहाँ मेरा जन्म होगा, मैं भगवान शिव को ही पति रूप में वरण करूँगी।” तदनंतर, देखते ही देखते पार्वती अग्नि में समा गयी, उन्हें ऐसा करने से ब्राह्मण ने बार-बार रोका, परन्तु उनकी तपस्या के प्रभाव से वह अग्नि भी शीतल हो गई। क्षण भर अग्नि में रह कर पार्वती जब आकाश की ओर उठीं तो ब्राह्मण रूप धारी शिव ने कहा “तुम्हारा तप क्या हैं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा हैं। इधर अग्नि से तुम्हारा शरीर नहीं जला, यह तो तपस्या के सफलता का सूचक हैं, परन्तु तुम तो कह रहीं हो की तुम्हारा मनोरथ सिद्ध नहीं हुआ हैं। तुम अपने मनोरथ के विषय में मुझ ब्राह्मण से सच-सच बताओ।" इस पर पार्वती ने अपनी सखी विजया को प्रेरित किया की वह ब्राह्मण को सब बताएं। विजया ने कहा “मैं अपनी सखी पार्वती के इस उत्तम तपस्या के कारण का वर्णन करती हूँ। देवी, भगवान शिव के अतिरिक्त किसी और से विवाह नहीं करेंगी, इस कारण मेरी सखी ‘पार्वती’, नारद जी के मार्गदर्शन अनुसार ३ हजार वर्षों से कठोर तपस्या कर रहीं हैं।”

विजया के इस प्रकार कहने पर ब्राह्मण हँसते हुए बोले “तुमने जो कुछ कहा हैं उनमें मुझे परिहास का अनुमान होता हैं, यदि यह सब ठीक हैं तो देवी स्वयं अपने मुंह से कहें।” इस पर पार्वती ने उत्तर दिया “मेरी सखी ने जो भी कहाँ हैं वह सत्य हैं, मैंने साक्षात् भगवान शिव को ही पति भाव से वरण किया हैं।” यह सुनकर ब्राह्मण रूपी भगवान शिव वहां से जाने लगे तथा कहा! “जब तुम्हारा सुख इसी में हैं तो मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ, तुम्हारा जैसा कार्य हैं वैसा ही परिणाम भोगो।” जाते हुए ब्रह्माण को पार्वती ने रोकते हुए कहा की कुछ क्षण ठहर कर आप मेरे हित का उपदेश देते जाए। पार्वती के इस प्रकार कहने पर ब्राह्मण देवता वही रुक गए और कहने लगे!
“यदि तुम मुझे भक्तिभाव से ठहरा रहीं हो तो मैं तुम्हें तत्त्व बता रहा हूँ, जिससे तुम्हें हित का ज्ञान हो जायेगा। मैं भगवान शिव को भली प्रकार से जनता हूँ, तभी यथार्थ बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो! भगवान शिव शरीर में भस्म का लेपन करते हैं, सर पर जटा धारण करते हैं, बाघ का अम्बर पहनते हैं, हाथी का खाल ओड़ते हैं, भीख मांगने के लिए एक खप्पर धरण किये रहते हैं, झुण्ड के झुण्ड सांप उनके शरीर तथा मस्तक में देखे जाते हैं। वे विष खाकर ही पुष्ट होते हैं, अभक्ष्य-भक्षक हैं, उनके नेत्र बड़े ही भद्दे तथा डरावने हैं, उनके जन्म का कोई अता-पता नहीं हैं, गृहस्थी के भोगो से दूर वे सर्वदा ही नंग-धडंग घूमते हैं और भूत-प्रेतों को अपने साथ रखते हैं। उनकी दस भुजाएं हैं, यह तो बड़ी विड़म्बना हैं, कैसे तुम उन्हें अपना पति बनाने की सोच रहीं हो? तुम्हारा ज्ञान क्या कही लुप्त हो गया हैं? तुम्हारे पिता पर्वतों के राजा हैं, तुम स्त्रियों में रत्न हो, क्यों सोने की मुद्रा देकर उतना ही कांच लेना चाहती हो? क्या तुम चन्दन का लेपन छोड़कर शरीर में कीचड़ लपेटना चाहती हो? सूर्य के तेज का त्याग कर जुगनू की तरह चमकना चाहती हो? उत्तम वस्त्र त्याग कर चमड़े का वस्त्र धारण करना चाहती हो ? घर में रहना छोड़कर, धुनी रमना चाहती हो? तुम रत्न के भंडार को त्याग कर लोहा पाने की इच्छा करती हो।
तुम्हारा शिव के साथ सम्बन्ध परस्पर विरुद्ध हैं, ऐसा मेरा मत हैं। तुम तो चन्द्र-मुखी हो तथा शिव के पञ्च मुख हैं, तुम्हारे नेत्र कमल के सामान हैं तथा शिव की भद्दी एवं बड़ी-बड़ी, तुम्हारे शरीर में उत्तम चन्दन का अंगराग होगा और शिव के अंग में चिता भस्म। तुम्हारे शरीर में उत्तम साड़ी हैं और कहाँ शिव के शरीर में मृत पशु के चर्म। तुम्हारे अंग में दिव्य आभूषण तथा कहाँ शिव के शरीर में सर्प, कहाँ तुम्हारे अनगिनत सेवक तथा शिव के संग भयंकर भयभीत करने वाले भूत-प्रेत, तुम्हारा यह उत्तम रूप शिव के योग्य कदापि नहीं हैं। यदि उनके पास धन होता तो वे नंगे क्यों रहते? सवारी उनकी बैल ही क्यों हैं? और साथ ही कोई दूसरी सामग्री भी नहीं हैं, विवाह देने योग्य वर जैसे उनमें कोई गुण ही नहीं हैं। काम को भी उन्होंने भस्म कर दिया हैं, संभवतः तुमने तुम्हारे प्रति आदर या अनादर यह तो देख ही लिया होगा, तुम्हारा त्याग कर वे अन्यत्र चले गए हैं। उनकी कोई जाती नहीं हैं, विद्या तथा ज्ञान का भी लोप हैं उनमें, पिशाच ही उनके सहायक हैं, वे सर्वदा ही अकेले रहने वाले तथा विरक्त हैं, तुम्हें अपने मन को उनके संग नहीं जोड़ना चाहिये।”

