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आद्या शक्ति काली, सर्वप्रथम शक्ति
  • Dus Mahavidya

    दस महाविद्या स्वरूप में १० महान शक्तियों के स्रोत

    १. महाकाली २. उग्र तारा ३. श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी ४. भुवनेश्वरी ५. छिन्नमस्ता ६. महा त्रिपुर भैरवी ७. धूमावती ८. बगलामुखी ९. मातंगी १०. कमला

  • Shiva and Kali

    महा काली (पार्वती अथवा सती), शिव अर्धांगिनी

    तमो गुनी, विध्वंस से सम्बंधित, भयंकर स्वरूप वाली।

  • Brahma and Saraswati

    महा सरस्वती, ब्रह्मा अर्धांगिनी

    रजो गुणी, ज्ञान और सृष्टि से सम्बंधित, सौम्य स्वरूप वाली

  • Adhya Shakti

    आद्या शक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली

    अंधकार से जन्मा होने के कारण 'काली' तथा आदि, प्रथम शक्ति स्वरूपा होने हेतु 'आद्या'

  • Vishnu and lakshmi

    महा लक्ष्मी, विष्णु अर्धांगिनी

    सत्व गुणी, पवित्रता तथा पालन से सम्बंधित, सुन्दर तथा कोमल रूप वाली

साधना की एक विशेष पद्धति, तंत्र।

एक अघोरी तांत्रिक या साधक का स्वरूप

एक अघोरी

तांत्रिक साधनाओ या तांत्रिक पद्धति से साधना का महत्व।

तंत्र! अलौकिक शक्तियों से युक्त तथा सार्वभौमिक ज्ञान से सम्बद्ध, एक प्रकार विद्या प्राप्ति की पद्धति हैं, जो महान ज्ञान का भंडार हैं। आदि काल से ही समस्त हिन्दू शास्त्र! महान ज्ञान तथा दर्शन का भंडार रहा हैं तथा पांडुलिपि के रूप में लिपि-बद्ध हैं एवं स्वतंत्र ज्ञान के श्रोत हैं। बहुत से ग्रंथों की पाण्डुलिपि प्रायः लुप्त हो चुकी हैं या जीर्ण अवस्था में हैं। बहुत से ग्रंथों में कुछ ऐसे ग्रंथों का नाम प्राप्त होता हैं, जो आज लुप्त हो चुके हैं।

तंत्र का शाब्दिक अर्थ।

तंत्र का सर्वप्रथम अर्थ ऋग्-वेद से प्राप्त होता हैं, जिसके अनुसार यह एक ऐसा करघा हैं जो ज्ञान को बढ़ता हैं। जिसके अंतर्गत, भिन्न-भिन्न प्रकार से ज्ञान प्राप्त कर, बुद्धि तथा शक्ति दोनों को बढ़ाया जाता हैं। तंत्र के सिद्धांत आध्यात्मिक साधनाओं, रीति-रिवाजों के पालन, भैषज्य विज्ञान, अलौकिक तथा पारलौकिक शक्तिओं की प्राप्ति हेतु, काल जादू-इंद्र जाल, अपने विभिन्न कामनाओं के पूर्ति हेतु, योग द्वारा निरोग रहने, ब्रह्मत्व या मोक्ष प्राप्ति हेतु, वनस्पति विज्ञान, सौर्य-मण्डल, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष विज्ञान, शारीरिक संरचना विज्ञान इत्यादि से सम्बद्ध हैं या कहे तो ये सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्ति का भंडार हैं। हिन्दू धर्मों के अनुसार हजारों तंत्र ग्रन्थ हैं, परन्तु काल के दुष्प्रभाव के परिणामस्वरूप कुछ ग्रन्थ लुप्त हो गए हैं। तंत्र का एक अंधकार युक्त भाग भी हैं, जिसके अनुसार हानि से संबंधित क्रियाओं का प्रतिपादन होता हैं। परन्तु यह संपूर्ण रूप से साधक के ऊपर ही निर्भर हैं की वह तंत्र पद्धति से प्राप्त ज्ञान का किस प्रकार से उपयोग करता हैं।
कामिका तंत्र के अनुसार, तंत्र शब्द दो शब्दों के मेल से बना हैं पहला 'तन' तथा दूसरा 'त्र'। 'तन' शब्द बड़े पैमाने पर प्रचुर मात्रा में गहरे ज्ञान से हैं तथा 'त्र' शब्द का अर्थ सत्य से हैं। अर्थात प्रचुर मात्र में वह ज्ञान जिसका सम्बन्ध सत्य से है! वही तंत्र हैं। तंत्र संप्रदाय अनुसार वर्गीकृत हैं, भगवान विष्णु के अनुयायी! जो वैष्णव कहलाते हैं, इनका सम्बन्ध 'संहिताओं' से हैं तथा शैव तथा शक्ति के अनुयायी! जिन्हें शैव या शक्ति संप्रदाय के नाम से जाना जाता हैं, इनका सम्बन्ध क्रमशः आगम तथा तंत्र से हैं। आगम तथा तंत्र शास्त्र, भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप से अस्तित्व में आये हैं तथा इनके गणो द्वारा लिपि-बद्ध किये गए हैं। ब्रह्मा जी से सम्बंधित तंत्रों को 'वैखानख' कहा जाता हैं।