वृद्ध ब्राह्मण का वास्तविक रूप में पार्वती को परिचय देना तथा वरदान।

यह सब सुन पार्वती शिव निंदा करने वाले पर कुपित हो गई और बोलीं! “अब तक तो मैंने समझा था की कोई ज्ञानी महात्मा का मेरे आश्रम में आगमन हुआ हैं, अब तो आपकी कलाई खुल गयी हैं, आपसे मैं क्या कहूँ आप तो अवध्य ब्राह्मण हैं। आपने जो कुछ कहाँ हैं वह सब मुझे ज्ञात हैं। आप शिव को जानते ही नहीं, नहीं तो आप इस तरह के निराधार बुद्धि-विरुद्ध बातें नहीं करते, कभी-कभी महेश्वर लीला वश अद्भुत भेष धारण करते हैं, वे साक्षात पर-ब्रह्म हैं। आप ब्राह्मण का भेष धारण कर मुझे ठगने हेतु उद्धत हो, अनुचित तथा असंगत युक्तियों का सहारा लेकर, छल-कपट युक्त बातें बोल रहें हैं तथा कहते हैं की मैं भगवान शिव के स्वरूप को भली प्रकार से जानती हूँ।” ऐसा कहकर पार्वती चुप हो गई, और निर्विकार चित से भगवान शिव का ध्यान करने लगी। पार्वती की इस प्रकार बात सुनकर जैसे ही ब्राह्मण कुछ कहने हेतु उद्धत हुआ, वैसे ही शिव निंदा सुनने की इच्छा से उन्होंने अपनी सखी से कहा! “इस अधम ब्राह्मण को यत्न-पूर्वक रोको, यह केवल शिव की निंदा ही करेगा, जो उनकी निंदा सुनता हैं वह भी पाप का भागी होता हैं। ब्राह्मण होने के कारण इसका वध करना उचित नहीं हैं, अतः इसका त्याग कर देना चाहिये। इस स्थान का त्याग कर हम किसी और स्थान पर चेले जायेंगे, जिससे भविष्य में इसका पुनः मुंह न देखना पड़े।”
जैसे ही पार्वती अन्यत्र जाने हेतु उठी, भगवान शिव ने साक्षात् रूप में उनके सनमुख प्रकट होकर उनका हाथ पकड़ लिया। इस पर पार्वती ने लज्जा वश अपना मुंह निचे कर लिया। भगवान शिव, पार्वती से बोले! “मुझे छोड़ कर कहा जाओगी? मैं प्रसन्न हूं वर मांगो, आज से मैं तपस्या के मोल से ख़रीदा हुआ तुम्हारा दास हूँ। तुम तो मेरी सनातन पत्नी हो, तुम्हारे सौन्दर्य ने मुझे मोह लिया हैं। मैंने नाना प्रकार से तुम्हारी परीक्षा ली हैं, लोक लीला का अनुसरण करने वाले मुझ स्वजन को क्षमा कर दो, मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ। तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा वर।” इस प्रकार भगवान शिव के वचनों को सुनकर पार्वती आनंद मग्न हो गई, उनका समस्त कष्ट मिट गया, सारी थकावट दूर हो गयी। ” भगवान शिव के स्वरूप का दर्शन कर पार्वती को बड़ा ही हर्ष हुआ, उनका मुख प्रसन्नता से खिल गया।

पार्वती का भगवान शिव से उनके पिता हिमवान के पास जाकर, विवाह का प्रस्ताव रखने का अनुरोध करना तथा अपने घर जाना।

पार्वती ने भगवान शिव से कहा! “आप मेरे स्वामी हैं, पूर्वकाल में आपने जिसके हेतु दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया था, उसे कैसे भुला दिया? मैं वही सती हूँ तथा आप वही शिव हैं, यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें। आप मेरे पिता के पास जाकर याचक बनाकर, उनसे मेरी याचना करें तथा मेरे गृहस्थ आश्रम को सफल करें। मेरे पिता हिमवान यह भली प्रकार से जानते हैं की उनकी पुत्री शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तप कर रहीं हैं।” पार्वती की बात सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए तथा कहा! “मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु मुझे परतंत्र बना दिया गया हैं, समस्त कर्मों को करने वाली प्रकृति एवं महा-माया तुम्ही हो तथा यह चराचर जगत तुम्हारे द्वारा ही रचा गया हैं। तुम्हीं सत्व-रज-तमो गुणमयी त्रिगुणात्मिका सूक्ष्म प्रकृति हो, सदा निर्गुण तथा सगुन भी हो, मैं यहाँ सम्पूर्ण भूतों का आत्मा, निर्विकार और निरीह हूँ। केवल भक्तों की इच्छा से मैंने शरीर धारण किया हैं, मैं भिक्षुक होकर तुम्हारे पिता हिमवान के समक्ष जाकर तुम्हारी याचना नहीं कर सकता हूँ। तुम जो भी चाहो वह मुझे करना ही हैं, अब तुम्हारी जैसे इच्छा हो, वैसा करो।”

पार्वती ने कहा! “नाथ आप आत्मा हैं और मैं प्रकृति हूँ, यह सत्य ही हैं। आप मेरे हेतु याचना करें तथा मेरे पिता को दाता बनने का सौभाग्य प्रदान करें, आप मुझ पर कृपा करें। आप परब्र-हम परमात्मा, निर्गुण, प्रकृति से परे, निर्विकार, निरीह तथा स्वतंत्र हैं, परन्तु भक्तों के उद्धार हेतु आप सगुन भी हो जाते हैं।” ऐसा कहकर देवी पार्वती हाथ जोड़कर शिव जी के सामने खड़ी हो गई, इस पर उन्होंने हिमवान के पास याचक बनना स्वीकार कर लिया तथा वहां से अंतर्ध्यान होकर कैलाश चले गए। वहां जाकर उन्होंने नंदी आदि गणो को सारा वृतांत सुनाया, जिसे सुनकर वहां सभी बहुत प्रसन्न हुए।

पार्वती के अपने पितृ-गृह वापस आने पश्चात, नट रूप धारण कर भगवान शिव का हिमवान तथा मेनका के पास जाना तथा पार्वती को भिक्षा स्वरूप प्रदान करने की प्रार्थना करना।

इसके पश्चात पार्वती अपने सखियों के साथ अपने पिता हिमवान के पास चली गई, जिसके कारण उनके माता-पिता एवं भाइयों को बड़ा ही हर्ष हुआ। एक दिन जब गिरिराज गंगा स्नान हेतु गए, भगवान शिव एक नाचने वाले भिक्षुक नट रूप में मेनका के सामने गए, उन्होंने दाहिने हाथ में सींग तथा बाएं हाथ में डमरू ले रखा था। उन्होंने नाना प्रकार के नृत्य किये तथा मनोहर गीत का भी गान किया, डमरू-शंख बजाय, नाना प्रकार की मनोहर लीला की। उनके गीत को सुनने वहां सभी नगर-वासी आयें तथा मोहित हुए, मेनका भी मोहित हुई, उधर उन्होंने पार्वती के हृदय में साक्षात् दर्शन भी दिया। मेनका ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक नाना रत्न इत्यादि प्रदान की, परन्तु भगवान शिव ने स्वीकार नहीं किया; वे भिक्षा में उनकी पुत्री को मांगने लगे तथा और अधिक सुन्दर नृत्य, गान करने लगे। इसपर मेनका बहुत क्रोधित हुई तथा उन्हें डांटने-फटकारने लगी। इतने में हिमवान स्नान कर वापस आयें तथा आँगन में उस नट को देखा, मेनका की बातें सुनकर उन्हें बड़ा ही क्रोध आया। उन्होंने अपने सेवकों को आज्ञा दी की वह उस नट को बहार निकाल दे, परन्तु उन्होंने कोई भी बहार नहीं निकाल सका। तदनंतर, नाना प्रकार की लीलाओं में विशारद उन भगवान शिव ने भिक्षुक रूप में हिमवान को अपना प्रभाव दिखाना प्रारंभ किया। उस समय हिमवान ने देखा की वह भिक्षुक एक क्षण में ही भगवान विष्णु के रूप में परिणति हो गए, इसके पश्चात उन्होंने उस भिक्षुक को जगत सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी के रूप में देखा, इसके पश्चात सूर्य के रूप में देखा। इसके पश्चात रुद्र के रूप में प्रकट हुए जिसके साथ पार्वती भी थीं। इस तरह हिमवान ने उस नट में बहुत से रूप दिखे, जिससे उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ, तदनंतर, भगवान शिव ने पार्वती को भिक्षा के रूप में माँगा। परन्तु, हिमवान ने नट के प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया, उन्होंने भी और कोई वास्तु स्वीकार नहीं की और अंततः वहां से अंतर्ध्यान हो गए। हिमवान तथा मेनका को ज्ञान हुआ की भगवान शिव ही उन्हें माया से मोहित कर अपने स्थान को चले गए, तदनंतर दोनों शिव के परम भक्ति में लीन हो गए।

भगवान शिव का वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के पास जाकर, शिव-निंदा करते हुए पार्वती का हाथ उनके हाथों में न देने का परामर्श देना।

मेनका तथा हिमवान की परम भक्ति को देखकर बृहस्पति तथा ब्रह्मा जी इत्यादि समस्त देवता शिव जी के पास गए तथा उन्हें प्रणाम कर मेनका तथा हिमवान की शिव भक्ति के विषय में बताया, साथ ही उनसे निवेदन किया कि! वे पार्वती का पाणिग्रहण शीघ्र करें। भगवान शिव ने सभी देवताओं को आश्वासन देकर विदा किया, देवता भी समझ गए की उनकी विपत्ति बहुत ही शीघ्र ही समाप्त होने वाली हैं तथा वे अपने-अपने निवास स्थान को लौट गए। एक दिन भगवान शिव, हाथ में दंड, छत्र, दिव्य वस्त्र धारण कर हिमवान के पास गए, वे ललाट में उज्ज्वल तिलक, हाथ में स्फटिक माला तथा गले में शाल-ग्राम धारण किये हुए, साधु वेश धारी ब्राह्मण जैसे प्रतीत हो रहें थे। उन्हें देखकर हिमवान ने आदरपूर्वक उनका सत्कार किया, पार्वती उन्हें देखकर ही पहचान गई थीं की वे शिव हैं। गिरिराज ने उनका कुशल-समाचार पूछा! ब्राह्मण ने बताया की वह उत्तम वैष्णव विद्वान-ब्राह्मण हैं तथा ज्योतिष वृत्ति का आश्रय लेकर भूतल पर भ्रमण करते हैं। गुरु द्वारा प्रदत्त शक्ति युक्त हो वे सर्वत्र जाने में समर्थ हैं, परोपकारी, शुद्धात्मा, दया के सागर तथा विकार नाशक हैं।

ब्राह्मण ने हिमवान तथा मेनका से कहा! "उन्हें यह ज्ञात हुआ हैं की हिमवान अपने सुलक्षणा पुत्री को आश्रय रहित, असंग, कुरूप और गुणहीन महादेव के हाथों में प्रदान करना चाहते हैं। वे तो मरघट में वास करते हैं, देह में सांप लपेटे रहते हैं और योग साधते फिरते हैं, उनके पास वस्त्र तो हैं ही नहीं, नंग-धड़ंग घूमते रहते हैं। उनके कुल का किसी को ज्ञात नहीं हैं, कुपात्र और कुशील हैं, स्वभावतः विहार से दूर रहते हैं, शरीर में भस्म रमते हैं, क्रोधी और अविवेकी हैं। जटा का बोझ मस्तक में धारण किये रहते हैं, भूत-प्रेत इत्यादि को आश्रय देते हैं, भ्रमणशील, भिक्षुक, कुमार्ग-परायण तथा हठपूर्वक वैदिक मार्ग का त्याग करने वाले हैं। ऐसे अयोग्य वर को आप अपनी पुत्री क्यों प्रदान करना चाहते हैं? आपका यह विचार मंगल दायक नहीं हो सकता हैं। आप नारायण के कुल में उत्पन्न हैं, शिव इस योग्य नहीं हैं की उसके हाथ में पार्वती को दिया जाये, वे सर्वथा निर्धन हैं।" ऐसा कहकर वे ब्राह्मण देवता खा-पीकर वहां से आनंदपूर्वक चले गए।

ब्राह्मण के विचारों का मेनका के ऊपर बड़ा ही प्रभाव पड़ा, दुःखी होकर उन्होंने हिमवान से कहा! “यह सब सुनकर मेरा मन शिव के प्रति बहुत खिन्न एवं विरक्त हो गया हैं। रुद्र के रूप में शील और नाम सभी कुत्सित हैं, मैं उन्हें अपनी कन्या नहीं दूंगी, आप यदि मेरी बात नहीं माने तो मैं मर जाऊंगी। पार्वती के गले में फांसी लगाकर या उसे सागर में डुबोकर, गहन वन में चली जाऊंगी, परन्तु पार्वती का विवाह इस वर के साथ नहीं करूँगी।” भगवान शिव को जब यह ज्ञात हुआ, उन्होंने अरुंधती सहित सप्त-ऋषियों को बुलवाया तथा मेनका को समझाने की आज्ञा दी।

सप्त-ऋषियों तथा अरुंधती का हिमालय के पास जाकर उन्हें तथा उनकी पत्नी मेनका को समझाना।

भगवान शिव की आज्ञा अनुसार सप्त-ऋषि गण, हिमवान के घर पधारें, उनके नगर की ऐश्वर्य को देखकर वे उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे। हिमवान ने सप्त-ऋषियों को देख आदर के साथ हाथ जोड़कर, मस्तक झुका कर उन्होंने प्रणाम किया, इसके पश्चात बड़े सम्मान के साथ उनकी पूजा की। हिमवान ने उन्हें उत्तम आसनों पर बैठाया तथा उनसे उनके गृह में आगमन का कारण पूछा। ऋषि-गण बोले! भगवान शिव जगत के पिता हैं और शिवा (पार्वती) जगन्माता हैं, तुम्हें शिव जी को अपनी कन्या का दान करना चाहिये, इससे तुम्हारा जन्म सफल जो जायेगा।” इस पर हिमालय बोले! “वह इस परम तथ्य के ज्ञाता थे, उन्होंने मन-आत्मा से इसे स्वीकार कर रखा था। परन्तु एक वैष्णव वृत्ति के ब्राह्मण ने आकर बहुत सी बातें कहीं, तभी से मेनका का ज्ञान भ्रष्ट हो गया हैं। वे भारी हठ कर, मैले वस्त्र धारण कर अत्यंत कोप कर बैठीं हैं, और किसी के समझाने पर भी नहीं समझ रही हैं। वैष्णव ब्राह्मण की बातें सुनकर अब भिक्षुक रूप-धारी शिव को, मैं अपनी पुत्री का दान नहीं करना चाहता।” ऋषियों से ऐसा हिमवान चुप हो गए।