तंत्र के प्रमुख विचार तथा विभाजन।

तंत्रो के अंतर्गत चार प्रकार के विचारों या उपयोगों को सम्मिलित किया गया हैं।
१. ज्ञान, तंत्र ज्ञान के अपार भंडार हैं।
२. योग, अपने स्थूल शारीरिक संरचना को स्वस्थ रखने हेतु।
३. क्रिया, भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाले देवी-देवताओं से सम्बंधित पूजा विधान।
४. चर्या, व्रत तथा उत्सवों में किये जाने वाले कृत्यों का वर्णन।


इनके अतिरिक्त दार्शनिक दृष्टि से तंत्र तीन भागों में विभाजित हैं १. द्वैत २. अद्वैत तथा ३. द्वैता-द्वैत।

१. आगम २. यामल ३. डामर ४. तंत्र

वैचारिक मत से तंत्र शास्त्र चार भागों में विभक्त है; १. आगम २. यामल ३. डामर ४. तंत्र।

प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आगम ग्रन्थ माने जाते हैं! आगम वे ग्रन्थ हैं जो भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप के कारण अस्तित्व में आये हैं तथा भगवान विष्णु द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। भगवान शिव द्वारा कहा गया तथा पार्वती द्वारा सुना गया! आगम नाम से जाना जाता हैं; इसके विपरीत पार्वती द्वारा बोला गया तथा शिव जी के द्वारा सुना गया निगम के नाम से जाना जाता हैं। इन्हें सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा सुना गया हैं तथा उन्होंने ही आगम-निगमो को मान्यता प्रदान की हैं। भगवान विष्णु के द्वारा गणेश, गणेश द्वारा नंदी तथा नंदी द्वारा अन्य गणो को इन ग्रंथों का उपदेश दिया गया हैं।

आगम ग्रंथों के अनुसार शिव जी पंच-वक्त्र हैं, अर्थात इनके पाँच मस्तक हैं; १. ईशान २. तत्पुरुष ३. सद्योजात ४. वामदेव ५. अघोर। शिव जी के प्रत्येक मस्तक भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तिओं के प्रतीक हैं; क्रमशः सिद्धि, आनंद, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया हैं।


भगवान शिव मुख्यतः तीन अवतारों में अपने आपको प्रकट करते हैं १. शिव २. रुद्र तथा ३. भैरव, इन्हीं के अनुसार वे ३ श्रेणिओ के आगमों को प्रस्तुत करते हैं १. शैवागम २. रुद्रागम ३. भैरवागम। प्रत्येक आगम श्रेणी, स्वरूप तथा गुण के अनुसार हैं।


शैवागम : भगवान शिव ने अपने ज्ञान को १० भागों में विभक्त कर दिया तथा उन से सम्बंधित १० अगम! शैवागम नाम से जाने जाते हैं।

१. प्रणव शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, कमिकागम नाम से जाना जाता है।
२. सुधा शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, योगजगाम नाम से जाना जाता है।
३. दीप्त शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, छन्त्यागम नाम से जाना जाता है।
४. कारण शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, करनागम नाम से जाना जाता है।
५. सुशिव शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, अजितागम नाम से जाना जाता है।
६. ईश शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सुदीप्तकागम नाम से जाना जाता है।
७. सूक्ष्म शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सूक्ष्मागम नाम से जाना जाता है।
८. काल शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सहस्त्रागम नाम से जाना जाता है।
९. धनेश शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सुप्रभेदागम नाम से जाना जाता है।
१०. अंशु शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, अंशुमानागम नाम से जाना जाता है।


रुद्रागम : १८ भागों में विभक्त हैं।

१. विजय रुद्रागम २. निश्वाश रुद्रागम ३. परमेश्वर रुद्रागम ४. प्रोद्गीत रुद्रागम ५. मुखबिम्ब रुद्रागम ६. सिद्ध रुद्रागम ७. संतान रुद्रागम ८. नरसिंह रुद्रागम ९. चंद्रान्शु रुद्रागम १०. वीरभद्र रुद्रागम ११. स्वयंभू रुद्रागम १२. विरक्त रुद्रागम १३. कौरव्य रुद्रागम १४. मुकुट और मकुट रुद्रागम १५. किरण रुद्रागम १६. गणित रुद्रागम १७. आग्नेय रुद्रागम १८. वतुल रुद्रागम