ऋषि-गणो ने अरुंधती को मेनका के पास भेजा; देवी अरुंधती ने पार्वती तथा मेनका को एक साथ देखा। मेनका शोक से व्याकुल हो पृथ्वी पर पड़ी थी, तदनंतर अरुंधती देवी ने सावधानी के साथ मधुर तथा हितकर बातें कही! “मैं अरुंधती तथा सप्त-ऋषि गण तुम्हारे गृह में पधारे हैं, उठो।” यह सुन मेनका उठी और मस्तक झुका कर बोलीं! “आप किस हेतु यहाँ आई हैं? आज मेरा जन्म सफल हो गया जो ब्रह्मा जी की पुत्र वधु मेरे घर पर आई हैं। मैं आपकी दासी के सामान हूँ, आप आज्ञा दे।” अरुंधती ने उन्होंने बहुत अच्छी तरह समझाया-बुझाया तथा अपने साथ लेकर उस स्थान पर आयी, जहाँ पर सप्त-ऋषि गण विराजमान थे। तदनंतर, वार्तालाप में निपुण सप्त-ऋषियों ने हिमवान तथा मेनका को समझाना प्रारंभ किया ! “हमारे शुभ कारक वचन सुनो! तुम पार्वती का विवाह शिव के संग करो तथा संहारकर्ता शिव के श्वसुर बनो। वे सर्वेश्वर हैं, वे किसी से याचना नहीं करते हैं, स्वयं ब्रह्मा जी ने तारकासुर के वध हेतु भगवान शिव से विवाह करने की प्रार्थना की हैं। वे विवाह हेतु उत्सुक नहीं हैं, वे तो योगियों के शिरोमणि हैं केवल ब्रह्मा जी के प्रार्थना के कारण वे पार्वती से विवाह करना चाहते हैं। तुम्हारी पुत्री ने भी उन्हें ही वर रूप में प्राप्त करने हेतु बहुत कठोर तप किया तथा भगवान शिव को प्रसन्न किया।”


इस प्रकार ऋषियों की बातें सुनकर हिमवान हंस पड़े और भयभीत हो विनयपूर्वक बोले! “मैं शिव के पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देखता हूँ, न ही उनका भवन हैं और न ही ऐश्वर्य, न ही बंधु-बांधव और न ही कोई स्वजन। मैं अत्यंत निर्लिप्त योगी को अपनी पुत्री नहीं देना चाहता हूँ, आप लोग वेद-विधाता ब्रह्मा जी के पुत्र हैं, आप ही निश्चय कर कहिये; जो पिता अपात्र को लोभ-मोह वश अपनी कन्या देता हैं, वह नरक में जाता हैं। अतः मैं स्वेच्छा से शिव को अपनी कन्या नहीं दूंगा, इस हेतु जो उचित विधान हो, उसे आप लोग करें।"
इस पर वशिष्ठ मुनि ने हिमालय से कहा! “तुम्हारे लिए हितकारक, धर्म के अनुकूल, सत्य तथा इहलोक और परलोक में सुख कारक वचन कहता हूँ सुनो! लोक तथा वेदों में तीन प्रकार के वचन उपलब्ध होते हैं, एक तो वह वचन हैं जो तत्काल सुनने में बड़ा ही प्रिय लगता हैं, परन्तु पीछे वह बड़ा ही असत्य तथा अहितकारी होता हैं। दूसरा वह हैं जो आरंभ में बुरा लगता हैं, परन्तु परिणाम में वह सुख-प्रदायी होता हैं। तीसरा वचन, सुनते ही अमृत के सामान लगता हैं और सभी कालों में सुख देने वाला होता हैं, सत्य ही उसका सार होता हैं। ऐसा वचन सर्वाधिक श्रेष्ठ तथा सभी के लिए अभीष्ट हैं, इन तीनों में से कौन सा वचन तुम्हारे हेतु सर्वश्रेष्ठ हैं बताओ, मैं तुम्हारे निमित्त वैसा ही वचन कहूँगा।
भगवान शिव सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी हैं, उनके पास वाह्य संपत्ति नहीं हैं, सर्वदा ही उनका चित्त ज्ञान के महासागर में मग्न रहता हैं, वे सबके ईश्वर हैं। उन्हें लौकिक तथा वाह्य वस्तुओं की क्या आवश्यकता हैं? किसी दीन-दुःखी को कन्या दान करने से पिता कन्या घाती होता हैं, धन-पति कुबेर जिनके किंकर हैं, जो अपनी लीलामात्र से संसार की सृष्टि तथा संहार करने में समर्थ हैं, जिन्हें गुणातीत, परमात्मा और प्रकृति से परे परमेश्वर कहा गया हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र रूप धारण करते हैं, उन्हें कौन निर्धन तथा दुःखी कह सकता हैं? ब्रह्म लोक में निवास करने वाले ब्रह्मा तथा क्षीर सागर में शेष नाग की शय्या पर शयन करने वाले विष्णु तथा कैलाश वासी रुद्र, यह सभी भगवान शिव की ही विभूतियाँ हैं। पार्वती कल्पान्तर में दक्ष पुत्री 'सती' नाम से विख्यात थीं तथा रुद्र को इन्होंने ही पति रूप में प्राप्त किया था, दक्ष ने स्वयं उन्हें अपनी कन्या का दान किया था। वही दक्ष कन्या, सती अब तुम्हारे घर में प्रकट हुई हैं, वे जन्म-जन्मान्तर में शिव की ही पत्नी होती हैं। भगवान शिव, सती के चिता भस्म को ही प्रेम-पूर्वक अपने शरीर में धारण किये रहते हैं, तुम्हें स्वेच्छा से अपनी पुत्री को भगवान शिव के हाथों में अर्पण करना चाहिए। तुम्हारी पुत्री के प्रार्थना करने के कारण ही भगवान शिव तुम्हारे पास याचना करने आयें थे तथा तुम दोनों ने शिव भक्ति में मन लगाकर उस याचना को स्वीकार कर लिया था। ऐसा क्या हुआ की तुम्हारी बुद्धि विपरीत हो गई हैं?”

नाना प्रकार से वशिष्ठ जी ने हिमवान तथा मेनका को नाना प्रकार से समझाया की वे अपनी कन्या पार्वती का विवाह शिव के साथ कर दे तथा चुप हो गए।

हिमवान द्वारा नाना पर्वतों से मार्गदर्शन हेतु निवेदन करना तथा पार्वती को शिव के हाथों में देने का निर्णय।

हिमवान ने मेरु, सह्य, गंधमादन, मंदराचल, मैयाक, विन्ध्याचल इत्यादि पर्वतों से निवेदन किया कि! वशिष्ठ जी ऐसा कह रहे हैं; आप लोग मन से उचित-अनुचित का निर्णय कर उनका मार्गदर्शन करें। इस प्रकार हिमवान की प्रार्थना पर सभी पर्वतों ने कहा! “इसमें निर्णय करने हेतु कुछ नहीं हैं, जैसा ऋषि गण कहते हैं वैसा ही कार्य करना चाहिये। यह कन्या पूर्व जन्म की सती हैं तथा देवताओं के कार्य सिद्धि हेतु इन्होंने आपके घर में जन्म धारण किया हैं, यह साक्षात शिव की ही पत्नी हैं।” यह बात सुनकर मेनका और हिमालय मन ही मन प्रसन्न हुए, अरुंधती ने भी विविध प्रकार के इतिहास का वर्णन कर मेनका को समझाया, जिससे दोनों पति-पत्नी का भ्रम दूर हो गया। तदनंतर दोनों ने हाथ जोड़कर ऋषियों से कहा कि उनकी कन्या भगवान रुद्र का ही भाग हैं तथा उन्होंने उन्हें ही देने का निश्चय किया।