भैरवागम : भैरवागम के रूप में, यह ६४ भागों में विभाजित किया गया है।

१. स्वच्छ २. चंद ३. कोर्च ४. उन्मत्त ५. असितांग ६. महोच्छुष्मा ७. कंकलिश ८. ............ ९. ब्रह्मा १०. विष्णु ११. शक्ति १२. रुद्र १३. आथवर्ण १४. रुरु १५. बेताल १६. स्वछंद १७. रक्ताख्या १८. लम्पटाख्या १९. लक्ष्मी २०. मत २१. छलिका २२. पिंगल २३. उत्फुलक २४. विश्वधा २५. भैरवी २६. पिचू तंत्र २७. समुद्भव २८. ब्राह्मी कला २९. विजया ३०. चन्द्रख्या ३१. मंगला ३२. सर्व मंगला ३३. मंत्र ३४. वर्न ३५. शक्ति ३६. कला ३७. बिन्दू ३८. नाता ३९. शक्ति ४०. चक्र ४१. भैरवी ४२. बीन ४३. बीन मणि ४४. सम्मोह ४५. डामर ४६. अर्थवक्रा ४७. कबंध ४८. शिरच्छेद ४९. अंधक ५०. रुरुभेद ५१. आज ५२. मल ५३. वर्न कंठ ५४. त्रिदंग ५५. ज्वालालिन ५६. मातृरोदन ५७. भैरवी ५८. चित्रिका ५९. हंसा ६०. कदम्बिका ६१. हरिलेखा ६२. चंद्रलेखा ६३. विद्युलेखा ६४. विधुन्मन।


तंत्र में शाक्त शाखा के अनुसार! ६४ तंत्र और ३२७ उप तंत्र, यमल, डामर और संहिताये हैं।
आगम ग्रंथों का सम्बन्ध वैष्णव संप्रदाय से भी हैं, वैष्णव आगम! दो भागों में विभक्त हैं! प्रथम बैखानक तथा दूसरा पंच-रात्र तथा संहिता। बैखानक एक ऋषि का नाम था तथा उसके नौ छात्र १. कश्यप २. अत्री ३. मरीचि ४. वशिष्ठ ५. अंगिरा ६. भृगु ७. पुलत्स्य ८. पुलह ९. क्रतु थें, यह नौ ऋषि बैखानक आगम के प्रवर्तक माने जाते हैं; वैष्णवों की पञ्च क्रियाओं के अनुसार पंच-रात्र आगम रचे गए हैं। वैष्णव संप्रदाय द्वारा भगवान विष्णु से सम्बंधित नाना प्रकार की धार्मिक क्रिया-कर्म! जो पाँच रात्रि या रात्रों में पूर्ण होते हैं, इनका वर्णन वैष्णव आगम ग्रंथों में समाहित हैं। १. ब्रह्मा-रात्र २. शिव-रात्र ३. इंद्र-रात्र ४. नाग-रात्र ५. ऋषि-रात्र! वैष्णव आगम के अंतर्गत आते हैं; सनत कुमार, नारद, मार्कण्डये, वसिष्ठ, विश्वामित्र, अनिरुध, ईश्वर तथा भारद्वाज मुनि! वैष्णव आगमो के प्रवर्तक थे।


यमला या यामल : साधारणतः यमल का अभिप्राय संधि से हैं तथा शास्त्रों के अनुसार दो देवताओं के वार्तालाप पर आधारित हैं। जैसे भैरव संग भैरवी, शिव संग ब्रह्मा, नारद संग महादेव इत्यादि के प्रश्न तथा उत्तर पर आधारित संवाद यामल कहलाता हैं। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार शिव तथा शक्ति एक ही हैं, इनके एक दूसरे से प्रश्न करना तथा उत्तर देना भी यामलो की श्रेणी में आता हैं। वाराही तंत्र के अनुसार १. सृष्टी २. ज्योतिष ३. नित्य कृत वर्णन ४. क्रम ५. सूत्र ६. वर्ण भेद ७. जाती भेद ८. युग धर्मों का यामलो में व्यापक विवेचन हुआ हैं। भैरवागम में व्याप्त भैरवाष्टक के अनुसार यामल आठ हैं; ब्रह्म-यामल, विष्णु-यामल, शक्ति-यामल, रुद्र-यामल, आर्थवर्णा-यामल, रुरु-यामल, वेताल्य-यामल तथा स्वछंद-यामल।