गिरिराज हिमवान ने उत्तम मांगलिक कार्य हेतु, विवाह लग्न का सप्त-ऋषियों से विचार कराकर, उन्हें विदा किया। सप्त-ऋषि गण, भगवान शिव के पास गए और उन्हें अवगत करवाया की हिमवान ने पार्वती का वाग्दान कर दिया हैं, अब आप पार्षदों तथा देवताओं के साथ विवाह हेतु प्रस्थान करें तथा वेदोक्त रीति के अनुसार पार्वती का पाणिग्रहण करें। यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए तथा ऋषियों से बोले! “विवाह के विषय में मैं कुछ नहीं जनता हूँ, आप लोग जैसा उचित समझे वैसा करें।” ऋषियों ने उन्हें भगवान विष्णु को उनके पार्षदों सहित, इंद्र, समस्त ऋषियों, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, विद्याधर इत्यादि को बुलवा लेने हेतु कहा, जो उनके विवाह के कार्य को साध लेंगे। यह कहकर सभी सप्त-ऋषि अपने धाम में चले गए।

वहां हिमवान ने अपने बन्धु-बांधवों को आमंत्रित कर, अपने पुरोहित गर्ग जी से बड़े हर्ष के साथ लग्न पत्रिका लिखवाई तथा उस पत्र को उन्होंने भगवान शिव के पास भेजा। हिमवान ने नाना देशों में रहने वाले स्वजनों तथा बंधुओं को लिखित निमंत्रण भेजा। इसके पश्चात वे नाना प्रकार के विवाह सामग्रियों का संयोग करने में लग गए, सभी आगंतुकों हेतु नाना प्रकार के व्यंजन निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया। हिमवान के घर की स्त्रियों ने पार्वती का संस्कार करवाया, नाना प्रकार के आभूषणों से उन्हें सजाया, मांगलिक उत्सवों का आयोजन किया गया। हिमालय-राज के घर निमंत्रित अतिथियों का आना प्रारंभ हो गया तथा नाना प्रकार के उत्सव होने लगे। इस शुभ अवसर पर हिमवान ने अपने भवन के साथ सम्पूर्ण नगर में मनोरम सजावट की तथा विश्वकर्मा से दिव्य मंडप और भवनों का निर्माण करवाया।

हिमवान का भगवान शिव के पास लग्न-पत्रिका भेजना और समस्त देवताओं, अन्य लोगों तथा अपने गणो के साथ बारात लेकर पार्वती से विवाह हेतु निकलना।

नारद जी द्वारा तीनों लोकों में सभी को शिव-विवाह का निमंत्रण।

हिमवान के घर से भगवान शिव को लग्न पत्रिका भेजी गई, जिसे उन्होंने विधिपूर्वक बांच कर हर्ष के साथ स्वीकार किया तथा लग्न-पत्रिका लाने वालों का यथोचित आदर-सम्मान कर, उन्हें विदा किया। तदनंतर, शिव जी ने ऋषियों से कहा की! "आप लोगों ने उनके कार्य का भली प्रकार से संपादन किया, अब उन्होंने विवाह स्वीकार कर लिया हैं, अतः सभी को विवाह में चलना चाहिये।" तदनंतर, भगवान शिव ने नारद जी का स्मरण किया, जिस कारण वे तक्षण ही वहां उपस्थित हुए। भगवान शिव ने उनसे कहा! नारद! तुम्हारे उपदेश से ही पार्वती ने कठोर तपस्या कर मुझे संतुष्ट किया हैं तथा मैंने उनका पति रूप से पाणिग्रहण करने का निश्चय किया। सप्त-ऋषियों ने लग्न का साधन और शोधन कर दिया हैं, आज से सातवें दिन मेरा विवाह हैं। इस अवसर पर मैं लौकिक रीति का आश्रय लेकर महान उत्सव करूँगा, तुम भगवान विष्णु आदि सब देवताओं, मुनियों, सिद्धों तथा अन्य लोगों को मेरे ओर से निमंत्रित करो।" भगवान शिव की आज्ञानुसार नारद जी ने तीनों लोकों में सभी को शिव-विवाह का निमंत्रण दिया तथा अंततः कैलाश पर लौट आयें।


भगवान शिव के सभी गण भारी उत्सव माना रहें थे, भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी जी के साथ आपने पार्षदों सहित, साथ ही ब्रह्मा जी अपने गणो के साथ कैलाश पर आयें। समस्त लोकपाल भी अपनी पत्नियों के साथ सज-धज कर कैलाश पर आयें; मुनि, नाग, सिद्ध, उप-देवता तथा अन्य लोग भी कैलाश पर गए तथा शिव-गणो के साथ उत्सव मनाने लगे। भगवान शिव ने अपने स्वाभाविक भेष के अनुसार ही नाना आभूषणों को धारण किया, उनका स्वरूप बड़ा ही आकर्षक था। कैलाश पर उपस्थित सभी उनके विवाह में जाने हेतु तैयार हुए, भगवान विष्णु ने शिव जी से कहा! “गृह-सुत्रोक्त विधि के अनुसार आप पार्वती से विवाह करें, जिससे यह विधि लोक-विख्यात हो जाये तथा अपने कुलधर्म के अनुसार मंडप-स्थापन एवं नंदी-मुख श्राद्ध भी करें।” भगवान विष्णु के कथन अनुसार शिव जी ने विधिपूर्वक समस्त कार्य किये, उनके समस्त कार्य स्वयं ब्रह्मा जी तथा उनके नाना महर्षि पुत्र आभ्युदयिक करने लगे। सभी ऋषियों ने बड़े हर्ष के साथ बहुत से मांगलिक कार्य किये, विघ्नों के शांति हेतु ग्रहों और समस्त मंडलवर्ती देवताओं का पूजन किया गया। समस्त प्रकार के लौकिक, वैदिक कर्म यथोचित रीति से कर भगवान शिव बहुत संतुष्ट हुए, तदनंतर वे ऋषियों तथा देवताओं को आगे कर कैलाश से हिमवान के घर जाने हेतु निकले। उन्होंने अपने कुछ गणो को कैलाश पर ही ठहरने तथा बाकी गणो को हिमालय की नगरी की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया।

शिव बारात के निमित्त शिव-गणो, देवताओं, सिद्धों, क्षेत्रपालों आदि बारातियों का कैलाश से प्रस्थान।

अपने स्वामी द्वारा आदेश पाकर, सभी प्रमथ इत्यादि गण, भूत-प्रेतों के संग महान उत्सव करते हुए चले। नंदी, भैरव एवं क्षेत्रपाल असंख्य गणो के साथ भारी उत्सव मानते हुए चले, वे सभी अनेक हाथों से युक्त थे, सर पर जटा, उत्तम भस्म तथा रुद्राक्ष इत्यादि आभूषण धारण किये हुए थे। चंडी देवी, रुद्र के बहन रूप में उत्सव मानते हुए माथे पर सोने का कलश धारण किये हुई थीं, वे अपने वाहन प्रेत पर आरूढ़ थीं। उस समय डमरुओं के घोष, भेरियों की गड़गड़ाहट तथा शंख-नाद से तीनों लोक गूंज उठा था, दुन्दुभियों की ध्वनि से महान कोलाहल हो रहा था। समस्त देवता, शिव गणो के पीछे रहकर बरात का अनुसरण कर रहें थे, समस्त लोकपाल तथा सिद्ध-गण भी उन्हीं के साथ थे। देवताओं के मध्य में गरुड़ पर विराज-कर भगवान विष्णु चल रहें थे, उनके पार्षदों ने उन्हें नाना आभूषणों से विभूषित किया था, साथ ही ब्रह्मा जी भी वेद-पुराणों के साथ थे। शाकिनी, यातुधान, बेताल, ब्रह्म-राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, प्रमथ, गन्धर्व, किन्नर बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार की ध्वनि करने हुए चल रहें थे। देव-कन्याएँ, जगन्माताऍ तथा अन्य देवांगनाएँ बड़ी प्रसन्नता के साथ शिव जी के विवाह में सम्मिलित होने हेतु आयें थे।

सर्वप्रथम शिव जी ने नारद जी को हिमालय के घर भेजा, वे वहां की सजावट देखकर दांग रह गए। देवताओं, अन्य लोगों तथा अपने गणो सहित भगवान शिव हिमालय के नगर के समीप आयें, हिमालय ने नाना पर्वतों तथा ब्राह्मणों को उनसे वार्तालाप करने तथा अगवानी हेतु भेजा। समस्त देवताओं को भगवान शिव के बरात में देखकर हिमालय-राज को बड़ा ही विस्मय हुआ तथा वे अपने आप को धन्य मानने लगे। शिव जी को अपने सामने देखकर हिमवान ने उन्हें प्रणाम किया, साथ ही पर्वतों तथा ब्राह्मणों ने भी उनकी वंदना की। शिव जी अपने वाहन वृषभ पर आरूढ़ थे, उनके बाएं भाग में भगवान विष्णु तथा दाहिने भाग में ब्रह्मा जी थे। हिमवान ने अन्य सभी देवताओं को भी मस्तक झुकाया, तत्पश्चात शिव जी की आज्ञा से वे सभी को अपने नगर में ले गए।

मेनका के शिव (वर रूप) दर्शन की इच्छा तथा नारद जी को इस निमित्त कहना तथा उनके भयानक रूप को देख कर मूर्छित होना।

इस अवसर पर मेनका के मन में भगवान शिव के दर्शन की इच्छा हुई तथा उन्होंने नारद जी को बुलवाया तथा उनसे कहने लगी कि! पार्वती ने जिसके हेतु कठोर तप किया, सर्वप्रथम मैं उन शिव को देखूंगी। भगवान शिव, मेनका के मन के अहंकार को समझ गए थे, इस कारण उन्होंने श्री विष्णु तथा ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं को पहले ही भवन में प्रवेश करा दिया तथा स्वयं पीछे से आने का निश्चय किया।

इस उद्देश्य से मेनका अपने भवन के ऊपर नारद जी संग गई एवं बारात को भली प्रकार से देख रहीं थीं। प्रत्येक दल के स्वामी को देखकर मेनका, नारद जी से पूछती थीं, क्या यह ही शिव हैं? तथा नारद जी उत्तर देते थे कि यह तो शिव के सेवक हैं। मेनका मन ही मन आनंद से विभोर हो सोचने लगती, जिसके सेवक इतने सुन्दर हैं उनके स्वामी पता नहीं कितने सुन्दर होंगे। भगवान विष्णु के अद्भुत स्वरूप को देखकर मेनका को लगा की "अवश्य ही वे भगवान शिव हैं, इसमें संशय नहीं हैं।" इस पर नारद जी ने कहा! “वे भी पार्वती के वर नहीं हैं, वे तो केशव श्री हरी विष्णु हैं। पार्वती के वर तो इनसे भी अधिक सुन्दर हैं, उनकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता हैं। इस पर मेनका ने अपने आप को बहुत ही सौभाग्यशाली मना, जिसने पार्वती को जन्म दिया, वे इस प्रकार सोच ही रहीं थी की भगवान शिव सामने आ गए। उनकी तथा उनके गणो की भेष-भूषा तथा स्वरूप उनके अभिमान को चूर-चूर करने वाले थे, नारद जी ने भगवान शिव को इंगित कर मेनका को बताया की वे ही पार्वती के पति भगवान शिव हैं। सर्वप्रथम मेनका ने भूत-प्रेतों से युक्त नाना शिव-गणो को देखा; उनमें से कितने ही बवंडर का रूप धारण किये हुए, टेढ़े-मेंढ़े मुखाकृति और मर्मर ध्वनि करने वाले थे। प्रायः सभी बहुत ही कुरूप स्वरूप वाले थे, कुछ विकराल थे, किन्हीं का मुंह दाढ़ी-मूंछ से भरा हुआ था, बहुत से लंगड़े थे तो कई अंधे, किसी की एक से अधिक आँख थे तो किसी की एक भी नहीं, कोई बहुत हाथ तथा पैर वाले थे तो कुछ एक हाथ एवं पैर युक्त। वे सभी गण दंड, पाश तथा मुद्गर इत्यादि धारण किये हुए बारात में आयें थे, कोई वाहन उलटे चला रहे थे, कोई सींग युक्त थे, कई डमरू तथा गोमुख बजाते थे, कितने ही गण मस्तक विहीन थे। कुछ एक के उलटे मुख थे तो किसी के बहुत से मुख थे, किन्हीं के बहुत सारे कान थे, कुछ तो बहुत ही डरावने दिखने वाले थे, वे सभी अद्भुत प्रकार की भेष-भूषा धारण किये हुए थे। वे सभी गण बड़े ही विकराल स्वरूप वाले तथा भयंकर थे, जिनकी कोई संख्या नहीं थीं। नारद जी ने उन सभी गणो को मेनका को दिखाते हुए कहा! पहले आप भगवान शिव के सेवकों को देखे, तदनंतर उनके भी दर्शन करना। परन्तु, उन असंख्य विचित्र-कुरूप-भयंकर स्वरूप वाले भूत-प्रेतों को देखकर मेना (मेनका) भय से व्याकुल हो गई।