यामिनी-विहितानी कर्माणि समाश्रीयन्ते तत् तन्त्रं नाम यामलम्।
इन संस्कृत पंक्तियों के अनुसार वे साधनायें या क्रियाएं जो रात के अंधेरे में गुप्त रूप से की जाती हैं उन्हें यामल कहा जाता हैं; जो अत्यंत डरावनी तथा विकट होती हैं। शिव और शक्ति से सम्बंधित समस्त रहस्य, गुप्त ज्ञान इन्हीं यामल तंत्रो के अंतर्गत प्रतिपादित होता हैं। मुख्य रूप से ६ यामल शास्त्र धाराएँ हैं १. ब्राह्म २. विष्णु ३. रुद्र ४. गणेश ५. रवि ६. आदित्य।


डामर : डामर ग्रन्थ केवल भगवान शिव द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। डामरो की संख्या ६ हैं! १. योग २. शिव ३. दुर्गा ४. सरस्वती ५. ब्रह्मा ६. गंधर्व।


तंत्र : तांत्रिक ग्रन्थ देवी पार्वती तथा भगवान शिव के परस्पर वार्तालाप के कारण प्रतिपादित हुए हैं। पार्वती द्वारा कहा गया तथा शिव जी द्वारा सुना गया! निगम ग्रन्थ नाम से जाना जाता हैं तथा शिव जी द्वारा बोला गया तथा देवी पार्वती द्वारा सुना गया! आगम ग्रंथ की श्रेणी में आता हैं; तथा यह सभी ग्रन्थ! तंत्र, रहस्य, अर्णव इत्यादि नाम से जाने जाते हैं। तंत्र मुख्यतः शिव तथा शक्ति से सम्बंधित हैं, इन्हीं से अधिकतर तंत्र ग्रंथों की उत्पत्ति हुई हैं। ऐसा नहीं है कि तंत्र ग्रंथों के अंतर्गत विभिन्न साधनाओं, पूजा पथ का ही वर्णन हैं। तंत्र अपने अंदर समस्त प्रकार का ज्ञान समाहित किया हुए हैं, इसी कारण ऋग्-वेद में तंत्र को ज्ञान का करघा कहा गया हैं, जो बुनने पर और बढ़ता ही जाता हैं।


तंत्र पद्धति में शैव, शाक्त, वैष्णव, पाशुपत, गणापत्य, लकुलीश, बौद्ध, जैन इत्यादि सम्प्रदायों का उल्लेख प्राप्त होता हैं, परन्तु शैव तथा शाक्त तंत्र ही जन सामान्य में प्रचलित हैं। यह दोनों तंत्र मूल रूप से या प्रकारांतर में एक ही हैं, केवल मात्र इनके नाम ही भिन्न हैं; ज्ञान भाव! शैव-तंत्र का मुख्य उद्देश्य हैं, वही क्रिया का वास्तविक निरूपण शाक्त तंत्रों में होता हैं। शैवागम या शैव तंत्र भेद, भेदा-भेद तथा अभेद्वाद के स्वरूप में तीन भागों में विभक्त हैं। भेद-वादी! शैवागम शैव सिद्धांत नाम जन सामान्य में विख्यात हैं, वीर-शैव को भेदा-भेद नाम से तथा अभेद्वाद को शिवाद्वयवाद नाम से जाने जाते हैं। माना जाता हैं कि समस्त प्रकार के शिव सूत्रों का उद्भव स्थल हिमालय कश्मीर में ही हैं।


मंत्र : देवता का विग्रह मंत्र के रूप में उपस्थित रहता हैं। देवताओं के तीन रूप होते हैं १. परा २. सूक्ष्म ३. स्थूल, सामान्यतः मनुष्य सर्वप्रथम स्थूल रूप की उपासना करते हैं तथा इसके सहारे वे सूक्ष्म रूप तक पहुँच जाते हैं। तंत्रों में अधिकतर कार्य मन्त्रों द्वारा ही होता हैं।