इन्हीं गणो के बीच में भगवान शिव अपने वाहन वृषभ पर सवार थे, नारद जी ने अपनी उँगली से इंगित कर उन्हें मेनका को दिखाया। उनके पञ्च मुख थे और सभी मुख पर ३ नेत्र थे, मस्तक पर विशाल जटा समूह था। उन्होंने शरीर में भस्म धारण कर रखा था, जो उनका मुख्य आभूषण हैं तथा दस हाथों से युक्त थे, मस्तक पर जटा-जुट और चन्द्रमा का मुकुट धारण किये हुए थे। वे अपने हाथों में कपाल, त्रिशूल, पिनाक इत्यादि अस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आंखें बड़े ही भयानक दिख रहीं थीं, वे शरीर पर बाघाम्बर तथा हाथी का चर्म धारण किये हुए थे। भगवान शिव का ऐसा रूप देखकर मेनका भय के मरे व्याकुल हो गई, कांपने लगी तथा भूमि पर गिर गयी एवं मूर्छित हो गई। वहां उपस्थित स्वजनों ने मेनका की नाना प्रकार की सेवा कर उन्हें स्वस्थ किया।

शिव के रुद्र रूप देखकर मेनका का विलाप तथा नारद और पार्वती को दुर्वचन कहना।

जब मेनका को चेत हुआ, तब वे अत्यंत क्षुब्ध हो विलाप करने लगी तथा अपने पुत्री को दुर्वचन कहने लगी; साथ ही उन्होंने नारद मुनि को भी बहुत उलटा-सीधा सुनाया। मेना, नारद जी से बोलीं! “शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु पार्वती को तपस्या करने का पथ तुमने दिखाया, तदनंतर हिमवान को भी शिव-पूजा करने का परामर्श दिया, इसका फल ऐसा अनर्थकारी एवं विपरीत होगा यह मुझे ज्ञात नहीं था। दुर्बुद्धि देवर्षि ! तुमने मुझे ठग लिया हैं, मेरी पुत्री ने ऐसा तप किया जो महान मुनियों के लिए भी दुष्कर हैं, इसका उसे ऐसा फल मिला? यह सभी को दुःख में ही डालने वाला हैं। हाय! आब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे जीवन का नाश हो गया हैं, मेरा कुल भ्रष्ट हो गया हैं, वे सभी दिव्य सप्त-ऋषि कहा गए? उनकी तो मैं दाड़ी-मूँछ नोच लुंगी, वसिष्ठ जी की पत्नी भी बड़ी ही धूर्त निकली। पता नहीं किस अपराध से मेरा सब कुछ नष्ट हो गया हैं।”

तदनंतर, वे पार्वती की ओर देखकर दुर्वचन कहने लगी! “आरी दुष्ट ! तूने यह क्या किया? मुझे दुःखी किया हैं, तूने सोना देकर कांच का क्रय किया, चन्दन छोड़कर अपने अंगों में कीचड़ लगाया हैं। प्रकाश की लालसा में सूर्य को छोड़कर जतन कर जुगनू को पकड़ा हैं, गंगा जल का त्याग कर कुएं का जल पिया हैं, सिंह का सेवन छोड़कर सियार के पास गई हैं। घर में रखी हुई यश की मंगलमयी विभूति का त्याग कर चिता की अमंगल भस्म अपने पल्लू में बंधा हैं, तुमने सभी देवताओं को छोड़कर, शिव को पाने के लिए इतना कठोर तप किया हैं! तुझको धिक्कार हैं! धिक्कार हैं! तपस्या हेतु उपदेश देने वाले दुर्बुद्धि नारद तथा तेरी सखियों को धिक्कार हैं! हम दोनों माता-पिता को धिक्कार हैं, जिसने तुझ जैसी दुष्ट कन्या को जन्म दिया हैं! सप्त-ऋषियों को धिक्कार हैं! तूने मेरा घर ही जला कर रखा दिया हैं, यह तो मेरा साक्षात् मरण ही हैं। हिमवान अब मेरे समीप न आयें, सप्त-ऋषि मुझे आज से अपना मुंह न दिखाए, तूने मेरे कुल का नाश कर दिया हैं, इससे अच्छा तो यह था की मैं बाँझ ही रह जाती। मैं आज तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर, तेरा त्याग करके कही और चली जाऊंगी, मेरा तो जीवन ही नष्ट हो गया हैं।”

ऐसा कहकर मेनका पुनः मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी, उस समय सभी देवता उनके निकट गए। पुनः उनकी चेतना वापस आने पर नारद जी उनसे बोले! “आपको पता नहीं भगवान शिव का स्वरूप बड़ा ही मनोरम हैं, आपने जो देखा वह उनका यथार्थ रूप नहीं हैं। आप अपने क्रोध का त्याग कर स्वस्थ हो जाइये तथा पार्वती-शिव के विवाह में अपने कर्तव्य को पूर्ण करें।” इस पर मेना अधिक क्रोध-युक्त होकर नारद जी से बोलीं! “मुनिराज आप दुष्ट तथा अधमों के शिरोमणि हैं, आप यहाँ से दूर चले जाए।” मेनका द्वारा इस प्रकार कहने पर देवराज इंद्र तथा अन्य देवता और दिक्पाल मेनका से बोले! “तुम हमारे वचनों को प्रसन्नता पूर्वक सुनो! भगवान शिव उत्कृष्ट देवता तथा सभी को उत्तम सुख प्रदान करने वाले हैं, आपकी कन्या के तप से प्रसन्न होकर ही उन्होंने पार्वती को उत्तम वर प्रदान किया हैं। यह सुनकर मेनका देवताओं से विलाप कर कहने लगी! “उस शिव का स्वरूप बड़ा ही डरावना हैं, मैं उसके हाथों में अपनी कन्या का दान नहीं करूँगी, सभी देवता मेरी कन्या के उत्कृष्ट स्वरूप को क्यों प्रपंच कर व्यर्थ करने हेतु उद्धत हैं?" तदनंतर, मेनका के पास सप्त-ऋषि गण आयें और कहने लगे! “पितरों की कन्या मेनका, हम तुम्हारे कार्य सिद्धि हेतु आयें हैं। जो कार्य उचित हैं, उसे तुम्हारे हठ के कारण हम विपरीत क्यों मान ले? भगवान शिव देवताओं में सर्वोच्च हैं, वे साक्षात दानपात्र होकर तुम्हारे घर पर आयें हैं।” इसपर मेनका को भरी क्रोध हुआ तथा उन्होंने कहा! “मैं अपनी कन्या के अस्त्र से टुकड़े-टुकड़े कर दूंगी, परन्तु उस शिव के हाथों में अपनी पुत्री को नहीं दूंगी, तुम सब मेरे सामने से चले जाओ और कभी मेरे सामने ना आना।”

मेनका के अचल हठ देखकर विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, सप्त-ऋषियों, सनकादी मुनि, अन्य देवताओं का उन्हें शिव-तत्त्व का ज्ञान देना, पार्वती के विवाह हेतु समझाना।

पार्वती की माता के हठ त्याग न करने पर वहां हाहाकार मच गया, तदनंतर हिमवान, मेना के पास आयें और प्रेमपूर्वक नाना तत्त्वों को दर्शाते हुए उन्हें समझाने लगे। उन्होंने कहा! “तुम इस प्रकार व्याकुल क्यों हो रही हो? मेरी बातों को ध्यान पूर्वक सुनो! भगवान शिव के नाना रूपों को तुम भली प्रकार जानती हो, इसपर भी तुम उनकी निंदा क्यों कर रही हो? उनके विकट रूप को देखकर तुम घबरा गई हो, वे ही सबके पालक हैं, अनुग्रह तथा निग्रह करने वाले हैं, सबके पूजनीय हैं। पहली बार यहाँ आकर उन्होंने कैसी लीलाएं की थीं, क्या तुम्हें वह सब स्मरण नहीं है?” इसपर मेनका ने हिमवान से कहा! “आप अपनी पुत्री के गले में रस्सी बाँध कर, उसे पर्वत से निचे गिरा दीजिये या इसे ले जाकर निर्दयता पूर्वक सागर में डूबा दीजिये, मैं पार्वती को शिव के हाथों में नहीं दूंगी। यदि आपने पुत्री का दान विकट रूपधारी शिव को किया तो मैं अपना शरीर त्याग दूंगी। मेनका के इस प्रकार के वचनों को सुनकर पार्वती स्वयं अपनी माता से आकर बोलीं! “इस समय आपकी बुद्धि विपरीत कैसे हो गयी हैं? आपने धर्म का त्याग कैसे कर दिया हैं? रुद्र-देव ही सर्व उत्पत्ति के कारण-भूत साक्षात् परमेश्वर हैं, इनसे बढ़कर दूसरा कोई भी नहीं हैं। समस्त श्रुतियां उन्हें ही सुन्दर रूप वाले तथा सुखद मानते हैं, समस्त देवताओं के स्वामी हैं, केवल इनके नाम और रूप अनेक हैं। ब्रह्मा तथा विष्णु भी इनकी सेवा करते हैं, शिव ही सभी के अधिष्ठान, कर्ता, हर्ता तथा स्वामी हैं, सनातन एवं अविनाशी हैं। इनके हेतु ही सभी देवता किंकर हो आपके द्वार पर उत्सव मना रहें हैं, इससे बढ़कर और क्या हो सकता हैं? आप सुखपूर्वक उठकर मेरा हाथ उन परमेश्वर की सेवा में प्रदान करें, मैं स्वयं आपसे यह कह रहीं हूँ, आप मेरी इतनी सी विनती मान ले। यदि आपने मुझे इनके हाथों में नहीं दिया तो कभी किसी और वर का वरण नहीं करूँगी। मैंने मन, वाणी और क्रिया द्वारा स्वयं शिव का वरन किया हैं, अब आप जैसा उचित समझे करें।” इस पर वे पार्वती पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें दुर्वचन कहते हुए विलाप करने लगी।

ब्रह्मा तथा सनकादी ऋषियों ने भी उन्हें इस विषय में बहुत समझाया परन्तु वे नहीं मानी, मेनका की हठ की बात सुनकर भगवान श्री विष्णु तुरंत वह आयें तथा उन्होंने कहा! “तुम पितरों की मानसी पुत्री हो, साथ ही हिमवान की प्रिय पत्नी हो, तुम्हारा सम्बन्ध साक्षात् ब्रह्मा जी के कुल से हैं। तुम धर्म की आधार-भूता हो, फिर धर्म का त्याग क्यों कर रहीं हो? तुम भली-प्रकार से सोच-विचार करो! सम्पूर्ण देवता, ऋषि, ब्रह्मा जी तथा स्वयं मैं, हम सभी तुम्हारा क्यों अहित चाहेंगे? क्या तुम शिव को नहीं जानती हो? वे तो सगुन भी हैं और निर्गुण भी, कुरूप हैं और सुरूप भी। उनके रूप का वर्णन कौन कर पाया हैं? मैंने तथा ब्रह्मा जी ने भी उनका अंत नहीं पाया, फिर उन्हें कौन जान सकता हैं? ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यंत इस चराचर जगत में जो भी दिखाई देता हैं, वह सब शिव का ही स्वरूप हैं। वे अपनी लीला से अनेक रूपों में अवतरित होते हैं, तुम दुःख का त्याग करो तथा शिव का भजन करो, जिससे तुम्हें महान आनंद की प्राप्ति होगी, तुम्हारा सारा क्लेश मिट जायेगा।” भगवान पुरुषोत्तम श्री विष्णु द्वारा इस प्रकार समझाने पर मेनका का मन कुछ कोमल हुआ, परन्तु वे शिव को अपनी कन्या का दाना न देने के हठ पर टिकी रहीं। कुछ क्षण पश्चात, भगवान शिव की माया से मोहित होने पर मेनका से श्री हरी से कहा! “यदि वे सुन्दर, मनोरम शरीर धारण कर ले तो मैं अपनी पुत्री का दान उन्हें कर दूंगी; अन्य किसी उपाय से वे मोहित नहीं होंगी।”

भगवान शिव के मनोरम दिव्य भेष को देखकर मेनका का उनसे क्षमा याचना करना।

तक्षण ही भगवान विष्णु से प्रेरित हो मुनिराज नारद, शिव जी के पास गए तथा उनके कहने पर शिव जी मनोरम तथा दिव्य सुन्दर रूप धारण किया। भगवान शिव का वह स्वरूप काम-देव से भी अधिक सुन्दर था, नारद उन्हें लेकर उस स्थान पर गए जहाँ मेनका थीं। भगवान शिव के सुन्दर रूप को देखकर मेनका के आश्चर्य का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। वे सहस्रों सूर्यों के सामान तेजस्वी थे, उनके सभी अंग बहुत सुन्दर थे, उन्होंने नाना प्रकार के विचित्र वस्त्र तथा आभूषण धारण कर रखा था। विष्णु आदि देवता बड़े ही प्रसन्न चित से उनकी सेवा कर रहें थे, चन्द्रमा मुकुट रूप में विद्यमान थे, उस समय भगवान शिव सर्वाधिक सुन्दर जान पड़ते थे, उनके वाहन वृषभ ने भी नाना प्रकार के दिव्य आभूषण धारण कर रखा था। उनके समस्त गण दिव्य तथा मनोहर प्रतीत हो रहे थे, सभी नाना प्रकार के दिव्य आभूषण तथा वस्त्र धारण कर उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। विष्णु-इंद्र इत्यादि देवता भगवान शिव के साथ चल रहें थे। यह सब देखकर मेनका कुछ क्षण के लिए तो चित्र-लिखित सी रह गई तथा उन्होंने भगवान शिव से कहा! “मेरी पुत्री धन्य हैं, जिसके कठोर तप से संतुष्ट हो आप इस घर पर पधारे हैं। मैंने अपने कुबुद्धि के कारण आपकी जी निंदा की हैं, उसे आप क्षमा कर प्रसन्न हो जायें।” मेनका ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान शिव को प्रणाम किया, उस समय मेनका के घर में उपस्थित अन्य स्त्रियों ने भी उनके दर्शन किये तथा सभी चकित रह गए।

त्रिजुगीनारायण, जहाँ शिव तथा पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था।

त्रिजुगीनारायण मंदिर
त्रिजुगीनारायण नमक स्थान पर जो, केदारनाथ, गौरीकुंड के पास ही हैं, शिव तथा पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। आज भी दोनों के विवाह यज्ञ की अग्नि, मंदिर में प्रज्वलित हैं।

भगवान शिव

भगवान शिव
भगवान शिव का अद्भुत स्वरूप