शाक्त तंत्रों की संख्या

महाकाल-तंत्र के अनुसार, शाक्त आगमों की संख्या ६४ हैं, उपतंत्र ३२१, संहिता ३०, चूड़ामणि १००, डामर चतुष्क, यामल अष्टक सूक्त २, पुराण ६, उपवेद १५, कक्ष पुती ३, कल्पाष्टक ८, कल्पलता २, चिंतामणी ३, अगस्त्य सूक्त, परशुराम सूक्त, दुर्वासा सूक्त, दत्त संहिता, प्रत्यभिज्ञा, शक्ति-सूत्र तथा श्री विद्यारत्न सूत्र हैं। बंगाल के कुछ सिद्ध शक्ति साधकों ने तंत्र को सुरक्षित रखा तथा गलत प्रयोग होने से रोका भी, सर्वानन्द ठाकुर, बामा खेपा, रामप्रसाद सेन, कमलाकांत, रामकृष्ण परमहंस इनमें प्रमुख थे। कश्मीर, बडौदा तथा दरभंगा के महाराज ने विशेष रुचि द्वारा तंत्रों का संग्रह तथा शुद्धि करण किया। दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह के प्रभाव से सर जॉन उड़रफ ने बहुत सरे तंत्रों का जीर्णोद्धार किया।

तांत्रिक साधनाओं का प्रादुर्भाव।

तांत्रिक साधनाओं के प्रादुर्भाव से सम्बंधित दो प्रकार की धारणाएँ हैं! कुछ मानते हैं तंत्र सर्वप्रथम कश्मीर से उदित हुआ तथा कुछ मानते हैं तांत्रिक साधनाओं का उदय बंगाल प्रान्त से हुआ। मुख्य रूप से बंगाल के तांत्रिकों ने तंत्र साधनाओं का संपूर्ण भारत वर्ष, तिब्बत, चीन में खूब प्रचार प्रसार किया, तथा आज भी बंगाल! तंत्र साधनाओं हेतु विख्यात हैं। बंगाल से तंत्र विद्या, इंद्र-जाल, काला जादू का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं तथा तंत्र पद्धतिओं की सिद्धि हेतु प्रयुक्त होने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति पीठ इसी प्रान्त में विद्यमान हैं; जैसे कामाख्या पीठ
कामाख्या पीठ! तंत्र-पीठों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली माना जाता हैं, जो बंगाल-आसाम प्रान्त में हैं। आदि काल से ही यह पीठ, इंद्र-जाल तथा काला जादू हेतु प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा त्रिपुरेश्वरी, कालिका, त्रिसोता या भ्रामरी, नलहटेश्वरी, फुल्लौरा, कंकाली, नंदिनी, योगेश्वरी, महिषमर्दिनी, कुमारी, कपालिनी, अपर्णा, महालक्ष्मी, श्रावणी, विमला, जयंती, जुगाड़्या, भवानी, मंगल-चंडी, बाहुला, सुगंधा शक्ति पीठ बंगाल प्रान्त में ही विद्यमान हैं; तंत्र क्रियाएं इन्हीं शक्ति पीठों पर अधिक तथा शीघ्र फलदायी होती हैं। तंत्र के अंतर्गत बहुत प्रकार की अलौकिक शक्ति प्राप्त करने का वर्णन हैं, जिनका प्रयोग घोर कर्मों में किया जाता हैं, मारण, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन, मोहन घोर कर्मों के श्रेणी में आते हैं। परन्तु इन कर्मों को सामाजिक सुरक्षा तथा उपकार हेतु भी किया जाता हैं।
तंत्र-विद्या का सम्बन्ध उत्पत्ति, विनाश, साधना, अलौकिक शक्तियों से होते हुए भी इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार मोक्ष ही सर्वोत्तम तथा सर्वोच्च प्राप्य पद हैं। मोक्ष यानी जन्म तथा मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपने आत्म-तत्व को ब्रह्म में विलीन करना मोक्ष कहलाता हैं; जीव ८४ लाख योनि प्राप्त करने के पश्चात मानव देह धारण करता हैं। तंत्रों के अनुसार मानव शरीर ३ करोड़ नाड़ियों से बना हैं तथा इनमें प्रमुख इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना हैं तथा यह मानव देह के अंदर रीड की हड्डी में विद्यमान हैं। तंत्र-विद्या द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर, इन्हीं तीन नाड़ियों द्वारा ब्रह्म-रंध तक लाया जाता हैं, यह प्रक्रिया पूर्ण योग-मग्न कहलाता हैं तथा अपने अंदर ऐसी शक्तियों को स्थापित करता हैं जिससे व्यक्ति अपने इच्छा अनुसार हर कार्य कर सकता हैं।

मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी।

मणिकर्णिका घाट
मणिकर्णिका घाट, वाराणसी या काशी। यहाँ स्थान तंत्र शक्तिओं के साधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता हैं, भगवान शिव यहाँ सर्वदा, साक्षात् विराजमान रहते हैं। आदि काल से ही काशी या वाराणसी का प्रयोग तांत्रिक साधनाओं तथा क्रियाओं द्वारा किया जाता हैं।